युद्ध काण्ड अध्याय 72

सीता का अग्नि में प्रवेश

राम के कठोर वचन सुनकर सीता अत्यन्त दुःखी होती हैं और लक्ष्मण से अग्नि प्रज्ज्वलित करने का आग्रह करती हैं। वह अग्नि की शपथ लेकर अपनी पवित्रता सिद्ध करने हेतु अग्नि में प्रवेश कर जाती हैं।

विवरण

राम के वचनों से आहत सीता अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए अग्नि में प्रवेश करने का निर्णय लेती हैं। वह लक्ष्मण से अग्नि प्रज्ज्वलित करने का आग्रह करती हैं। लक्ष्मण राम की ओर देखते हैं, राम की मौन सहमति से वे अग्नि तैयार करते हैं। सीता अग्नि की परिक्रमा करके उसमें प्रवेश कर जाती हैं। समस्त देवता, राक्षस और वानर विस्मित होकर यह दृश्य देखते हैं। यह सर्ग सीता के पातिव्रत्य और आत्म-सम्मान का प्रतीक है।

(सीता का अग्नि में प्रवेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के कठोर वचनों से सीता का हृदय विदीर्ण हो गया। उन्होंने अपनी पवित्रता प्रमाणित करने के लिए अग्नि का सहारा लिया। लक्ष्मण ने राम की आज्ञा से अग्नि प्रज्ज्वलित की, और सीता ने अग्नि में प्रवेश कर लिया।

🔥 अग्नि की याचना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
सीता तु रामवचनं श्रुत्वा घोरमकम्पनम् ।
उवाच लक्ष्मणं दीना वाष्पसंदिग्धया गिरा ॥
चितां मे कुरु सौमित्रे सर्वलोकस्य सन्निधौ ।
शोकस्यास्य विनाशाय न ह्यन्यच्छरणं मम ॥
🔹 पदच्छेद : सीता = सीता; तु = तो; रामवचनं = राम के वचन; श्रुत्वा = सुनकर; घोरम् = भयंकर; अकम्पनम् = कम्पनरहित; उवाच = बोली; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; दीना = दीन; वाष्पसंदिग्धया = आँसुओं से भरी; गिरा = वाणी से; चिताम् = चिता; मे = मेरे लिए; कुरु = करो; सौमित्रे = लक्ष्मण; सर्वलोकस्य = सब लोगों के; सन्निधौ = सामने; शोकस्य = शोक के; अस्य = इस; विनाशाय = नाश के लिए; न = नहीं; हि = ही; अन्यत् = दूसरा; शरणम् = आश्रय; मम = मेरा।
📖 भावार्थ : राम के उन भयंकर वचनों को सुनकर सीता दीन होकर आँसुओं से भरी वाणी में लक्ष्मण से बोलीं: "हे सौमित्रे! सब लोगों के सामने मेरे लिए चिता तैयार करो। इस शोक के नाश के लिए, मुझे दूसरा कोई आश्रय नहीं है।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं राममेवान्वचिन्तयत् ।
प्रेक्ष्य रामस्य भावं स चकाराग्निं समन्ततः ॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने सीता के उन वचनों को सुनकर राम के मन का भाव समझा और राम की मौन सहमति पाकर उन्होंने चारों ओर से अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी।

🚺 सीता का अग्नि-प्रवेश (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१६ ॥
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा अग्निं सीता यशस्विनी ।
ब्राह्मणान् साधुवादांश्च सिषेवे परमेश्वरी ॥
अग्निं प्राञ्जलिरामन्त्र्य प्रविवेश हुताशनम् ।
📖 भावार्थ : तब यशस्विनी सीता ने अग्नि की प्रदक्षिणा की, ब्राह्मणों और साधु-जनों का अभिवादन किया, और हाथ जोड़कर अग्नि को प्रणाम करके उस हुताशन में प्रवेश कर गईं।
॥ श्लोक १७-२० ॥
ततो देवाः समागम्य सगन्धर्वाः सचारणाः ।
अग्निं समभ्यनन्दंश्च दृष्ट्वा सीतां हुताशनम् ॥
📖 भावार्थ : तब सीता को अग्नि में प्रविष्ट देखकर देवता, गन्धर्व और चारण सब वहाँ एकत्र हो गए और अग्नि की स्तुति करने लगे।

😇 देवताओं की स्तुति (श्लोक २१-२८)

॥ श्लोक २१-२८ ॥
नैतदस्ति यथा सीता रावणं प्राप्तवत्यभूत् ।
देवि त्वं रक्षिता नित्यं रामस्य महिषी प्रिया ॥
📖 भावार्थ : देवताओं ने कहा: "ऐसा नहीं है कि सीता रावण के पास गई थी। हे देवि! तुम राम की प्रिय महिषी हो, नित्य रक्षित हो।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔥 अग्नि – सत्य का प्रतीक

अग्नि साक्षी रखकर सीता अपनी पवित्रता सिद्ध करती हैं। यह सनातन धर्म में सत्य की कसौटी है।

🙏 सीता का आत्मसम्मान

सीता अपने सम्मान की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा देती हैं। यह उनके चरित्र की महानता दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : सत्य और पवित्रता की रक्षा के लिए कठोर से कठोर परीक्षा भी स्वीकार करनी चाहिए। सीता का अग्नि-प्रवेश आत्मबलिदान की पराकाष्ठा है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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