युद्ध काण्ड अध्याय 58

रावण का अंतिम युद्ध के लिए तैयार होना

रावण अपने सभी शेष राक्षसों को एकत्रित करता है और अंतिम युद्ध के लिए तैयार होता है। वह स्वयं रथ पर सवार होकर युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है।

विवरण

अहिरावण के वध और राम-लक्ष्मण की वापसी का समाचार सुनकर रावण क्रोधित होता है। वह अपने सभी शेष राक्षसों को एकत्रित करता है और उन्हें अंतिम युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश देता है। रावण स्वयं रथ पर सवार होता है, अनेक अस्त्र-शास्त्रों से सुसज्जित होता है, और युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है। उसके साथ विशाल राक्षस सेना भी चलती है।

(रावण का अंतिम युद्ध के लिए तैयार होना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अहिरावण के वध और राम-लक्ष्मण की वापसी के बाद रावण ने अंतिम युद्ध का निर्णय लिया। उसने सभी शेष राक्षसों को एकत्रित किया और स्वयं रथ पर सवार होकर युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किया। यह सर्ग उसकी तैयारी का वर्णन करता है।

😤 रावण का क्रोध (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः श्रुत्वा हतं पाताले अहिरावणमात्मजम् ।
रावणः क्रोधताम्राक्षः सर्वान् रक्षांस्यचोदयत् ॥
सज्जीभवन्तु सैन्यानि युद्धायैव समन्ततः ।
अद्य रामं वधिष्यामि सुग्रीवं च सलक्ष्मणम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; श्रुत्वा = सुनकर; हतम् = मारे गए; पाताले = पाताल में; अहिरावणम् = अहिरावण को; आत्मजम् = पुत्र; रावणः = रावण; क्रोधताम्राक्षः = क्रोध से ताम्र नेत्र वाला; सर्वान् = सभी; रक्षांसि = राक्षसों को; अचोदयत् = प्रेरित किया; सज्जीभवन्तु = तैयार हो जाओ; सैन्यानि = सेनाएँ; युद्धाय = युद्ध के लिए; एव = ही; समन्ततः = चारों ओर से; अद्य = आज; रामम् = राम को; वधिष्यामि = मारूंगा; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; च = और; सलक्ष्मणम् = लक्ष्मण सहित।
📖 भावार्थ : तब पाताल में अपने पुत्र अहिरावण के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण क्रोध से लाल-लाल नेत्रों वाला हो गया और सभी राक्षसों को प्रेरित किया: "सेनाएँ चारों ओर से युद्ध के लिए तैयार हो जाएँ। आज मैं राम, सुग्रीव और लक्ष्मण को मार डालूँगा।"
॥ श्लोक ५-८ ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा राक्षसाः क्रोधमूर्च्छिताः ।
सज्जीभूता महावीर्याः प्रायुध्यन्त समन्ततः ॥
📖 भावार्थ : रावण का वचन सुनकर राक्षस क्रोध से मूर्च्छित हो गए और महावीर्य होकर तैयार हो गए तथा चारों ओर से युद्ध के लिए आगे बढ़े।

🚩 रथ पर आरूढ़ (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
रावणोऽपि महातेजा आरुरोह रथं महत् ।
तप्तकाञ्चनचित्राङ्गं ध्वजिनं हेमभूषणम् ॥
तस्मिन् रथे समारूढो रावणो राक्षसेश्वरः ।
शुशुभेऽतीव दुष्टात्मा युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ॥
📖 भावार्थ : महातेजा रावण ने भी उस महान रथ पर चढ़ाई की, जो तपे हुए सोने से चित्रित था, ध्वजा से युक्त था और हेम आभूषणों से सुशोभित था। उस रथ पर आरूढ़ राक्षसेश्वर रावण अत्यंत शोभायमान हो रहा था, मानो युगान्त की अग्नि प्रज्वलित हो रही हो।
॥ श्लोक १५-२० ॥
तस्य यातस्य संग्रामे रावणस्य दुरात्मनः ।
बभूव तुमुलः शब्दः सागरस्येव पर्वणि ॥
📖 भावार्थ : उस दुरात्मा रावण के संग्राम में जाने पर वैसा ही तुमुल शब्द हुआ जैसा समुद्र के पर्व के दिन होता है।

🛡️ युद्ध की तैयारी (श्लोक २१-३५)

॥ श्लोक २१-२७ ॥
रामोऽपि सुग्रीवमुखैर्वानरैः परिवारितः ।
युद्धायाभिमुखः स्थित्वा रावणं प्रति संयुगे ॥
📖 भावार्थ : राम भी सुग्रीव आदि वानरों से घिरे हुए, युद्ध के लिए अभिमुख होकर, रावण के विरुद्ध युद्ध में स्थित हो गए।
॥ श्लोक २८-३५ ॥
इत्येष अष्टपञ्चाशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
रावणस्य समुद्योगो रामस्य च महोद्यमः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह अट्ठावनवाँ सर्ग है, जिसमें रावण का समुद्योग (तैयारी) और राम का महान उद्यम वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 अंतिम संघर्ष

यह सर्ग राम और रावण के बीच अंतिम और निर्णायक युद्ध की भूमिका तैयार करता है।

🔥 रावण का प्रताप

रावण का रथ पर आरूढ़ होना और उसकी सेना का भयानक शब्द उसके प्रताप को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : अंतिम समय में भी धैर्य और साहस नहीं छोड़ना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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