युद्ध काण्ड अध्याय 65

राम द्वारा ब्रह्मास्त्र का संधान

मातलि के उपदेशानुसार राम ब्रह्मास्त्र का संधान करते हैं और उसे रावण के हृदय पर छोड़ते हैं, जिससे रावण का वध होता है।

विवरण

राम मातलि के निर्देशों का पालन करते हुए ब्रह्मास्त्र का संधान करते हैं। वह ब्रह्मास्त्र को रावण के हृदय पर छोड़ते हैं। ब्रह्मास्त्र अग्नि के समान प्रज्वलित होकर रावण के हृदय को भेद देता है और रावण मारा जाता है। उसके मरते ही सारे लोकों में हर्ष फैल जाता है। यह सर्ग रावण के अंत का प्रतीक है।

(राम द्वारा ब्रह्मास्त्र का संधान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : मातलि के उपदेश से राम ब्रह्मास्त्र धारण करते हैं और उसे रावण पर छोड़ते हैं। यह वह क्षण है जब रावण का अंत निश्चित हो जाता है।

💥 ब्रह्मास्त्र का प्रयोग (श्लोक १-२०)

॥ श्लोक १-१० ॥
ततः संधानमकरोद् रामो ब्रह्मास्त्रमुत्तमम् ।
मुमोच च हृदि क्रुद्धो रावणस्य दुरात्मनः ॥
तदस्त्रं वैष्णवं रौद्रं ब्राह्मं चैव महाप्रभम् ।
भित्त्वा हृदयं रक्षोऽन्ते पपात सह जीवितैः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; संधानम् = संधान; अकरोत् = किया; रामः = राम ने; ब्रह्मास्त्रम् = ब्रह्मास्त्र; उत्तमम् = उत्तम; मुमोच = छोड़ा; च = और; हृदि = हृदय में; क्रुद्धः = क्रोधित होकर; रावणस्य = रावण के; दुरात्मनः = दुष्ट आत्मा वाले; तत् = वह; अस्त्रम् = अस्त्र; वैष्णवम् = विष्णु से संबंधित; रौद्रम् = रुद्र से संबंधित; ब्राह्मम् = ब्रह्म से संबंधित; च = और; एव = ही; महाप्रभम् = महान प्रभाव वाला; भित्त्वा = भेदकर; हृदयम् = हृदय; रक्षःअन्ते = राक्षस के अंत में; पपात = गिरा; सह जीवितैः = प्राणों सहित।
📖 भावार्थ : तब राम ने उत्तम ब्रह्मास्त्र का संधान किया और क्रोधित होकर उसे दुरात्मा रावण के हृदय पर छोड़ दिया। वह वैष्णव, रौद्र और ब्राह्म तेज से युक्त महाप्रभावशाली अस्त्र रावण के हृदय को भेदकर उसके प्राणों सहित गिर पड़ा।
॥ श्लोक ११-२० ॥
स पपात महाकायो रावणो रथमस्तके ।
वज्राहत इव शैलो द्विधा भूतो महाद्युतिः ॥
हते तस्मिन् महाराज देवाः सर्षिपुरोगमाः ।
जयशब्दं महाकार्षुः पुष्पवृष्टिश्च खात् पतत् ॥
📖 भावार्थ : वह महाकाय रावण रथ पर से (या रथ के साथ) गिर पड़ा, मानो वज्र से आहत दो टुकड़े हुआ महान पर्वत हो। हे महाराज, उसके मारे जाने पर देवता और ऋषिगण जय-जयकार करने लगे और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

🎉 रावण के वध के बाद (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-३० ॥
रामस्तु विजयी भूत्वा पूजितः सर्वदेवतैः ।
विभीषणं समागम्य राज्ये लङ्कायामदापयत् ॥
सीतया सह संगम्य प्राप्तवान् परमां मुदम् ।
एवं युद्धं महाघोरं समाप्तं राघवस्य हि ॥
📖 भावार्थ : राम विजयी हुए और सब देवताओं ने उनकी पूजा की। उन्होंने विभीषण को बुलाकर लंका का राज्य दिया। सीता से मिलकर उन्हें परम आनन्द की प्राप्ति हुई। इस प्रकार राघव का अत्यन्त भयंकर युद्ध समाप्त हुआ।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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