युद्ध काण्ड अध्याय 55

अहिरावण द्वारा राम-लक्ष्मण का हरण

अहिरावण माया का प्रयोग करके राम और लक्ष्मण को सुला देता है और उनका हरण करके पाताल ले जाता है। वानर सेना में हाहाकार मच जाता है।

विवरण

अहिरावण ने अपनी माया से राम और लक्ष्मण को योगनिद्रा में सुला दिया। फिर उसने दोनों भाइयों को उठाकर पाताललोक ले गया। प्रातःकाल जब वानरों ने राम-लक्ष्मण को नहीं देखा, तो उनमें हाहाकार मच गया। विभीषण ने बताया कि यह अहिरावण का काम है, जो पाताल का राजा है और रावण का मित्र है। सभी वानर चिंतित हो गए। हनुमान ने राम-लक्ष्मण को खोजने का निश्चय किया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ५५

(अहिरावण द्वारा राम-लक्ष्मण का हरण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अहिरावण ने अपनी माया से राम-लक्ष्मण को सुलाकर उनका हरण कर लिया और पाताल ले गया। इस घटना से वानर सेना में शोक और हाहाकार मच गया। यह सर्ग उस दुःखद घटना का वर्णन करता है।

😴 योगनिद्रा का प्रयोग (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः अहिरावणो राजन् मायामास्थाय राक्षसीम् ।
प्रविवेश महाबाहुः सेनयोरुभयोरपि ॥
योगनिद्रां तदा चक्रे रामलक्ष्मणयोर्बली ।
सुप्तौ तौ पुरुषव्याघ्रौ कृत्वा तूर्णमुपानयत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; अहिरावणः = अहिरावण; राजन् = हे राजा; मायाम् = माया; आस्थाय = धारण कर; राक्षसीम् = राक्षसी; प्रविवेश = प्रवेश किया; महाबाहुः = महाबाहु; सेनयोः = सेनाओं में; उभयोः = दोनों; अपि = ही; योगनिद्राम् = योगनिद्रा; तदा = तब; चक्रे = की; रामलक्ष्मणयोः = राम-लक्ष्मण पर; बली = बलशाली; सुप्तौ = सोए हुए; तौ = उन दोनों; पुरुषव्याघ्रौ = पुरुषव्याघ्रों को; कृत्वा = करके; तूर्णम् = शीघ्र; उपानयत् = ले गया।
📖 भावार्थ : तब हे राजन्, महाबाहु अहिरावण ने राक्षसी माया धारण कर दोनों सेनाओं में प्रवेश किया। उस बलशाली ने राम-लक्ष्मण पर योगनिद्रा का प्रयोग किया। उन पुरुषव्याघ्रों को सुलाकर वह उन्हें शीघ्र ही उठा ले गया।
॥ श्लोक ६-८ ॥
पातालं प्रययौ वीरो हर्षेण महता वृतः ।
राक्षसैः बहुभिः सार्धं रामलक्ष्मणवानरौ ॥
📖 भावार्थ : वह वीर महान हर्ष से भरकर, बहुत से राक्षसों के साथ, राम-लक्ष्मण को लेकर पाताल चला गया।

😢 वानरों में हाहाकार (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
ततः प्रभाते विमले न ददर्शुः प्लवंगमाः ।
रामं लक्ष्मणमुख्यांश्च सुग्रीवो विह्वलोऽभवत् ॥
हाहाकारो महानासीत् वानराणां विशां पते ।
क्व नु रामः क्व लक्ष्मणः क्व वा गताविति ब्रुवन् ॥
📖 भावार्थ : तब प्रातःकाल में वानरों ने राम और लक्ष्मण को नहीं देखा। सुग्रीव विह्वल हो गए। वानरों में हाहाकार मच गया, हे विशांपते, वे कहने लगे: "कहाँ गए राम? कहाँ गए लक्ष्मण?"
॥ श्लोक १५-२० ॥
ततो विभीषणो धीमान् विज्ञाय मायिकं नृप ।
उवाच वानरान् सर्वान् अहिरावणचेष्टितम् ॥
अनेन राक्षसेन्द्रेण पातालाधिपतिना बली ।
रामलक्ष्मणावुद्धृतौ नात्र कार्या विचारणा ॥
📖 भावार्थ : तब धीमान् विभीषण ने उस माया को जानकर, हे नृप, सभी वानरों से अहिरावण की चेष्टा बताई: "इस बलशाली राक्षसेन्द्र ने, जो पाताल का अधिपति है, राम-लक्ष्मण को उठा लिया है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।"

🦍 हनुमान का निश्चय (श्लोक २१-३६)

॥ श्लोक २१-२७ ॥
तच्छ्रुत्वा हनुमान् वीरो वाक्यं विभीषणेरितम् ।
प्रत्युवाच महातेजाः सुग्रीवं वानराधिपम् ॥
अहं गच्छामि पातालं रामलक्ष्मणकारणात् ।
आनेष्यामि च तौ वीरौ हत्वा तं राक्षसाधिपम् ॥
📖 भावार्थ : विभीषण के उस वचन को सुनकर वीर हनुमान ने, महातेजा ने, वानराधिप सुग्रीव से कहा: "मैं राम-लक्ष्मण के कारण पाताल जाता हूँ। उस राक्षसाधिप को मारकर उन दोनों वीरों को ले आऊँगा।"
॥ श्लोक २८-३६ ॥
ततः सुग्रीवो वचनं हनूमन्तमथाब्रवीत् ।
गच्छ वीर महाबाहो शीघ्रं कार्यं समापय ॥
हनूमान् अथ तेजस्वी विभीषणसमन्वितः ।
पातालं प्रययौ वीरो रामलक्ष्मणकारणात् ॥
इत्येष पञ्चपञ्चाशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
अहिरावणचेष्टितं रामलक्ष्मणहरणम् ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव ने हनुमान से कहा: "हे वीर महाबाहो, जाओ, शीघ्र कार्य समाप्त करो।" तब तेजस्वी हनुमान विभीषण के साथ, राम-लक्ष्मण के कारण पाताल को गए। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह पचपनवाँ सर्ग है, जिसमें अहिरावण की चेष्टा और राम-लक्ष्मण का हरण वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌀 माया का प्रभाव

अहिरावण की माया से राम-लक्ष्मण भी सो गए, जो दर्शाता है कि माया का प्रभाव बड़े से बड़े योद्धा पर भी हो सकता है।

🦍 हनुमान की भक्ति

हनुमान ने तुरंत राम-लक्ष्मण को खोजने का निश्चय किया, जो उनकी अनन्य भक्ति को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : विपत्ति में धैर्य नहीं खोना चाहिए और तुरंत समाधान ढूँढना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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