युद्ध काण्ड अध्याय 51

अतिकाय का वध

अतिकाय और वानर सेना के बीच घोर युद्ध होता है। अंततः लक्ष्मण ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके अतिकाय का वध कर देते हैं।

विवरण

रावण ने अपने पुत्र अतिकाय को सेनापति नियुक्त कर युद्ध के लिए भेजा। अतिकाय अत्यंत बलशाली और मायावी था। उसने वानरों पर भीषण आक्रमण किया, जिससे वानर सेना में हाहाकार मच गया। तब लक्ष्मण उसके सामने आए। दोनों में घोर युद्ध हुआ। अतिकाय ने अनेक अस्त्रों का प्रयोग किया, किन्तु लक्ष्मण ने उन सबको निष्फल कर दिया। अंततः लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र का संधान किया और अतिकाय के वक्ष पर प्रहार किया। अतिकाय मारा गया। उसके मरते ही राक्षस सेना में भगदड़ मच गई और वानरों में उत्साह छा गया।

(अतिकाय का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अतिकाय रावण का महापराक्रमी पुत्र था। उसने वानरों पर भीषण आक्रमण किया। तब लक्ष्मण उसके सामने आए और घोर युद्ध के बाद ब्रह्मास्त्र से उसका वध कर दिया। यह सर्ग उस अद्वितीय युद्ध का वर्णन करता है।

⚔️ युद्ध का आरंभ (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः अतिकायः क्रोधवशो लक्ष्मणं प्रति संयुगे ।
चिक्षेप बहुभिर्बाणैः सर्वगात्रेषु भीषणैः ॥
लक्ष्मणोऽपि महातेजाश्चिच्छेद तान् शरैः शितैः ।
न चचाल च संक्रुद्धः पर्वतो मेरुरादिवत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; अतिकायः = अतिकाय; क्रोधवशः = क्रोध के वश में; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण पर; प्रति = प्रति; संयुगे = युद्ध में; चिक्षेप = छोड़ा; बहुभिः = बहुत से; बाणैः = बाणों से; सर्वगात्रेषु = सभी अंगों में; भीषणैः = भयंकर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; अपि = भी; महातेजाः = महान तेज वाले; चिच्छेद = काट डाला; तान् = उनको; शरैः = बाणों से; शितैः = तीक्ष्ण; न चचाल = नहीं हिले; च = और; संक्रुद्धः = अत्यंत क्रोधित; पर्वतः = पर्वत; मेरुः = मेरु; आदिवत् = आदि की तरह।
📖 भावार्थ : तब क्रोध के वश में हुए अतिकाय ने युद्ध में लक्ष्मण पर बहुत से भयंकर बाण चलाए। महातेजा लक्ष्मण ने उन बाणों को तीक्ष्ण बाणों से काट दिया और अत्यंत क्रोधित होकर भी वह मेरु पर्वत की भाँति स्थिर रहे।
॥ श्लोक ७-१० ॥
ततः शरशतैस्तीक्ष्णैः प्रच्छादयत राक्षसः ।
लक्ष्मणं रणमध्ये तु विभीषणमथापि च ॥
📖 भावार्थ : तब उस राक्षस ने सैकड़ों तीक्ष्ण बाणों से रणमध्य में लक्ष्मण और विभीषण को ढक दिया।

🛡️ लक्ष्मण का धैर्य (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
लक्ष्मणस्तु महातेजा विभीषणमुवाच ह ।
पश्य राक्षसजं वीर्यं मम चापि पराक्रमम् ॥
अद्य पातयिता भूमौ शिरस्तस्य दुरात्मनः ॥
📖 भावार्थ : महातेजा लक्ष्मण ने विभीषण से कहा: "हे वीर, देखो इस राक्षस के वीर्य और मेरे पराक्रम को। आज मैं उस दुरात्मा के सिर को भूमि पर गिरा दूंगा।"
॥ श्लोक १८-२२ ॥
ततः संक्रुद्धो राक्षेन्द्रः शक्तिं जग्राह भीषणाम् ।
लक्ष्मणाय चिक्षेप सर्वप्राणहरां रणे ॥
लक्ष्मणस्तु तया विद्धो न चचाल महाबलः ॥
📖 भावार्थ : तब अत्यंत क्रुद्ध अतिकाय ने भीषण शक्ति उठाई और लक्ष्मण पर चलाई, जो सर्वप्राणहरा थी। उस शक्ति से विद्ध होकर भी महाबली लक्ष्मण नहीं हिले।

🏹 ब्रह्मास्त्र का प्रयोग (श्लोक २३-३२)

॥ श्लोक २३-२८ ॥
लक्ष्मणस्तु तदा राजन् विभीषणवचः शृणु ।
ब्रह्मास्त्रं प्रसमाधाय मुमोचैनदरिंदमः ॥
तदस्त्रं प्रज्वलन् दीप्त्या अतिकायस्य वधाय वै ।
जगाम रथिनां श्रेष्ठं अतिकायं रणमूर्धनि ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्, तब लक्ष्मण ने विभीषण के वचन सुनकर ब्रह्मास्त्र का संधान किया और उसे छोड़ा। वह अस्त्र प्रज्वलित तेज से रथियों में श्रेष्ठ अतिकाय के वध के लिए रणभूमि में जा लगा।
॥ श्लोक २९-३२ ॥
तेनास्त्रेण हतः शत्रू अतिकायो निपातितः ।
हते तस्मिन् महावीर्ये राक्षसाः प्राद्रवन् भयात् ॥
वानराः सिंहनादांश्च चक्रुरुत्साहसंयुताः ॥
📖 भावार्थ : उस अस्त्र से मारा गया शत्रु अतिकाय निपातित हुआ। उस महावीर्य के मारे जाने पर राक्षस भय से भाग गए। वानरों ने उत्साह से सिंहनाद किए।

🎉 विजय का उत्सव (श्लोक ३३-४२)

॥ श्लोक ३३-३८ ॥
रामः श्रुत्वा प्रियं वाक्यं लक्ष्मणमिदमब्रवीत् ।
साधु सौम्य महाबाहो कृतं कर्म सुदुष्करम् ॥
त्वया निहतो दुर्धर्षो रावणस्य सुतो बली ॥
📖 भावार्थ : राम ने वह प्रिय समाचार सुनकर लक्ष्मण से कहा: "साधु, हे सौम्य महाबाहो, तुमने यह अत्यंत दुष्कर कर्म किया है। तुमने रावण के दुर्धर्ष बलशाली पुत्र को मार डाला।"
॥ श्लोक ३९-४२ ॥
इत्येष एकपञ्चाशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
अतिकायवधो यत्र लक्ष्मणस्य च विक्रमः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह इक्यावनवाँ सर्ग है, जिसमें अतिकाय का वध और लक्ष्मण का पराक्रम वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏹 ब्रह्मास्त्र का महत्व

लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके अतिकाय का वध किया, जो उनके दिव्य अस्त्रों के ज्ञान को दर्शाता है।

🙏 भ्रातृ-प्रेम

राम ने लक्ष्मण की प्रशंसा करके उनके उत्साह को और बढ़ाया।

🎯 शिक्षा : सद्बुद्धि और धैर्य से बड़ी से बड़ी बाधा को पार किया जा सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।