युद्ध काण्ड अध्याय 50

रावण का अतिकाय को सेनापति बनाना

महोदर के वध से क्रोधित रावण अतिकाय को सेनापति नियुक्त करता है और उसे युद्ध के लिए भेजता है। अतिकाय विशाल सेना के साथ युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है।

विवरण

महोदर के वध का समाचार सुनकर रावण पुनः क्रोधित होता है। वह अपने पुत्र अतिकाय को बुलाता है, जो अत्यंत पराक्रमी और बलशाली है। रावण उसे सेनापति नियुक्त करता है और राम-लक्ष्मण को मारने का आदेश देता है। अतिकाय विशाल सेना के साथ युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है। उसके रथ की ध्वनि से तीनों लोक कंपित हो जाते हैं।

(रावण का अतिकाय को सेनापति बनाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : महोदर के वध के बाद रावण ने अपने पुत्र अतिकाय को सेनापति नियुक्त किया। अतिकाय अत्यंत पराक्रमी था। यह सर्ग उसकी नियुक्ति और युद्ध के लिए प्रस्थान का वर्णन करता है।

😤 रावण का क्रोध (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः श्रुत्वा हतं संख्ये महोदरं महाबलम् ।
रावणः क्रोधसंयुक्तो अतिकायमथाब्रवीत् ॥
गच्छ पुत्र महाबाहो सैन्येन महता वृतः ।
रामं लक्ष्मणमुख्यांश्च जहि शत्रून्ममाज्ञया ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; श्रुत्वा = सुनकर; हतम् = मारे गए; संख्ये = युद्ध में; महोदरम् = महोदर को; महाबलम् = महाबली; रावणः = रावण; क्रोधसंयुक्तः = क्रोध से युक्त; अतिकायम् = अतिकाय को; अथ = तब; अब्रवीत् = बोला; गच्छ = जाओ; पुत्र = हे पुत्र; महाबाहो = महाबाहो; सैन्येन = सेना के साथ; महता = महान; वृतः = घिरे हुए; रामम् = राम को; लक्ष्मणमुख्यान् = लक्ष्मण आदि प्रमुखों को; जहि = मारो; शत्रून् = शत्रुओं को; मम = मेरी; आज्ञया = आज्ञा से।
📖 भावार्थ : तब युद्ध में महाबली महोदर के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण क्रोध से युक्त हो गया और अतिकाय से बोला: "हे पुत्र महाबाहो, शीघ्र जाओ, महान सेना से घिरे हुए। राम और लक्ष्मण आदि प्रमुख शत्रुओं को मेरी आज्ञा से मार डालो।"
॥ श्लोक ६-८ ॥
स तु रावणवाक्येन अतिकायो महाबलः ।
आरुरोह रथं शीघ्रं राक्षसैः बहुभिर्वृतः ॥
📖 भावार्थ : उस महाबली अतिकाय ने रावण के वचन से शीघ्र ही रथ पर चढ़ाई की और बहुत से राक्षसों से घिर गया।

🚩 सेना का प्रस्थान (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
तस्य यातस्य संग्रामे अतिकायस्य धीमतः ।
बभूव तुमुलः शब्दः सागरस्येव पर्वणि ॥
रथनेमिस्वनैर्घोरैर्भेरीशङ्खरवैस्तथा ।
दिशः सर्वा विरेजुश्च प्रकम्पितमहीतलाः ॥
📖 भावार्थ : उस बुद्धिमान अतिकाय के संग्राम में जाने पर वैसा ही तुमुल शब्द हुआ जैसा समुद्र के पर्व के दिन होता है। रथ के नेमि की घोर ध्वनि तथा भेरी और शंख के रव से सभी दिशाएँ गूंज उठीं और पृथ्वी का तल काँप उठा।
॥ श्लोक १५-२० ॥
ततो वानरसैन्यानि दृष्ट्वा राक्षसमागतम् ।
व्यथितानि दिशो याता राक्षसं घोरदर्शनम् ॥
रामस्तु प्रत्युवाचेदं सुग्रीवं सत्यविक्रमः ।
न भेतव्यं प्लवंगेन्द्र मया सार्धं समागतः ॥
📖 भावार्थ : तब राक्षस को आया देखकर वानर सेनाएँ व्यथित होकर दिशाओं को भागने लगीं। सत्यविक्रम राम ने सुग्रीव से कहा: "हे प्लवंगेन्द्र, डरना नहीं चाहिए। वह मेरे साथ युद्ध के लिए आया है।"

🛡️ युद्ध की तैयारी (श्लोक २१-३५)

॥ श्लोक २१-२७ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा धनुरादाय वीर्यवान् ।
उवाच लक्ष्मणं वीरं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
सज्जीभवन्तु सैन्यानि अतिकायं प्रति द्रुतम् ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा वीर्यवान् श्रीराम ने धनुष उठाकर वीर लक्ष्मण और महाबली सुग्रीव से कहा: "सेनाएँ अतिकाय के विरुद्ध शीघ्र सज्ज हो जाएँ।"
॥ श्लोक २८-३५ ॥
ततः प्रहृष्टा वानराः सुग्रीवप्रमुखास्तदा ।
नर्दन्तः सिंहनादांश्च चेलुः सर्वे समन्ततः ॥
इत्येष पञ्चाशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
अतिकायाभिषेको यो रावणस्य च निश्चयः ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव आदि प्रमुख वानर हर्षित होकर सिंहनाद करते हुए चारों ओर से चल दिए। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह पचासवाँ सर्ग है, जिसमें अतिकाय का अभिषेक (सेनापति नियुक्ति) और रावण का निश्चय वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रावण का हठ

बार-बार पराजय के बाद भी रावण युद्ध जारी रखता है और नए-नए सेनापति नियुक्त करता है।

🦍 वानरों का साहस

राम के आश्वासन से वानर फिर से युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं।

🎯 शिक्षा : हठ और अहंकार के कारण व्यक्ति बार-बार गलत निर्णय लेता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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