युद्ध काण्ड अध्याय 59

रावण का रथ पर आरूढ़ होना

रावण अपने दिव्य रथ पर सवार होकर युद्धभूमि में प्रवेश करता है। उसके रथ की ध्वनि से तीनों लोक कंपित हो जाते हैं और वानर सेना में भय का संचार होता है।

विवरण

रावण अपने अद्भुत रथ पर आरूढ़ होता है, जो स्वयं विश्वकर्मा द्वारा निर्मित था। रथ में दिव्य अस्त्र-शास्त्र सुसज्जित थे। रावण के रथ की ध्वनि से तीनों लोक कंपित हो गए। वानर सेना उस भयानक रथ और रावण के तेज को देखकर भयभीत हो गई। राम ने वानरों को आश्वस्त किया और स्वयं युद्ध के लिए तैयार हुए।

(रावण का रथ पर आरूढ़ होना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण ने अंतिम युद्ध के लिए अपने दिव्य रथ पर सवारी की। उसके रथ की ध्वनि से तीनों लोक काँप उठे और वानर सेना भयभीत हो गई। यह सर्ग उस दृश्य का वर्णन करता है।

🚀 दिव्य रथ (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः रावणो दुर्धर्षो रथेनादित्यतेजसा ।
युक्तेन राक्षसैर्घोरैः प्रययौ रणमूर्धनि ॥
तस्य रथस्य घोषेण दिशः सर्वा विनादिताः ।
प्राकम्पत मही चैव सशैलवनकानना ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रावणः = रावण; दुर्धर्षः = अजेय; रथेन = रथ से; आदित्यतेजसा = सूर्य के समान तेज वाले; युक्तेन = युक्त; राक्षसैः = राक्षसों से; घोरैः = भयंकर; प्रययौ = गया; रणमूर्धनि = रणभूमि में; तस्य = उसके; रथस्य = रथ के; घोषेण = घोष से; दिशः = दिशाएँ; सर्वाः = सभी; विनादिताः = गूंज उठीं; प्राकम्पत = काँप उठी; मही = पृथ्वी; च = और; एव = ही; सशैलवनकानना = पर्वत, वन और काननों सहित।
📖 भावार्थ : तब अजेय रावण सूर्य के समान तेज वाले रथ पर, भयंकर राक्षसों से युक्त होकर, रणभूमि में गया। उसके रथ के घोष से सभी दिशाएँ गूंज उठीं और पर्वत, वन और काननों सहित पृथ्वी काँप उठी।
॥ श्लोक ७-१० ॥
तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे व्यथिताश्च द्रुतं ययुः ।
रामस्यान्तिकमासाद्य शरण्यं शरणैषिणः ॥
📖 भावार्थ : उसे देखकर सभी वानर व्यथित हो गए और शरण चाहते हुए शरणदाता राम के पास शीघ्र गए।

😨 वानरों का भय (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१६ ॥
रामः समीक्ष्य तान् सर्वान् भयत्रस्तान् प्लवंगमान् ।
उवाच वचनं धीमान् संत्रस्तान् समुदीक्ष्य च ॥
न भेतव्यं प्लवंगाश्च नैषा सत्या विनिर्मिता ।
माया रावणराजस्य विनशिष्यति सायकैः ॥
📖 भावार्थ : राम ने उन सभी भयत्रस्त वानरों को देखकर, उन संत्रस्तों की ओर देखते हुए, धीमान् राम ने कहा: "हे प्लवंगमो, डरना नहीं चाहिए। यह रावणराज की माया सत्य नहीं है, यह मेरे बाणों से नष्ट हो जाएगी।"
॥ श्लोक १७-२० ॥
तच्छ्रुत्वा वानराः सर्वे राघवस्य वचः शुभम् ।
त्यक्त्वा भयं महात्मानो युद्धायैव मनो दधुः ॥
📖 भावार्थ : राघव के उन शुभ वचनों को सुनकर सभी वानरों ने भय त्यागकर, वे महात्मा युद्ध के लिए मन लगा बैठे।

🛡️ युद्ध की तैयारी (श्लोक २१-३४)

॥ श्लोक २१-२७ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा धनुरादाय वीर्यवान् ।
उवाच लक्ष्मणं वीरं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
सज्जीभवन्तु सैन्यानि रावणं प्रति द्रुतम् ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा वीर्यवान् श्रीराम ने धनुष उठाकर वीर लक्ष्मण और महाबली सुग्रीव से कहा: "सेनाएँ रावण के विरुद्ध शीघ्र सज्ज हो जाएँ।"
॥ श्लोक २८-३४ ॥
ततः प्रहृष्टा वानराः सुग्रीवप्रमुखास्तदा ।
नर्दन्तः सिंहनादांश्च चेलुः सर्वे समन्ततः ॥
इत्येष एकोनषष्टितमः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
रावणस्य समारोहो रामस्य च महोद्यमः ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव आदि प्रमुख वानर हर्षित होकर सिंहनाद करते हुए चारों ओर से चल दिए। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह उनसठवाँ सर्ग है, जिसमें रावण का समारोह (रथारोहण) और राम का महान उद्यम वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🚀 रावण का प्रताप

रावण के रथ की ध्वनि से तीनों लोक काँप उठे, जो उसकी शक्ति का प्रतीक है।

🦍 राम का आत्मविश्वास

राम ने वानरों को आश्वस्त किया और युद्ध के लिए तैयार किया।

🎯 शिक्षा : नेता का आत्मविश्वास पूरी सेना में साहस का संचार करता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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