युद्ध काण्ड अध्याय 66

रावण का वध

राम और रावण के मध्य भीषण युद्ध के पश्चात राम ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर रावण का वध कर देते हैं। रावण के मरते ही देवतागण पुष्पवर्षा करते हैं और राम की स्तुति करते हैं।

विवरण

राम-रावण युद्ध अपने चरम पर होता है। रावण अनेक अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करता है, किन्तु राम के बाण उन्हें निष्फल कर देते हैं। अंत में राम ब्रह्मास्त्र का स्मरण कर उसका प्रयोग करते हैं, जो रावण के हृदय में लगकर उसका वध कर देता है। रावण के गिरते ही समस्त देवताओं में हर्ष व्याप्त हो जाता है। वे आकाश से पुष्प वर्षा करते हैं और राम की जय-जयकार करते हैं। इस सर्ग में युद्ध की समाप्ति और रावण के अंत का वर्णन है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ६६

(रावण का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्षष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम और रावण के बीच घमासान युद्ध चल रहा है। रावण अनेक मायावी अस्त्रों का प्रयोग करता है, किन्तु राम के बाण उन्हें विफल कर देते हैं। अन्ततः राम ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर रावण का वध कर देते हैं। देवतागण पुष्पवर्षा कर राम की स्तुति करते हैं।

⚔️ राम-रावण अंतिम युद्ध (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः प्रववृते युद्धं रामरावणयोः पुनः ।
घोररूपं महाभीमं देवासुररणोपमम् ॥
रावणो रथमास्थाय मायाभिः समवस्थितः ।
ववर्ष शरवर्षाणि रामस्योपरि दारुणम् ॥
रामोऽपि रथमास्थाय दिव्येनास्त्रेण राक्षसम् ।
जघान निशितैर्बाणैः कालाग्निसमतेजसा ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रववृते = प्रारम्भ हुआ; युद्धम् = युद्ध; रामरावणयोः = राम और रावण में; पुनः = फिर; घोररूपम् = भयंकर रूप वाला; महाभीमम् = अत्यन्त भीषण; देवासुररणोपमम् = देवताओं और असुरों के युद्ध के समान; रावणः = रावण; रथम् = रथ पर; आस्थाय = आरूढ़ होकर; मायाभिः = मायाओं से; समवस्थितः = स्थित होकर; ववर्ष = बरसाया; शरवर्षाणि = बाणों की वर्षा; रामस्योपरि = राम पर; दारुणम् = भयंकर; रामः = राम; अपि = भी; रथम् = रथ पर; आस्थाय = चढ़कर; दिव्येन = दिव्य; अस्त्रेण = अस्त्र से; राक्षसम् = राक्षस को; जघान = मारा; निशितैः = तीक्ष्ण; बाणैः = बाणों से; कालाग्निसमतेजसा = कालाग्नि के समान तेजस्वी।
📖 भावार्थ : तब राम और रावण के बीच पुनः युद्ध प्रारम्भ हुआ, जो भयंकर और अत्यन्त भीषण था, देवताओं और असुरों के युद्ध के समान। रावण रथ पर आरूढ़ होकर मायाओं से युक्त होकर राम के ऊपर भयंकर बाणों की वर्षा करने लगा। राम भी रथ पर चढ़कर दिव्य अस्त्र से कालाग्नि के समान तेजस्वी तीक्ष्ण बाणों द्वारा राक्षस को मारने लगे।
॥ श्लोक ६-१५ ॥
📖 भावार्थ (संक्षिप्त) : दोनों ओर से घोर बाण वर्षा होती है। रावण विभिन्न अस्त्रों - नागास्त्र, वायव्यास्त्र आदि का प्रयोग करता है, किन्तु राम उनका निवारण करते हैं। अन्ततः रावण थक जाता है और राम उसके रथ के ध्वज, घोड़े, सारथी को नष्ट कर देते हैं। रावण पैदल हो जाता है।

🏹 ब्रह्मास्त्र का प्रयोग (श्लोक १६-३५)

॥ श्लोक १६-२५ ॥
ततः रामः महातेजाः ब्रह्मास्त्रं समुपाददे ।
मन्त्रपूतं महाघोरं रावणान्तकरं तदा ॥
आदित्यमिव तेजोभिः ज्वलन्तं भीमनिस्वनम् ।
संधाय च धनुः श्रेष्ठे मुमोच रिपुहृदये ॥
तदस्त्रं वेगवत् भित्त्वा रावणस्य महोरसम् ।
प्राणानादाय निर्गत्य पुनरायात् धनुः शरम् ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने ब्रह्मास्त्र का संधान किया, जो मन्त्रों से पूत, अत्यन्त भयंकर और रावण का अन्त करने वाला था। वह अस्त्र सूर्य के समान तेज से ज्वलन्त और भीषण नाद करता हुआ था। उसे धनुष पर चढ़ाकर राम ने शत्रु के हृदय में छोड़ दिया। वह वेगवान अस्त्र रावण के वक्ष को भेदकर उसके प्राणों को ग्रहण कर बाहर निकल गया और पुनः राम के बाण में समा गया।
॥ श्लोक २६-३५ ॥
📖 भावार्थ (संक्षिप्त) : रावण का सिर तो कट जाता है, किन्तु तुरन्त नया सिर प्रकट हो जाता है। ऐसा बार-बार होता है। अन्ततः ब्रह्मास्त्र रावण के हृदय को भेदकर उसके प्राण हर लेता है। रावण रथ से नीचे गिरता है, और उसके गिरते ही समस्त राक्षस सेना भाग खड़ी होती है।

🌺 देवताओं की स्तुति (श्लोक ३६-४८)

॥ श्लोक ३६-४२ ॥
ततः देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
पुष्पवर्षं प्रकीर्णं च रामस्योपरि चाकिरन् ॥
जय राम जय देवेश जय लोकाभिरक्षक ।
इति वादः सुमधुरः सर्वतः समजायत ॥
📖 भावार्थ : तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और परमर्षिगण राम के ऊपर पुष्पवर्षा करने लगे। चारों ओर से "जय राम, जय देवेश, जय लोकाभिरक्षक" के मधुर नाद गूंज उठे।
॥ श्लोक ४३-४८ ॥
📖 भावार्थ : देवताओं ने राम की स्तुति की और कहा कि आपने तीनों लोकों को राक्षसों के भय से मुक्त कर दिया। राम ने विनयपूर्वक सबका अभिवादन स्वीकार किया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं शिक्षा

📘 गूढ़ार्थ : रावण का वध अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। ब्रह्मास्त्र ब्रह्मज्ञान का प्रतीक है, जो अहंकार (रावण) को नष्ट करता है।

💡 शिक्षा : असीमित बल और माया भी सत्य एवं धर्म के समक्ष टिक नहीं सकते। राम का संयम एवं धर्मपालन ही उनकी विजय का कारण बना।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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