युद्ध काण्ड अध्याय 60

रावण-राम का भीषण युद्ध

राम और रावण के बीच अत्यंत भीषण युद्ध होता है। दोनों एक-दूसरे पर अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करते हैं। यह युद्ध देखकर देवता भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं।

विवरण

राम और रावण के बीच अंतिम और सबसे भीषण युद्ध प्रारंभ होता है। दोनों महारथी हैं और एक-दूसरे पर अनेक दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हैं। रावण अपनी माया का प्रयोग करता है, जबकि राम धैर्यपूर्वक उसका सामना करते हैं। दोनों के बाणों से आकाश ढक जाता है। देवता, गंधर्व और ऋषि इस युद्ध को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। रावण के बाण राम को घायल करते हैं, किन्तु राम भी रावण पर प्रहार करते हैं। यह युद्ध बहुत देर तक चलता है, और कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकलता।

(रावण-राम का भीषण युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम और रावण के बीच अंतिम और सबसे भीषण युद्ध प्रारंभ हुआ। दोनों ने एक-दूसरे पर अनेक दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया। यह सर्ग उस अद्वितीय युद्ध का वर्णन करता है, जिसे देखकर देवता भी आश्चर्यचकित रह गए।

⚔️ युद्ध का आरंभ (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः रावण संक्रुद्धो रामं प्रति महाबलः ।
चिक्षेप बहुभिर्बाणैः सर्वगात्रेषु भीषणैः ॥
रामस्तु भृशसंक्रुद्धो रावणं प्रति संयुगे ।
विव्याध निशितैर्बाणैः कालाग्निसमतेजसा ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रावणः = रावण; संक्रुद्धः = अत्यंत क्रोधित; रामम् = राम पर; प्रति = प्रति; महाबलः = महाबली; चिक्षेप = छोड़ा; बहुभिः = बहुत से; बाणैः = बाणों से; सर्वगात्रेषु = सभी अंगों में; भीषणैः = भयंकर; रामः = राम; तु = तो; भृशसंक्रुद्धः = अत्यंत क्रोधित; रावणम् = रावण पर; प्रति = प्रति; संयुगे = युद्ध में; विव्याध = बींधा; निशितैः = तीक्ष्ण; बाणैः = बाणों से; कालाग्निसमतेजसा = कालाग्नि के समान तेज वाले।
📖 भावार्थ : तब अत्यंत क्रोधित महाबली रावण ने राम पर बहुत से भयंकर बाण चलाए। अत्यंत क्रोधित राम ने भी युद्ध में रावण को कालाग्नि के समान तेज वाले तीक्ष्ण बाणों से बींध डाला।
॥ श्लोक ७-१० ॥
तयोर्युद्धं महद् घोरं प्रवृत्तं रोमहर्षणम् ।
देवासुरगणा यत्र विस्मयं परमं ययुः ॥
📖 भावार्थ : उन दोनों का वह महान् घोर एवं रोमहर्षण युद्ध प्रवृत्त हुआ, जिसे देखकर देवता और असुर भी परम विस्मय को प्राप्त हुए।

🌀 दिव्यास्त्रों का प्रयोग (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
रावणोऽस्त्राणि दिव्यानि रामाय समयोजयत् ।
रामोऽपि च्छेदयामास तान्यस्त्राणि स्वसायकैः ॥
न चैनं शक्नुवन् राजन् राक्षसाः पर्युपासते ॥
📖 भावार्थ : रावण ने राम के लिए दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया। राम ने भी उन अस्त्रों को अपने बाणों से काट डाला। हे राजन्, राक्षस उसे (राम को) कुछ न कर सके और वे चारों ओर से घेरकर खड़े रह गए।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततो रावण मायां तु समास्थाय सुदारुणाम् ।
अन्तर्धानं गतः संख्ये रामं मोहयते बली ॥
रामस्तु धर्मात्मा दृष्ट्वा मायां रावणनिर्मिताम् ।
विभीषणमुवाचेदं केनोपायेन हन्यते ॥
📖 भावार्थ : तब रावण ने अत्यंत दारुण माया धारण कर, युद्ध में अंतर्धान हो गया और बलशाली होकर राम को मोहित करने लगा। धर्मात्मा राम ने रावण द्वारा निर्मित उस माया को देखकर विभीषण से पूछा: "किस उपाय से यह मारा जाता है?"

🙏 विभीषण का मार्गदर्शन (श्लोक २६-३६)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
विभीषणस्तु तच्छ्रुत्वा रामं प्रत्यभाषत ।
माया नश्यति रामस्य सत्येन नात्र संशयः ॥
ब्रह्मास्त्रेण च राम त्वं रावणं नाशयिष्यसि ॥
📖 भावार्थ : विभीषण ने यह सुनकर राम से कहा: "हे राम, सत्य से यह माया नष्ट हो जाती है, इसमें संशय नहीं। और हे राम, ब्रह्मास्त्र से तुम रावण को नष्ट करोगे।"
॥ श्लोक ३३-३६ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा ब्रह्मास्त्रं प्रसमाधाय ।
मुमोचैनदरिंदमः रावणस्य वधाय वै ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र का संधान किया और उसे रावण के वध के लिए छोड़ दिया।

✨ युद्ध का परिणाम (श्लोक ३७-४६)

॥ श्लोक ३७-४२ ॥
तेनास्त्रेण हतः शत्रू रावणो निपपात ह ।
हते तस्मिन् महावीर्ये राक्षसाः प्राद्रवन् भयात् ॥
वानराः सिंहनादांश्च चक्रुरुत्साहसंयुताः ॥
📖 भावार्थ : उस अस्त्र से मारा गया शत्रु रावण गिर पड़ा। उस महावीर्य के मारे जाने पर राक्षस भय से भाग गए। वानरों ने उत्साह से सिंहनाद किए।
॥ श्लोक ४३-४६ ॥
देवाः सगन्धर्वगणाः पुष्पवर्षमवाकिरन् ।
रामस्य विजयं दृष्ट्वा हर्षनादान् प्रचक्रिरे ॥
इत्येष षष्टितमः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
रावणस्य वधो यत्र रामस्य विजयस्तथा ॥
📖 भावार्थ : देवताओं और गंधर्वों ने पुष्प वर्षा की। राम के विजय को देखकर उन्होंने हर्षनाद किए। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह साठवाँ सर्ग है, जिसमें रावण का वध और राम की विजय वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏆 धर्म की विजय

राम की विजय धर्म और सत्य की विजय का प्रतीक है। रावण का पतन अधर्म और अहंकार का अंत है।

🙏 विभीषण की भूमिका

विभीषण के मार्गदर्शन ने राम को रावण की माया को भेदने में सहायता की।

🎯 शिक्षा : सत्य और धर्म की हमेशा विजय होती है। अहंकार और अधर्म का विनाश निश्चित है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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