युद्ध काण्ड अध्याय 71

सीता का राम के पास आना

रावण के वध के पश्चात विभीषण आदेशानुसार सीता को पालकी में बिठाकर राम के पास लाया जाता है। राम सीता को देखकर भावुक होते हैं, परंतु लोक-लाज के कारण कठोर वचन कहते हैं।

विवरण

रावण का वध होने के बाद विभीषण राम से कहते हैं कि अब सीता को लाना उचित है। राम की आज्ञा से सीता को सुसज्जित पालकी में बिठाकर हनुमान और अन्य वानरों के साथ लाया जाता है। सीता राम को देखकर अत्यंत प्रसन्न होती हैं, किन्तु राम सार्वजनिक रूप से उनसे कठोर शब्दों में कहते हैं कि उन्होंने युद्ध केवल अपनी प्रतिष्ठा के लिए किया था, सीता के लिए नहीं। वे सीता को उनकी इच्छानुसार कहीं भी जाने की स्वतंत्रता देते हैं। सीता इस कठोर वचन को सुनकर अत्यंत दुःखी होती हैं। यह सर्ग राम के राजधर्म और लोकनिन्दा के भय को दर्शाता है।

(सीता का राम के पास आना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथैकसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण-वध के पश्चात् सम्पूर्ण लंका में हर्ष छा गया। विभीषण ने राम से कहा कि अब सीता को लाना उचित है। राम की आज्ञा से सीता सुसज्जित पालकी में बैठकर राम के समक्ष उपस्थित हुईं, किन्तु वहाँ उन्हें राम के कठोर वचन सुनने को मिले।

🚩 सीता का आगमन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
हते रावणे संग्रामे विभीषणो महामतिः ।
रामं कृताञ्जलिर्वाक्यमुवाच प्रणतोऽब्रवीत् ॥
प्राप्ता तव महाबाहो सीता धर्मपरायणा ।
आनीयतां यथान्यायं त्वत्सकाशं नरर्षभ ॥
🔹 पदच्छेद : हते = मारे जाने पर; रावणे = रावण के; संग्रामे = युद्ध में; विभीषणः = विभीषण; महामतिः = महान बुद्धिवाला; रामं = राम के प्रति; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर; वाक्यम् = वचन; उवाच = बोला; प्रणतः = नत होकर; अब्रवीत् = कहा; प्राप्ता = प्राप्त हुई है; तव = आपकी; महाबाहो = महाबाहो; सीता = सीता; धर्मपरायणा = धर्मनिष्ठा; आनीयताम् = लाई जाए; यथान्यायं = न्यायपूर्वक; त्वत्सकाशं = आपके पास; नरर्षभ = नरश्रेष्ठ।
📖 भावार्थ : युद्ध में रावण के मारे जाने पर महामति विभीषण ने हाथ जोड़कर राम से विनम्रतापूर्वक कहा: "हे महाबाहो नरश्रेष्ठ! आपकी धर्मपरायणा सीता अब प्राप्त हो चुकी हैं। न्यायपूर्वक उन्हें आपके पास लाया जाए।"
॥ श्लोक ५-१० ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राजा रामः सत्यपराक्रमः ।
उवाच परमप्रीतो विभीषणमिदं वचः ॥
आनीयतां शुभाचारा सीता शुभलक्षणा ।
स्नाता शुक्लाम्बरा भूत्वा भूषिता सर्वभूषणैः ॥
📖 भावार्थ : सत्यपराक्रमी राजा राम ने विभीषण के उन वचनों को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा: "शुभाचारा और शुभलक्षणा सीता को लाया जाए। वे स्नान करके श्वेत वस्त्र धारण करें और सब आभूषणों से सुसज्जित हों।"

💔 राम के कठोर वचन (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
ततो ददर्श सीतां स रामो दीनां कृताञ्जलिम् ।
उवाच च महातेजा लोकविक्रुष्टकारणात् ॥
युद्धेन वीर्यशुल्का त्वं मया प्राप्ता जनकात्मजे ।
अस्मिन् लोके यशः प्राप्तं मया चारित्रसंग्रहः ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने दीन होकर हाथ जोड़े खड़ी सीता को देखा। लोकापवाद के भय से महातेजस्वी राम ने कहा: "हे जनकात्मजे! युद्ध में वीर्य के मूल्य से तुम मुझे प्राप्त हुई हो। इस संसार में मुझे यश और चरित्र की रक्षा का वरदान मिला है।"
॥ श्लोक १८-२२ ॥
न त्वमर्हसि वस्तुं वै मया सह कथञ्चन ।
रावणाङ्कगता देवि मानुषीति प्रकीर्तिता ॥
गच्छ त्वं यत्र कामं तु लक्ष्मणानुज्ञया ध्रुवम् ।
इति श्रुत्वा वचो घोरं सीता शोकसमन्विता ॥
📖 भावार्थ : "तुम मेरे साथ किसी भी प्रकार नहीं रह सकती। हे देवि! रावण की गोद में रहने के कारण तुम मनुष्यों में कलंकित कहलाती हो। लक्ष्मण की आज्ञा से तुम जहाँ चाहो वहाँ चली जाओ।" यह भयंकर वचन सुनकर सीता शोक से व्याकुल हो गईं।

😢 सीता का विलाप (श्लोक २३-३२)

॥ श्लोक २३-२८ ॥
सा निःश्वसन्ती दुःखार्ता वाष्पसंरुद्धया गिरा ।
उवाच परमोद्विग्ना सीता रामं कृताञ्जलिः ॥
किमिदं भाषसे राम कठोरं वाक्यमीदृशम् ।
न त्वं पुरुषशार्दूल जानासि हृदयं मम ॥
📖 भावार्थ : दुःख से आर्त सीता ने आँसुओं से रुद्ध वाणी से गद्गद होकर हाथ जोड़े कहा: "हे राम! आप ऐसा कठोर वचन क्यों कह रहे हैं? हे पुरुषशार्दूल! आप मेरे हृदय को नहीं जानते।"
॥ श्लोक २९-३२ ॥
यदि मां त्वं परित्यक्तुं कामं शक्तो ऽसि राघव ।
अग्निं प्रवेक्ष्ये संप्राप्ते लोके शुद्धिर्भविष्यति ॥
📖 भावार्थ : "हे राघव! यदि आप मुझे त्यागना चाहते हैं तो समर्थ हैं। मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी, जिससे लोक में मेरी शुद्धि सिद्ध होगी।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राजधर्म और लोकमर्यादा

राम का कठोर व्यवहार उनके राजधर्म का पालन है। वे लोकनिन्दा से बचना चाहते हैं और अपने कुल की प्रतिष्ठा की रक्षा करना चाहते हैं।

💧 सीता का धैर्य

सीता का धैर्य और पतिव्रता धर्म यहाँ प्रदर्शित होता है। वे राम के कठोर वचन सुनकर भी अग्नि परीक्षा देने को तैयार हो जाती हैं।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग सिखाता है कि राजा को लोकापवाद से बचना चाहिए और अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, चाहे व्यक्तिगत भावनाएँ कुछ भी हों।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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