युद्ध काण्ड अध्याय 64

मातलि द्वारा राम को ब्रह्मास्त्र चलाने का उपदेश

मातलि राम को समझाते हैं कि रावण के अमृत-कुण्ड के कारण साधारण अस्त्रों से उसका वध नहीं हो सकता, अतः ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करें।

विवरण

राम द्वारा रावण के सिर बार-बार काटने पर भी वे पुनः जुड़ जाते हैं, तब मातलि राम को ब्रह्मास्त्र चलाने का उपदेश देते हैं। वे राम को ब्रह्मास्त्र के मंत्र और विधि बताते हैं, साथ ही यह भी बताते हैं कि यह अस्त्र केवल अंतिम क्षण में ही प्रयोग करना चाहिए। राम मातलि के निर्देशानुसार ब्रह्मास्त्र को धारण करते हैं।

(मातलि द्वारा राम को ब्रह्मास्त्र चलाने का उपदेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुष्षष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सिर काटने के निष्फल प्रयास के बाद मातलि राम को रावण के वध का एकमात्र उपाय बताते हैं – ब्रह्मास्त्र। यह सर्ग अंतिम अस्त्र की दीक्षा के समान है।

🕉️ ब्रह्मास्त्र का रहस्य (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-८ ॥
मातलिस्तु रथोपस्थे राममाह महाबलम् ।
रावणोऽयं दुराधर्षो ब्रह्मदत्तवरो बली ॥
अमृतं हृदये तस्य ब्रह्मणा संनिवेशितम् ।
तस्मान्न शक्यते हन्तुं शरैरन्यैः कथंचन ॥
ब्रह्मास्त्रेण च संहार्यो रावणो नात्र संशयः ।
🔹 पदच्छेद : मातलिः = मातलि; तु = तो; रथोपस्थे = रथ पर बैठे हुए; रामम् = राम से; आह = बोला; महाबलम् = महान बलशाली; रावणः = रावण; अयम् = यह; दुराधर्षः = दुर्जय; ब्रह्मदत्तवरः = ब्रह्मा से वर पाया हुआ; बली = बलवान; अमृतम् = अमृत; हृदये = हृदय में; तस्य = उसके; ब्रह्मणा = ब्रह्मा ने; संनिवेशितम् = स्थापित किया है; तस्मात् = इसलिए; न शक्यते = शक्य नहीं; हन्तुम् = मारना; शरैः = बाणों से; अन्यैः = दूसरे; कथंचन = किसी भी प्रकार; ब्रह्मास्त्रेण = ब्रह्मास्त्र से; च = और; संहार्यः = वध करने योग्य; रावणः = रावण; न अत्र संशयः = इसमें संशय नहीं।
📖 भावार्थ : मातलि ने रथ पर बैठे महाबली राम से कहा: "यह रावण ब्रह्मा से वर पाया हुआ दुर्जय बलशाली है। ब्रह्मा ने उसके हृदय में अमृत स्थापित कर दिया है। इसलिए अन्य बाणों से उसे मारना किसी भी प्रकार संभव नहीं है। ब्रह्मास्त्र से ही रावण का वध हो सकता है, इसमें संशय नहीं।"
॥ श्लोक ९-१५ ॥
तदिदं ब्रह्मणा दत्तं ब्रह्मास्त्रं परमाद्भुतम् ।
प्रयोगं चास्य वक्ष्यामि संहारं च निबोध मे ॥
ॐकारपूर्वकं मन्त्रं जप्त्वा ध्यात्वा पितामहम् ।
शरं ब्रह्मास्त्रसंयुक्तं मुमोक्ष रघुनन्दन ॥
📖 भावार्थ : "यह ब्रह्मास्त्र ब्रह्मा जी ने दिया है, जो परम अद्भुत है। इसके प्रयोग और संहार की विधि मैं बताता हूँ, उसे सुनो। ॐकार पूर्वक मंत्र जपकर, पितामह ब्रह्मा का ध्यान करके, ब्रह्मास्त्र से युक्त बाण को छोड़ो, हे रघुनन्दन।"

🧘 राम द्वारा ब्रह्मास्त्र धारण (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १६-२५ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं मातलेः परमाद्भुतम् ।
जग्राह ब्रह्मणोऽस्त्रं तु मन्त्रपूतं शरोत्तमम् ॥
ध्यात्वा ब्रह्माणमीशानं जप्त्वा मन्त्रमनुत्तमम् ।
संदधे धनुषि श्रेष्ठे ब्रह्मास्त्रं परमाद्भुतम् ॥
📖 भावार्थ : मातलि के उस परम अद्भुत वचन को सुनकर राघव ने मन्त्रों से पवित्र किए हुए उत्तम ब्रह्मास्त्र को ग्रहण किया। ब्रह्मा और ईशान (शिव) का ध्यान करके, उत्तम मंत्र का जाप करके, उन्होंने श्रेष्ठ धनुष में परम अद्भुत ब्रह्मास्त्र का संधान किया।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुष्षष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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