युद्ध काण्ड अध्याय 74

अग्निदेव द्वारा सीता को राम को सौंपना

अग्निदेव सीता को राम के हवाले करते हैं और उनकी पवित्रता की पुष्टि करते हैं। राम सीता को प्रेमपूर्वक स्वीकार करते हैं और प्रजा के समक्ष उनका सम्मान बढ़ता है।

विवरण

अग्निदेव सीता को राम को सौंपते हुए कहते हैं कि यह देवी सर्वथा पवित्र हैं, इन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करें। राम अग्निदेव की वाणी का सम्मान करते हुए सीता को अपने पास बुलाते हैं और सभी देवताओं का अभिवादन करते हैं। देवता राम को आशीर्वाद देते हैं और कहते हैं कि अब वे अयोध्या लौटकर राज्यभार संभालें। यह सर्ग राम के धर्म-संकट के समाधान और देवताओं के आशीर्वाद का वर्णन करता है।

(अग्निदेव द्वारा सीता को राम को सौंपना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुस्सप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अग्निदेव ने सीता की पवित्रता प्रमाणित कर उन्हें राम के हाथों में सौंप दिया। सभी देवताओं ने राम की जय-जयकार की और उन्हें अयोध्या लौटने का आदेश दिया।

🙏 अग्निदेव का समर्पण (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
अग्निरुवाच
इयं ते राम वैदेही न किल्बिषमिहास्ति वै ।
प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते सर्वदेवैरभिष्टुताम् ॥
🔹 पदच्छेद : अग्निः = अग्निदेव; उवाच = बोले; इयम् = यह; ते = तुम्हारी; राम = हे राम; वैदेही = सीता; न = नहीं; किल्बिषम् = दोष; इह = इसमें; अस्ति = है; वै = निश्चय; प्रतिगृह्णीष्व = स्वीकार करो; भद्रम् = कल्याण; ते = तुम्हारा; सर्वदेवैः = सब देवों द्वारा; अभिष्टुताम् = स्तुता।
📖 भावार्थ : अग्निदेव ने कहा: "हे राम! यह तुम्हारी वैदेही है। इसमें कोई दोष नहीं है। सब देवों द्वारा प्रशंसित इस देवी को तुम कल्याणपूर्वक स्वीकार करो।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
रामः प्रतिग्रहीष्यामि सीतां देवि यथाविधि ।
न हि त्याज्या मया देवि लोकवादान्न कर्हिचित् ॥
📖 भावार्थ : राम बोले: "हे देवि! मैं सीता को यथाविधि स्वीकार करूँगा। लोकापवाद के कारण ही मैंने कभी त्याग नहीं किया (अर्थात अब स्वीकार करना ही उचित है)।"

🌟 देवताओं का आशीर्वाद (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ब्रह्मोवाच
प्रीताः स्म राम भद्रं ते लोकानां हितकाम्यया ।
प्रवृत्तो युद्धनिर्योगस्त्वया दशरथात्मज ॥
📖 भावार्थ : ब्रह्मा जी ने कहा: "हे राम! तुम्हारा कल्याण हो। हम सब प्रसन्न हैं। तुमने लोकहित के लिए यह युद्ध किया। हे दशरथ-पुत्र! तुम धन्य हो।"
॥ श्लोक १६-२० ॥
इन्द्र उवाच
गृहाणेदं मया दत्तं हारं राम महाद्युते ।
अभिषेकं करिष्यामि तव राज्ये निरन्तरम् ॥
📖 भावार्थ : इन्द्र ने कहा: "हे महाद्युते राम! मेरे द्वारा दिया हुआ यह हार ग्रहण करो। मैं तुम्हारा राज्याभिषेक करूँगा।"

🚩 अयोध्या लौटने का संकल्प (श्लोक २१-२६)

॥ श्लोक २१-२६ ॥
राम उवाच
प्रस्थितोऽहं पुरीं रम्यामयोध्यां देवसत्तमाः ।
भरतः प्रतीक्षते मां वत्सरानिह पञ्च च ॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा: "हे देवताओं! मैं अब रम्य अयोध्या पुरी को प्रस्थान करूँगा। भरत पाँच वर्षों से मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔥 अग्नि की साक्षी

अग्निदेव ने सीता को राम को सौंपकर यह सिद्ध किया कि अग्नि सत्य की साक्षी है और सती-साध्वी स्त्री पर अग्नि का प्रभाव नहीं होता।

🌍 देवताओं का सान्निध्य

देवताओं का प्रकट होना और आशीर्वाद देना राम के दिव्यत्व को पुनः स्थापित करता है।

🎯 शिक्षा : सत्य और धर्म की रक्षा करने वाले की देवता भी सहायता करते हैं। राम ने धर्म का पालन किया, इसलिए देवताओं का आशीर्वाद मिला।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुस्सप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।