युद्ध काण्ड अध्याय 52

रावण का मकराक्ष को सेनापति बनाना

अतिकाय के वध से क्रोधित रावण मकराक्ष को सेनापति नियुक्त करता है। मकराक्ष, जो खर का पुत्र है, विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए प्रस्थान करता है।

विवरण

अतिकाय के वध का समाचार सुनकर रावण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वह अपने सेनापतियों को बुलाता है। तब मकराक्ष, जो खर का पुत्र है और अत्यंत पराक्रमी है, स्वयं युद्ध के लिए आगे आता है। रावण उसे सेनापति नियुक्त करता है। मकराक्ष विशाल राक्षस सेना के साथ युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है। उसे देखकर वानर सेना में पुनः भय का संचार होता है।

(रावण का मकराक्ष को सेनापति बनाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अतिकाय के वध के बाद रावण ने खरपुत्र मकराक्ष को सेनापति नियुक्त किया। मकराक्ष प्रतिशोध की अग्नि में जल रहा था, क्योंकि उसके पिता खर का वध राम ने किया था। यह सर्ग उसकी नियुक्ति और युद्ध के लिए प्रस्थान का वर्णन करता है।

😤 रावण का क्रोध (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः श्रुत्वा हतं संख्ये अतिकायं महाबलम् ।
रावणः क्रोधसंयुक्तो मकराक्षमथाब्रवीत् ॥
गच्छ त्वं राक्षसश्रेष्ठ सैन्येन महता वृतः ।
रामं लक्ष्मणमुख्यांश्च जहि शत्रून्ममाज्ञया ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; श्रुत्वा = सुनकर; हतम् = मारे गए; संख्ये = युद्ध में; अतिकायम् = अतिकाय को; महाबलम् = महाबली; रावणः = रावण; क्रोधसंयुक्तः = क्रोध से युक्त; मकराक्षम् = मकराक्ष को; अथ = तब; अब्रवीत् = बोला; गच्छ = जाओ; त्वम् = तुम; राक्षसश्रेष्ठ = राक्षसश्रेष्ठ; सैन्येन = सेना के साथ; महता = महान; वृतः = घिरे हुए; रामम् = राम को; लक्ष्मणमुख्यान् = लक्ष्मण आदि प्रमुखों को; जहि = मारो; शत्रून् = शत्रुओं को; मम = मेरी; आज्ञया = आज्ञा से।
📖 भावार्थ : तब युद्ध में महाबली अतिकाय के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण क्रोध से युक्त हो गया और मकराक्ष से बोला: "हे राक्षसश्रेष्ठ, शीघ्र जाओ, महान सेना से घिरे हुए। राम और लक्ष्मण आदि प्रमुख शत्रुओं को मेरी आज्ञा से मार डालो।"
॥ श्लोक ६-८ ॥
स तु रावणवाक्येन मकराक्षो महाबलः ।
आरुरोह रथं शीघ्रं राक्षसैः बहुभिर्वृतः ॥
📖 भावार्थ : उस महाबली मकराक्ष ने रावण के वचन से शीघ्र ही रथ पर चढ़ाई की और बहुत से राक्षसों से घिर गया।

🚩 सेना का प्रस्थान (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
तस्य यातस्य संग्रामे मकराक्षस्य धीमतः ।
बभूव तुमुलः शब्दः सागरस्येव पर्वणि ॥
रथनेमिस्वनैर्घोरैर्भेरीशङ्खरवैस्तथा ।
दिशः सर्वा विरेजुश्च प्रकम्पितमहीतलाः ॥
📖 भावार्थ : उस बुद्धिमान मकराक्ष के संग्राम में जाने पर वैसा ही तुमुल शब्द हुआ जैसा समुद्र के पर्व के दिन होता है। रथ के नेमि की घोर ध्वनि तथा भेरी और शंख के रव से सभी दिशाएँ गूंज उठीं और पृथ्वी का तल काँप उठा।
॥ श्लोक १५-२० ॥
ततो वानरसैन्यानि दृष्ट्वा राक्षसमागतम् ।
व्यथितानि दिशो याता राक्षसं घोरदर्शनम् ॥
रामस्तु प्रत्युवाचेदं सुग्रीवं सत्यविक्रमः ।
न भेतव्यं प्लवंगेन्द्र मया सार्धं समागतः ॥
📖 भावार्थ : तब राक्षस को आया देखकर वानर सेनाएँ व्यथित होकर दिशाओं को भागने लगीं। सत्यविक्रम राम ने सुग्रीव से कहा: "हे प्लवंगेन्द्र, डरना नहीं चाहिए। वह मेरे साथ युद्ध के लिए आया है।"

🛡️ युद्ध की तैयारी (श्लोक २१-३४)

॥ श्लोक २१-२७ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा धनुरादाय वीर्यवान् ।
उवाच लक्ष्मणं वीरं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
सज्जीभवन्तु सैन्यानि मकराक्षं प्रति द्रुतम् ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा वीर्यवान् श्रीराम ने धनुष उठाकर वीर लक्ष्मण और महाबली सुग्रीव से कहा: "सेनाएँ मकराक्ष के विरुद्ध शीघ्र सज्ज हो जाएँ।"
॥ श्लोक २८-३४ ॥
ततः प्रहृष्टा वानराः सुग्रीवप्रमुखास्तदा ।
नर्दन्तः सिंहनादांश्च चेलुः सर्वे समन्ततः ॥
इत्येष द्विपञ्चाशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
मकराक्षाभिषेको यो रावणस्य च निश्चयः ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव आदि प्रमुख वानर हर्षित होकर सिंहनाद करते हुए चारों ओर से चल दिए। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह बावनवाँ सर्ग है, जिसमें मकराक्ष का अभिषेक (सेनापति नियुक्ति) और रावण का निश्चय वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👿 मकराक्ष का प्रतिशोध

मकराक्ष अपने पिता खर के वध का बदला लेने के लिए युद्ध में उतरता है, जो उसके मन में व्याप्त द्वेष को दर्शाता है।

🦍 राम का आत्मविश्वास

राम बार-बार वानरों को आश्वस्त करते हैं, जो उनके नेतृत्व कौशल को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : बदले की भावना से किए गए कार्य प्रायः विनाशकारी होते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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