राम का क्रोध और समुद्र का प्रकट होना
समुद्र द्वारा मार्ग न देने पर क्रोधित होकर श्रीराम धनुष-बाण उठाते हैं। तब समुद्र देवता प्रकट होकर क्षमा याचना करते हैं और नल द्वारा सेतु बनाने का उपाय बताते हैं।
विवरण
तीन दिन और तीन रातों तक समुद्र तट पर प्रतीक्षा करने के बाद भी जब समुद्र ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो श्रीराम क्रोध से उत्तेजित हो उठे। उन्होंने लक्ष्मण से अपना धनुष-बाण मंगवाया और समुद्र को सुखाने की प्रतिज्ञा की। उनके क्रोध से तीनों लोक काँप उठे। तब समुद्र देवता अत्यन्त भयभीत होकर प्रकट हुए और हाथ जोड़कर क्षमा माँगी। उन्होंने राम को सलाह दी कि वानर नल, जो विश्वकर्मा के पुत्र हैं, समुद्र पर सेतु का निर्माण कर सकते हैं। राम का क्रोध शान्त हुआ और उन्होंने सेतु निर्माण की आज्ञा दी। यह सर्ग भगवान राम के मानवीय क्रोध और उनके अलौकिक तेज का अद्भुत चित्रण प्रस्तुत करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ७
(राम का क्रोध और समुद्र का प्रकट होना)
🔆 प्रस्तावना : तीन दिन व्यतीत हो गए, किन्तु समुद्र ने राम की प्रार्थना का उत्तर नहीं दिया। तब राम का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "लाओ मेरा धनुष, मैं इस अहंकारी समुद्र को सुखाकर राक्षसों का मार्ग प्रशस्त कर दूँगा।" यह सर्ग राम के मानवीय क्रोध और उनके दिव्य तेज का अद्भुत संगम है।
🔥 राम का क्रोध और धनुष उठाना (श्लोक १-१२)
निश्चयं नाध्यगच्छन्तं समुद्रं वाक्यमब्रवीत् ॥
एष मे प्रथमः कल्पो याचितः सागर त्वया ।
न च मे कर्तुमिच्छामि वचनात् तव दुर्मते ॥
यस्मान्मामभिजानन्तं नाभिनन्दसि सागर ।
अद्य त्वां निशितैर्बाणैर्नाशयिष्ये सराक्षसम् ॥
इत्युक्त्वा राघवः क्रोधात् संदधे परमास्त्रवित् ।
धनुर्विकृष्य बलवान् ब्रह्मदण्डोपमं शरम् ॥
उदतिष्ठन्महाघोरैः सर्पैरिव महागिरिः ॥
स समुद्रः सपत्नीकः सराक्षसगणस्तदा ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥
न मां समर्थं राम त्वं जानीहि प्लवगेश्वर ।
यदर्थमुदकं वेगात् धारयामि निरन्तरम् ॥
किं करोमि वदस्व त्वं वानरैः सह राघव ।
सेतुं बध्नीष्व मयि त्वं नलः सेतुं करिष्यति ॥
🌊 समुद्र का विनय और नल का परिचय (श्लोक १३-२५)
मातुर्वरप्रदानेन पितुश्चैव महायशाः ॥
स सेतुं कर्तुमिच्छामि तव राम समर्पितम् ।
मयि बध्नीष्व राम त्वं सेतुं शतगुणोत्तरम् ॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा समुद्रस्य च भाषितम् ।
नलः प्रहृष्टो धीमांस्तु सेतुबन्धे मनो दधे ॥
🕊️ राम का क्रोध शान्त और सेतु निर्माण (श्लोक २६-४०)
रामः परमधर्मात्मा न्यवर्तत समीरणात् ॥
ततः स राघवो वीरो नलं वचनमब्रवीत् ।
कुरु सेतुं महाबाहो समुद्रे सरितां पतौ ॥
नलस्त्वरितमागम्य सेतुबन्धे महाबलः ।
चकार सेतुं दुर्धर्षं योजनानां शतायुतम् ॥
ततो वानरमुख्यास्तु हृष्टाः सेतुं समागताः ।
चक्रुः सेतुं महात्मानो रामस्य वचनात् तदा ॥
रामक्रोधसमुद्राख्यः सेतुबन्धप्रवर्तकः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🔥 राम का मानवीय क्रोध
राम न केवल मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, बल्कि वे मानवीय भावनाओं से भी परिपूर्ण हैं। यहाँ उनका क्रोध उनके न्यायप्रिय स्वभाव को दर्शाता है।
🌊 समुद्र की सीमा और अनंतता
समुद्र का प्राकट्य यह बताता है कि प्रकृति भी राम की इच्छा के आगे नतमस्तक है। राम की शक्ति अपरिमित है।
🛠️ नल का सेतु निर्माण
नल को विश्वकर्मा का पुत्र बताया गया है। यह रामायण का वह प्रसिद्ध प्रसंग है, जहाँ वानरों द्वारा समुद्र पर पुल बाँधा जाता है।
⚓ आगामी युद्ध की भूमिका
सेतु निर्माण के साथ ही राम की सेना लंका में प्रवेश करने को सक्षम हो जाती है। यह आगामी महायुद्ध की पूर्वपीठिका है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चे प्रयास और ईश्वरीय क्रोध के आगे प्रकृति भी झुक जाती है। साथ ही, विनय और समर्पण से महान कार्य सिद्ध होते हैं।