युद्ध काण्ड अध्याय 57

राम-लक्ष्मण की वापसी

राम, लक्ष्मण और हनुमान पाताल से वापस लौटते हैं। वानर सेना उन्हें देखकर अत्यंत हर्षित होती है।

विवरण

अहिरावण के वध के बाद हनुमान राम और लक्ष्मण को मुक्त कराते हैं। तीनों पाताल से वापस लौटते हैं। जब वे वानर सेना के बीच पहुँचते हैं, तो सभी वानर अत्यंत हर्षित होते हैं। सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान आदि सभी राम-लक्ष्मण को देखकर आनंदित होते हैं। विभीषण भी प्रसन्न होते हैं। राम हनुमान की प्रशंसा करते हैं और सभी मिलकर आगामी युद्ध की तैयारी करते हैं।

(राम-लक्ष्मण की वापसी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अहिरावण का वध करके हनुमान राम-लक्ष्मण को लेकर पाताल से वापस लौटे। उनकी सकुशल वापसी से वानर सेना में हर्ष और उल्लास छा गया। यह सर्ग उस आनंद के क्षण का वर्णन करता है।

🎊 वापसी और हर्ष (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः हनूमान् सहितो रामलक्ष्मणवानरः ।
पातालाद्विनिष्क्रम्य ददृशे वानरान् बहून् ॥
तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे हर्षनादान् प्रचक्रिरे ।
रामलक्ष्मणमासाद्य मुदिताः सुखिनोऽभवन् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; हनूमान् = हनुमान; सहितः = सहित; रामलक्ष्मणवानरः = राम-लक्ष्मण और वानरों के साथ; पातालात् = पाताल से; विनिष्क्रम्य = निकलकर; ददृशे = दिखाई दिए; वानरान् = वानरों को; बहून् = बहुत से; तम् = उनको; दृष्ट्वा = देखकर; वानराः = वानर; सर्वे = सभी; हर्षनादान् = हर्षनाद; प्रचक्रिरे = करने लगे; रामलक्ष्मणम् = राम-लक्ष्मण को; आसाद्य = पाकर; मुदिताः = प्रसन्न; सुखिनः = सुखी; अभवन् = हो गए।
📖 भावार्थ : तब हनुमान राम-लक्ष्मण और वानरों के साथ पाताल से निकलकर वानरों के समक्ष आए। उन्हें देखकर सभी वानरों ने हर्षनाद किए। राम-लक्ष्मण को पाकर वे प्रसन्न और सुखी हो गए।
॥ श्लोक ७-१० ॥
सुग्रीवोऽपि महातेजा रामं दृष्ट्वा महाबलम् ।
प्रहर्षमतुलं लेभे विभीषणसमन्वितः ॥
📖 भावार्थ : महातेजा सुग्रीव भी उस महाबली राम को देखकर विभीषण के साथ अद्वितीय हर्ष को प्राप्त हुए।

🙏 राम का आशीर्वाद (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१६ ॥
रामः सर्वान् समाश्वास्य वानरान् हरियूथपान् ।
उवाच लक्ष्मणं वीरं हनूमन्तं च मारुतिम् ॥
भवद्भिर्निहतः शत्रुः पाताले राक्षसाधिपः ।
कृतकार्याः स्म सुग्रीव युद्धायाभिमुखा वयम् ॥
📖 भावार्थ : राम ने सभी वानरों और हरियूथपों को आश्वस्त करके वीर लक्ष्मण और हनुमान से कहा: "आप लोगों ने पाताल में राक्षसाधिप शत्रु को मार डाला। हे सुग्रीव, हम कृतकार्य हो गए हैं और युद्ध के लिए अभिमुख हैं।"
॥ श्लोक १७-२० ॥
ततः सर्वे महात्मानो रामेण सहिता ययुः ।
युद्धाय कृतसंकल्पा रावणं प्रति राक्षसम् ॥
📖 भावार्थ : तब सभी महात्मा राम के साथ, युद्ध के लिए कृतसंकल्प होकर, उस राक्षस रावण के विरुद्ध चल दिए।

⚔️ युद्ध की तैयारी (श्लोक २१-३२)

॥ श्लोक २१-२७ ॥
सुग्रीवो वानरान् सर्वान् समानीय महाबलान् ।
युद्धायाभिमुखान् चक्रे रावणस्य वधाय वै ॥
📖 भावार्थ : सुग्रीव ने सभी महाबली वानरों को एकत्रित करके रावण के वध के लिए युद्ध के लिए तैयार कर दिया।
॥ श्लोक २८-३२ ॥
इत्येष सप्तपञ्चाशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
रामलक्ष्मणयोः प्राप्तिर्वानराणां च हर्षणम् ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह सत्तावनवाँ सर्ग है, जिसमें राम-लक्ष्मण की प्राप्ति और वानरों का हर्ष वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙌 हर्ष और उल्लास

राम-लक्ष्मण की वापसी से वानर सेना में जो हर्ष छा गया, वह उनके प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक है।

🛡️ युद्ध की तैयारी

अब अंतिम युद्ध के लिए सब तैयार हैं, जो राम की विजय सुनिश्चित करेगा।

🎯 शिक्षा : नेतृत्व का संकट में भी धैर्य बनाए रखना और सेना का मनोबल बढ़ाना आवश्यक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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