युद्ध काण्ड अध्याय 61

राम द्वारा रावण के रथ का विनाश

राम और रावण के भीषण युद्ध में राम अपने बाणों से रावण के रथ को नष्ट कर देते हैं।

विवरण

युद्ध के क्रम में रावण अपने रथ पर सवार होकर राम पर आक्रमण करता है। राम अद्भुत कौशल से रावण के रथ के घोड़ों, सारथी, ध्वज और रथ को क्षत-विक्षत कर देते हैं। रावण रथहीन होकर भूमि पर खड़ा हो जाता है। देवतागण आकाश से राम की वीरता की सराहना करते हैं।

(राम द्वारा रावण के रथ का विनाश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम-रावण युद्ध अपने चरम पर है। रावण अपने रथ पर आरूढ़ होकर अनेक अस्त्र-शस्त्रों से राम पर प्रहार करता है। राम अद्भुत लाघव से उसके रथ के अंगों को एक-एक करके नष्ट कर देते हैं। यह सर्ग राम के अप्रतिम धनुर्धरता का साक्षी है।

🏹 रथ का विध्वंस (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-८ ॥
ततः रावणराजेन्द्रो रथेनादित्यवर्चसा ।
अभ्ययात् त्वरितो रामं सर्वसैन्यसमावृतः ॥
तस्याश्वान् स्वर्णभूषांश्च रामः परपुरंजयः ।
निजघान शरैस्तीक्ष्णैः शक्राशनिसमप्रभैः ॥
हतेष्वश्वेषु सारथिं शरेण नतपर्वणा ।
प्रेषयामास रामस्तु यमस्य सदनं प्रति ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रावणराजेन्द्रः = रावण; रथेन = रथ से; आदित्यवर्चसा = सूर्य के समान तेजस्वी; अभ्ययात् = आगे बढ़ा; त्वरितः = शीघ्र; रामम् = राम की ओर; सर्वसैन्यसमावृतः = सारी सेना से घिरा हुआ; तस्य = उसके; अश्वान् = घोड़ों को; स्वर्णभूषान् = सोने के आभूषणों वाले; रामः = राम ने; परपुरंजयः = शत्रुपुरों को जीतने वाले; निजघान = मार डाला; शरैः = बाणों से; तीक्ष्णैः = तीखे; शक्राशनिसमप्रभैः = इन्द्र के वज्र के समान प्रभाव वाले; हतेषु = मारे जाने पर; अश्वेषु = घोड़ों के; सारथिम् = सारथी को; शरेण = बाण से; नतपर्वणा = टेढ़े पर्व वाले; प्रेषयामास = भेज दिया; रामः = राम ने; यमस्य = यमराज के; सदनम् = घर; प्रति = की ओर।
📖 भावार्थ : उसके बाद रावण सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर सवार होकर, चारों ओर सेना से घिरा हुआ, शीघ्रता से राम की ओर बढ़ा। राम ने उसके सोने से सजे घोड़ों को इन्द्र के वज्र के समान प्रभावशाली तीखे बाणों से मार डाला। घोड़ों के मारे जाने पर राम ने एक टेढ़े पर्व वाले बाण से सारथी को यमलोक भेज दिया।
॥ श्लोक ९-१५ ॥
ततो ध्वजं महाबाहुः शरेणैकेन राघवः ।
चिच्छेद सुमहातेजा रावणस्य दुरात्मनः ॥
हताश्वे हतसारथ्ये रथे तस्मिन् महारथः ।
अवप्लुत्य महातेजा रावणः क्रोधमूर्छितः ॥
पदातिः समपद्यत गदापाणिः प्रतापवान् ।
📖 भावार्थ : तब महाबाहु महातेजस्वी राघव ने एक ही बाण से दुरात्मा रावण के ध्वज को काट डाला। घोड़ों और सारथी के मारे जाने पर उस महारथी रावण ने उस रथ से कूदकर, क्रोध से मूर्छित होकर, पदाति (पैदल) होकर गदा हाथ में ले ली।

✨ रथहीन रावण और राम की विजय (श्लोक १६-३०)

॥ श्लोक १६-२५ ॥
तं विनिष्पिष्य रामेण रथं रावणरक्षितम् ।
देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खात् पतत् ॥
ऋषयश्च महात्मानो रामस्य विजयं विदुः ।
जय रामेति रामेति तुष्टुवुः सिद्धचारणाः ॥
📖 भावार्थ : राम द्वारा रावण के रथ को इस प्रकार चूर-चूर कर देने पर आकाश में देवताओं के दुन्दुभि बजने लगे और पुष्पों की वर्षा होने लगी। महात्मा ऋषियों ने राम की विजय को जान लिया। सिद्ध और चारण जय राम जय राम कहकर स्तुति करने लगे।
॥ श्लोक २६-३० ॥
ततो युद्धं महाघोरं पदातिपदातिनोः ।
रामरावणयो राजन् प्रवृत्तं रोमहर्षणम् ॥
रथिनं रथहीनं तु रामं दृष्ट्वा महाबलम् ।
साधु साध्विति भूतानि प्रशशंसुर्मुदान्विताः ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्, तब राम और रावण दोनों के पदाति होने पर उनके बीच अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी युद्ध हुआ। रथहीन होकर भी महाबली राम को देखकर सभी प्राणियों ने हर्षित होकर साधु साधु कहकर प्रशंसा की।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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