विभीषण का राम से मिलन और राम द्वारा उन्हें शरण देना

राम की शरण में आए विभीषण को राम स्नेहपूर्वक स्वीकार करते हैं और सुग्रीव के संदेह का निवारण करते हैं।

विवरण

युद्ध की पूर्व संध्या पर रावण का छोटा भाई विभीषण अपने चार मंत्रियों सहित राम की शरण में आता है। सुग्रीव को संदेह होता है कि कहीं यह रावण की माया न हो, किन्तु राम शरणागत की रक्षा का वचन देते हुए विभीषण को अपने गले लगा लेते हैं। राम उनका लंका के राजा पद पर अभिषेक करते हैं और भविष्य में राज्य देने का वरदान देते हैं। यह सर्ग राम की करुणा, उदारता और धर्मपरायणता का अद्भुत चित्रण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ५

(विभीषण का राम से मिलन और राम द्वारा उन्हें शरण देना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम-रावण युद्ध की पूर्व संध्या पर विभीषण रावण का परित्याग करके राम की शरण में आते हैं। यह सर्ग शरणागति के उच्च आदर्श और राम के करुणा एवं न्यायप्रियता का सुंदर चित्रण प्रस्तुत करता है।

🛕 विभीषण का आगमन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो विभीषणो नाम राक्षसो रावणानुजः ।
त्यक्त्वा रावणमत्युग्रं शरण्यं शरणं ययौ ॥
स चतुर्भिः सहामात्यै रामं दृष्ट्वा कृताञ्जलिः ।
उवाच वचनं राजन् सुग्रीवसहितं प्रभुम् ॥
अहं रावणभ्राता वै नाम्ना वैश्रवणात्मजः ।
त्यक्त्वा तं पापकर्माणं शरणं त्वां समागतः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; विभीषणः = विभीषण; नाम = नामक; राक्षसः = राक्षस; रावणानुजः = रावण का छोटा भाई; त्यक्त्वा = त्यागकर; रावणम् = रावण को; अत्युग्रम् = अत्यन्त क्रूर; शरण्यम् = शरण देने वाले; शरणम् = शरण में; ययौ = गया; सः = वह; चतुर्भिः = चार; सहामात्यैः = मंत्रियों सहित; रामम् = राम को; दृष्ट्वा = देखकर; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर; उवाच = बोला; वचनम् = वचन; राजन् = हे राजन्; सुग्रीवसहितम् = सुग्रीव सहित; प्रभुम् = प्रभु को; अहम् = मैं; रावणभ्राता = रावण का भाई; वै = निश्चय ही; नाम्ना = नाम से; वैश्रवणात्मजः = विश्रवा का पुत्र; त्यक्त्वा = त्यागकर; तम् = उसको; पापकर्माणम् = पापी को; शरणम् = शरण में; त्वाम् = आपकी; समागतः = आया हूँ।
📖 भावार्थ : तब रावण का छोटा भाई विभीषण नामक राक्षस, अत्यन्त क्रूर रावण को त्यागकर, शरण देने वाले राम की शरण में आया। वह चार मंत्रियों सहित, हाथ जोड़कर, सुग्रीव सहित प्रभु राम से बोला: "मैं रावण का भाई हूँ, नाम से विश्रवा का पुत्र। उस पापी को त्यागकर मैं आपकी शरण में आया हूँ।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
रामस्तु सहसा दृष्ट्वा विभीषणमुपस्थितम् ।
उवाच सुग्रीवमुखान् सर्वानेव समागतान् ॥
अयं विभीषणो नाम धर्मज्ञः सत्यविक्रमः ।
त्यक्त्वा भ्रातरमत्युग्रं मयि भक्तिं चकार ह ॥
अस्य रक्षां करिष्यामि यथा प्राणैः स्वयं तथा ।
न हि मे शरणागतो विनश्येत् कदाचन ॥
📖 भावार्थ : राम ने सहसा आए हुए विभीषण को देखकर सुग्रीव आदि सबसे कहा: "यह विभीषण नाम का धर्मज्ञ और सत्यविक्रमी है। अत्युग्र भाई को त्यागकर इसने मुझमें भक्ति की है। मैं इसकी रक्षा करूंगा जैसे अपने प्राणों की। मेरी शरण में आया हुआ कभी नष्ट नहीं होता।"

🤔 सुग्रीव का संदेह और राम का उत्तर (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
सुग्रीवस्तु तदा वाक्यं प्रत्युवाच महामतिः ।
रामं प्रति महात्मानं विभीषणमुपस्थितम् ॥
न जाने किं भवेदस्य हृदि राक्षसपुंगव ।
शत्रोरनुचरो भूत्वा किमर्थं शरणं गतः ॥
छन्नो भवेत् स रक्षोभिर्मायया राक्षसेश्वरः ।
विश्वासो नैव कर्तव्यः शत्रौ छद्मसमन्विते ॥
एतच्छ्रुत्वा तु रामस्तु प्रत्युवाच महामतिः ।
सुग्रीवं स्नेहसम्पन्नं धर्मज्ञं सत्यविक्रमम् ॥
यथा वदसि धर्मज्ञ तथा तदुपपद्यते ।
किन्तु मे शरणागतस्य त्यागो नैवोपपद्यते ॥
📖 भावार्थ : तब महामति सुग्रीव ने विभीषण के उपस्थित होने पर महात्मा राम से कहा: "हे राक्षसश्रेष्ठ! मैं नहीं जानता इसके हृदय में क्या है। शत्रु का अनुचर होकर यह क्यों शरण में आया है? यह राक्षसों से छिपा हुआ राक्षसराज की माया से युक्त हो सकता है। छल से युक्त शत्रु पर विश्वास नहीं करना चाहिए।" यह सुनकर महामति राम स्नेहसम्पन्न धर्मज्ञ सुग्रीव से बोले: "हे धर्मज्ञ! तुम जैसा कहते हो वैसा ही हो सकता है, किन्तु मेरे लिए शरण में आये हुए का त्याग उचित नहीं है।"
॥ श्लोक १८-२२ ॥
अपि पापसमाचारो रिपुर्वा शरणागतः ।
त्यागो न विहितः सद्भिर्मैत्र्या प्राणानपि त्यजेत् ॥
तस्मादेनं परिष्वज्य गृह्णामि शरणागतम् ।
नैनं त्यक्ष्यामि सुग्रीव सत्येनात्मानमालभे ॥
इत्युक्त्वा राघवो वीरः परिष्वज्य विभीषणम् ।
उवाच लक्ष्मणं वाक्यं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
अभिषेकं करिष्यामि विभीषणस्य संयुगे ।
लङ्काया राक्षसेन्द्रत्वे यथा युक्तं तथा कुरु ॥
📖 भावार्थ : "यदि कोई पापाचारी या शत्रु भी शरण में आ जाए, तो सज्जन उसका त्याग नहीं करते, प्राणों का भी त्याग कर सकते हैं। अतः इस शरणागत को गले लगाकर मैं स्वीकार करता हूँ। हे सुग्रीव! मैं इसे कभी नहीं त्यागूँगा, सत्य की शपथ।" ऐसा कहकर वीर राघव ने विभीषण को गले लगाया और लक्ष्मण तथा महाबलि सुग्रीव से बोले: "मैं युद्ध में विभीषण का लंका के राक्षसेन्द्र पद पर अभिषेक करूँगा, जैसा उचित हो वैसा करो।"

👑 विभीषण का अभिषेक और राम की घोषणा (श्लोक २३-३८)

॥ श्लोक २३-३० ॥
ततो लक्ष्मणमादाय सुग्रीवं च विभीषणम् ।
समुद्रतीरमासाद्य स्थितो रामः प्रतापवान् ॥
जलेनाभिषेकं चक्रे विभीषणस्य धीमतः ।
लङ्काया राक्षसेन्द्रत्वे रामः सत्यपराक्रमः ॥
उवाच चैनं धर्मात्मा स्नेहेन परमेण च ।
त्वमेव राक्षसेन्द्रोऽद्य भव लङ्कापतेः सुत ॥
यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी ।
तावत्त्वं राज्यमतुलं लङ्कायां प्राप्स्यसे ध्रुवम् ॥
📖 भावार्थ : तब प्रतापवान् राम लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण को लेकर समुद्र के तट पर आए। सत्यपराक्रमी राम ने जल से बुद्धिमान विभीषण का लंका के राक्षसेन्द्र पद पर अभिषेक किया। और धर्मात्मा राम ने परम स्नेह से उनसे कहा: "आज से तुम ही राक्षसेन्द्र हो। हे लंकापति के अनुज! जब तक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, जब तक पृथ्वी रहेगी, तब तक तुम लंका में अतुल राज्य प्राप्त करोगे।"
॥ श्लोक ३१-३८ ॥
विभीषणोऽपि धर्मात्मा प्रहृष्टः प्रत्यभाषत ।
त्वत्प्रसादान्महाराज राज्यं कीर्तिं यशो बलम् ॥
प्राप्स्यामि नात्र सन्देहः सत्यवाक् त्वं नरोत्तम ।
इत्युक्त्वा प्रणतो भूत्वा तस्थौ रामस्य सन्निधौ ॥
ततः सुग्रीवसहितो रामः सागरमीक्ष्य च ।
चिन्तयामास किं कुर्यात् सेतुबन्धाय वानरैः ॥
इत्येष पञ्चमः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
विभीषणसमागमो रामशरणागतिस्तथा ॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा विभीषण ने प्रसन्न होकर उत्तर दिया: "हे महाराज! आपकी कृपा से मैं राज्य, कीर्ति, यश और बल प्राप्त करूँगा, इसमें संदेह नहीं। आप नरोत्तम सत्यवादी हैं।" ऐसा कहकर वे प्रणत होकर राम के समीप रहे। तब सुग्रीव सहित राम ने समुद्र की ओर देखा और विचार किया कि वानरों द्वारा सेतुबन्ध कैसे किया जाए। इस प्रकार यह युद्धकाण्ड का पाँचवाँ रोचक सर्ग है, जिसमें विभीषण का आगमन और राम की शरणागति वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ शरणागति का आदर्श

राम ने शत्रु के भाई को भी शरण देकर यह सिद्ध किया कि शरणागत की रक्षा करना क्षत्रिय का परम धर्म है। यह घटना राम के चरित्र की महानता को दर्शाती है।

🤝 सुग्रीव का संदेह

सुग्रीव का संदेह स्वाभाविक था, किन्तु राम ने नीति और धर्म के अनुसार निर्णय लिया। यह राजनीति में विवेक और करुणा का संतुलन सिखाता है।

🌊 सेतुबन्ध की प्रस्तावना

इस सर्ग के अंत में राम समुद्र को देखकर सेतुबन्ध का विचार करते हैं, जो अगले सर्ग की भूमिका है।

📜 विभीषण का अभिषेक

राम ने युद्ध से पहले ही विभीषण को लंका का राज्य देकर अपनी उदारता और दूरदर्शिता का परिचय दिया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें शरणागत की रक्षा का संदेश मिलता है। राम ने बिना किसी स्वार्थ के विभीषण को स्वीकार किया और उन्हें सम्मान दिया। यह मानवता और धर्म का उत्तम उदाहरण है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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