युद्ध काण्ड अध्याय 46

रावण का क्रोध और विरूपाक्ष को सेनापति बनाना

पुत्र के वध से क्रोधित रावण विरूपाक्ष को सेनापति नियुक्त करता है और उसे युद्ध के लिए भेजता है। विरूपाक्ष विशाल सेना के साथ युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है।

विवरण

इंद्रजीत के वध से रावण अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल हो जाता है। वह प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ अपने सेनापतियों को बुलाता है। रावण विरूपाक्ष को सेनापति नियुक्त करता है और उसे विशाल राक्षस सेना के साथ युद्ध के लिए भेजता है। विरूपाक्ष रथ पर सवार होकर, अनेक अस्त्र-शास्त्रों से सुसज्जित, युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है। उसे देखकर वानर सेना में कुछ भय का संचार होता है, लेकिन वे युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं।

(रावण का क्रोध और विरूपाक्ष को सेनापति बनाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : इंद्रजीत के वध से रावण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए विरूपाक्ष को सेनापति नियुक्त किया और युद्ध के लिए भेजा। यह सर्ग उसकी मानसिक स्थिति और युद्ध की तैयारी का वर्णन करता है।

😡 रावण का क्रोध (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः श्रुत्वा हतं पुत्रं रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।
विरूपाक्षं महात्मानं सेनापतिमथाब्रवीत् ॥
गच्छ शीघ्रं महाबाहो सैन्येन महता वृतः ।
जहि शत्रून् रणे वीर मम पुत्रस्य कारणात् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; श्रुत्वा = सुनकर; हतम् = मारे गए; पुत्रम् = पुत्र को; रावणः = रावण; क्रोधमूर्च्छितः = क्रोध से मूर्च्छित; विरूपाक्षम् = विरूपाक्ष को; महात्मानम् = महात्मा; सेनापतिम् = सेनापति; अथ = तब; अब्रवीत् = बोला; गच्छ = जाओ; शीघ्रम् = शीघ्र; महाबाहो = महाबाहो; सैन्येन = सेना के साथ; महता = महान; वृतः = घिरे हुए; जहि = मारो; शत्रून् = शत्रुओं को; रणे = रण में; वीर = हे वीर; मम = मेरे; पुत्रस्य = पुत्र के; कारणात् = कारण।
📖 भावार्थ : तब पुत्र के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण क्रोध से मूर्च्छित हो गया। उसने महात्मा विरूपाक्ष को सेनापति बनाकर कहा: "हे महाबाहो, शीघ्र जाओ, महान सेना से घिरे हुए। हे वीर, रण में शत्रुओं को मारो, मेरे पुत्र के कारण (प्रतिशोध के लिए)।"
॥ श्लोक ७-१० ॥
स तु रावणवाक्येन विरूपाक्षः प्रतापवान् ।
आरुरोह रथं शीघ्रं तप्तकाञ्चनभूषणम् ॥
राक्षसैः बहुभिः सार्धं युद्धायाभिमुखो ययौ ॥
📖 भावार्थ : उस प्रतापी विरूपाक्ष ने रावण के वचन से शीघ्र ही तपे हुए सोने के आभूषणों से युक्त रथ पर चढ़ाई की और बहुत से राक्षसों के साथ युद्ध के लिए अभिमुख हो गया।

🚩 सेना का प्रस्थान (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
तस्य यातस्य संग्रामे राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ।
बभूव तुमुलः शब्दः सागरस्येव पर्वणि ॥
रथनेमिस्वनैर्घोरैर्भेरीशङ्खरवैस्तथा ।
दिशः सर्वा विरेजुश्च प्रकम्पितमहीतलाः ॥
📖 भावार्थ : उस बुद्धिमान राक्षसेन्द्र के संग्राम में जाने पर वैसा ही तुमुल शब्द हुआ जैसा समुद्र के पर्व के दिन होता है। रथ के नेमि की घोर ध्वनि तथा भेरी और शंख के रव से सभी दिशाएँ गूंज उठीं और पृथ्वी का तल काँप उठा।
॥ श्लोक १८-२२ ॥
ततो वानरसैन्यानि दृष्ट्वा राक्षसमागतम् ।
व्यथितानि दिशो याता राक्षसं घोरदर्शनम् ॥
रामस्तु प्रत्युवाचेदं सुग्रीवं सत्यविक्रमः ।
न भेतव्यं प्लवंगेन्द्र मया सार्धं समागतः ॥
📖 भावार्थ : तब राक्षस को आया देखकर वानर सेनाएँ व्यथित होकर दिशाओं को भागने लगीं। सत्यविक्रम राम ने सुग्रीव से कहा: "हे प्लवंगेन्द्र, डरना नहीं चाहिए। वह मेरे साथ युद्ध के लिए आया है।"

🛡️ युद्ध की तैयारी (श्लोक २३-३८)

॥ श्लोक २३-३० ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा धनुरादाय वीर्यवान् ।
उवाच लक्ष्मणं वीरं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
सज्जीभवन्तु सैन्यानि विरूपाक्षं प्रति द्रुतम् ।
अद्य पश्यत मे वीर्यं युद्धे तस्मिन् दुरात्मनि ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा वीर्यवान् श्रीराम ने धनुष उठाकर वीर लक्ष्मण और महाबली सुग्रीव से कहा: "सेनाएँ विरूपाक्ष के विरुद्ध शीघ्र सज्ज हो जाएँ। आज उस दुरात्मा के साथ युद्ध में मेरा वीर्य देखो।"
॥ श्लोक ३१-३८ ॥
ततः प्रहृष्टा वानराः सुग्रीवप्रमुखास्तदा ।
नर्दन्तः सिंहनादांश्च चेलुः सर्वे समन्ततः ॥
इत्येष षट्चत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
विरूपाक्षाभिषेको यो रावणस्य च निश्चयः ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव आदि प्रमुख वानर हर्षित होकर सिंहनाद करते हुए चारों ओर से चल दिए। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह छियालीसवाँ सर्ग है, जिसमें विरूपाक्ष का अभिषेक (सेनापति नियुक्ति) और रावण का निश्चय वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😤 रावण का क्रोध

पुत्र के वध ने रावण को अंधा कर दिया है, वह बिना सोचे-समझे नए सेनापति नियुक्त कर रहा है।

🛡️ राम का धैर्य

राम हर परिस्थिति में धैर्य नहीं खोते और सेना का मनोबल बढ़ाते हैं।

🎯 शिक्षा : क्रोध में लिए गए निर्णय प्रायः विनाशकारी होते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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