युद्ध काण्ड
अध्याय 62
रावण का रथहीन होकर युद्ध करना
रथ के नष्ट हो जाने पर रावण पैदल ही राम से युद्ध करता है और विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करता है।
विवरण
रथ के विनाश के बाद रावण क्रोधित होकर पैदल ही राम पर आक्रमण करता है। वह मायावी अस्त्रों का प्रयोग करता है, किन्तु राम अपने बाणों से उनका निवारण करते हैं। यह युद्ध अत्यन्त भयंकर होता है और दोनों ओर के सैनिक आश्चर्यचकित होकर देखते हैं।
(रावण का रथहीन होकर युद्ध करना)
ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विषष्टितमः सर्गः ॥
🔆 प्रस्तावना : रथ नष्ट हो जाने पर रावण क्रोध से भर उठता है। वह पैदल ही राम से युद्ध करने को तत्पर हो जाता है। यह सर्ग रावण के अदम्य साहस और राम के अडिग धैर्य का संगम है।
⚔️ पदाति युद्ध का प्रारम्भ (श्लोक १-१८)
॥ श्लोक १-१० ॥
स रथादवतीर्याशु गदापाणिर्महासुरः ।
अभ्यधावत रामं तु कालान्तकयमोपमः ॥
तं रामो गदया वेगान्निष्पपात महाबलः ।
गदासंघट्टनं त्वासीत् प्रलये पर्वतोरिव ॥
अभ्यधावत रामं तु कालान्तकयमोपमः ॥
तं रामो गदया वेगान्निष्पपात महाबलः ।
गदासंघट्टनं त्वासीत् प्रलये पर्वतोरिव ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; रथात् = रथ से; अवतीर्य = उतरकर; आशु = शीघ्र; गदापाणिः = गदा हाथ में लिए; महासुरः = महान राक्षस; अभ्यधावत = दौड़ा; रामम् = राम की ओर; तु = तथा; कालान्तकयमोपमः = यमराज के समान; तम् = उसको; रामः = राम ने; गदया = गदा से; वेगात् = वेग से; निष्पपात = मुकाबला किया; महाबलः = महान बलशाली; गदासंघट्टनम् = गदाओं का टकराना; तु = तो; आसीत् = हुआ; प्रलये = प्रलय काल में; पर्वतयोः = दो पर्वतों के समान।
📖 भावार्थ : वह महान राक्षस रावण रथ से उतरकर, गदा हाथ में लेकर, यमराज के समान वेग से राम पर दौड़ा। महाबली राम ने भी गदा उठाकर उसका मुकाबला किया। दोनों की गदाओं का टकराना प्रलयकाल में दो पर्वतों के टकराने के समान भयंकर हुआ।
॥ श्लोक ११-१८ ॥
ततः शरैरनेकैस्तु रावणो रघुनन्दनम् ।
अवाकिरत् सुसंक्रुद्धो मायाभिर्विविधैरपि ॥
रामस्तु राक्षसं दृष्ट्वा मायाबलसमन्वितम् ।
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य प्रहसन्निव राघवः ॥
अवाकिरत् सुसंक्रुद्धो मायाभिर्विविधैरपि ॥
रामस्तु राक्षसं दृष्ट्वा मायाबलसमन्वितम् ।
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य प्रहसन्निव राघवः ॥
📖 भावार्थ : तब अत्यन्त क्रुद्ध रावण ने अनेक बाणों और विविध मायाओं से रघुनन्दन राम को आच्छादित कर दिया। राम ने उस मायाबल से युक्त राक्षस को देखकर, हँसते हुए से, उसके अस्त्रों को अपने अस्त्रों से निवारित किया।
🛡️ माया का निवारण (श्लोक १९-३५)
॥ श्लोक १९-२८ ॥
मायाभिस्तस्य रक्षोऽन्ते रामो दिव्यैः शरोत्तमैः ।
निचखान शिरः कायाद् बाहूंश्चैव समन्ततः ॥
स तु मायामयं रामो ज्ञात्वा रावणरक्षितम् ।
दिव्येनास्त्रेण तां मायां नाशयामास वीर्यवान् ॥
निचखान शिरः कायाद् बाहूंश्चैव समन्ततः ॥
स तु मायामयं रामो ज्ञात्वा रावणरक्षितम् ।
दिव्येनास्त्रेण तां मायां नाशयामास वीर्यवान् ॥
📖 भावार्थ : राम ने उस राक्षस की मायाओं को दिव्य उत्तम बाणों से सिर और भुजाओं सहित काट डाला। फिर राम ने जान लिया कि यह रावण की माया से रचित है, तो वीरवर राम ने दिव्य अस्त्र से उस माया का नाश कर दिया।
॥ श्लोक २९-३५ ॥
ततो युद्धं समभवद् रामरावणयोः पुनः ।
पूर्ववत् सुमहाघोरं देवदानवसन्निभम् ॥
दृष्ट्वा तु तद्युद्धं सर्वे प्रशशंसुर्मुदान्विताः ।
नैतादृशं क्वचिद् युद्धं दृष्टपूर्वं कदाचन ॥
पूर्ववत् सुमहाघोरं देवदानवसन्निभम् ॥
दृष्ट्वा तु तद्युद्धं सर्वे प्रशशंसुर्मुदान्विताः ।
नैतादृशं क्वचिद् युद्धं दृष्टपूर्वं कदाचन ॥
📖 भावार्थ : तब पुनः राम और रावण के बीच पूर्ववत् अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ, जो देवताओं और दानवों के युद्ध के समान था। उस युद्ध को देखकर सभी प्राणी हर्षित होकर प्रशंसा करने लगे कि इस प्रकार का युद्ध पहले कभी नहीं देखा गया।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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