युद्ध काण्ड अध्याय 56

हनुमान् द्वारा अहिरावण का वध

हनुमान पाताल में प्रवेश करते हैं, अहिरावण का वध करते हैं और राम-लक्ष्मण को मुक्त कराकर वापस लाते हैं।

विवरण

हनुमान विभीषण के साथ पाताल लोक पहुँचते हैं। वहाँ वे अहिरावण की राजधानी में प्रवेश करते हैं। अहिरावण ने राम-लक्ष्मण को बंदी बना रखा है और उनकी बलि देने की तैयारी कर रहा है। हनुमान छोटा रूप धारण कर अहिरावण के महल में घुसते हैं। वे राम-लक्ष्मण को ढूँढ़ लेते हैं। अहिरावण से हनुमान का भीषण युद्ध होता है। हनुमान अहिरावण का वध कर देते हैं और राम-लक्ष्मण को मुक्त कराते हैं। तीनों वापस लंका लौट आते हैं, जहाँ वानर सेना उन्हें देखकर अत्यंत हर्षित होती है।

(हनुमान् द्वारा अहिरावण का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्पञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अहिरावण ने राम-लक्ष्मण का हरण कर पाताल ले जाकर उनकी बलि देने की तैयारी की। हनुमान ने विभीषण के साथ पाताल में प्रवेश किया और अहिरावण का वध कर दोनों भाइयों को मुक्त कराया। यह सर्ग उस अद्वितीय पराक्रम का वर्णन करता है।

🌍 पाताल प्रवेश (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः हनूमान् तेजस्वी विभीषणसमन्वितः ।
पातालं प्रययौ वीरो रामलक्ष्मणकारणात् ॥
ददर्श तत्र राक्षस्यो राक्षसांश्च सहस्रशः ।
प्रविश्य नगरं तस्य अहिरावणरक्षसः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; हनूमान् = हनुमान; तेजस्वी = तेजस्वी; विभीषणसमन्वितः = विभीषण के साथ; पातालम् = पाताल को; प्रययौ = गए; वीरः = वीर; रामलक्ष्मणकारणात् = राम-लक्ष्मण के कारण; ददर्श = देखा; तत्र = वहाँ; राक्षस्यः = राक्षसियों को; राक्षसान् = राक्षसों को; च = और; सहस्रशः = हजारों; प्रविश्य = प्रवेश करके; नगरम् = नगर में; तस्य = उसके; अहिरावणरक्षसः = अहिरावण राक्षस के।
📖 भावार्थ : तब तेजस्वी वीर हनुमान विभीषण के साथ, राम-लक्ष्मण के कारण पाताल को गए। वहाँ उन्होंने हजारों राक्षसियों और राक्षसों को देखा और उस अहिरावण राक्षस के नगर में प्रवेश किया।
॥ श्लोक ७-१० ॥
तत्रापश्यन् महात्मानौ रामलक्ष्मणवानरौ ।
बद्धौ राक्षसराजेन अहिरावणेन धीमता ॥
📖 भावार्थ : वहाँ उन्होंने उन महात्मा राम-लक्ष्मण को देखा, जो उस बुद्धिमान राक्षसराज अहिरावण द्वारा बाँधे गए थे।

⚔️ अहिरावण का वध (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
ततः हनूमान् संक्रुद्धो अहिरावणमब्रवीत् ।
मुञ्च एनौ महाबाहो नो चेत् त्वां नाशयाम्यहम् ॥
अहिरावणस्तु तच्छ्रुत्वा हनूमन्तमथाब्रवीत् ।
कस्त्वं वानररूपेण मम राज्ये प्रविष्टवान् ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान ने क्रुद्ध होकर अहिरावण से कहा: "हे महाबाहो, इन दोनों को छोड़ दो, नहीं तो मैं तुम्हें नष्ट कर दूँगा।" अहिरावण ने यह सुनकर हनुमान से कहा: "तुम कौन हो, जो वानर रूप में मेरे राज्य में प्रवेश कर गए हो?"
॥ श्लोक १९-२५ ॥
हनूमान् प्रत्युवाचेदं रामदूतो हनूमति ।
विभीषणसहायोऽहं त्वां हनिष्यामि संयुगे ॥
ततः प्रवृत्तं तुमुलं युद्धं हनूमदाहवे ।
हनूमान् राक्षसं हत्वा रामलक्ष्मणमानयत् ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने उत्तर दिया: "मैं रामदूत हनुमान हूँ, विभीषण के सहायक के रूप में हूँ और युद्ध में तुम्हें मार डालूँगा।" तब हनुमान और अहिरावण के बीच घोर युद्ध हुआ। हनुमान ने राक्षस को मारकर राम-लक्ष्मण को मुक्त कराया।

🎉 वापसी और हर्ष (श्लोक २६-४४)

॥ श्लोक २६-३५ ॥
ततः प्रीतो महातेजा रामो वचनमब्रवीत् ।
हनूमन् कृतकार्यस्त्वं मम प्रियमुपागतः ॥
वरं वृणीष्व भद्रं ते यथेष्टं कुरु सत्वरम् ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न हुए महातेजा राम ने कहा: "हे हनुमान, तुमने कृतकार्य होकर मुझे प्रिय कार्य किया है। तुम वर माँगो, तुम्हारा भला हो, जैसी इच्छा हो वैसा शीघ्र करो।"
॥ श्लोक ३६-४४ ॥
हनूमान् प्रत्युवाचेदं रामं सत्यपराक्रमम् ।
भवत्प्रसादादेवाहं सर्वं प्राप्नोमि राघव ॥
इत्येष षट्पञ्चाशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
अहिरावणवधो यत्र हनूमत्पराक्रमः ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने सत्यपराक्रमी राम से कहा: "हे राघव, आपके प्रसाद से ही मैं सब कुछ प्राप्त करता हूँ।" इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह छप्पनवाँ सर्ग है, जिसमें अहिरावण का वध और हनुमान का पराक्रम वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦍 हनुमान की भक्ति

हनुमान ने अपने प्रभु के लिए पाताल जाकर अहिरावण का वध किया, जो उनकी अनन्य भक्ति और निष्ठा का प्रतीक है।

🙏 राम का आशीर्वाद

राम ने हनुमान को वरदान देने की इच्छा व्यक्त की, जो उनके प्रति उनके स्नेह को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : सच्ची भक्ति और निष्ठा से कोई भी असंभव कार्य संभव हो जाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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