युद्ध काण्ड अध्याय 45

इंद्रजीत वध पर रावण का शोक

इंद्रजीत के वध का समाचार सुनकर रावण अत्यंत शोकाकुल हो जाता है। वह पुत्र के वियोग में विलाप करता है और युद्ध में जाने का निश्चय करता है।

विवरण

जब रावण को इंद्रजीत के वध का समाचार मिलता है, तो वह मूर्छित होकर गिर पड़ता है। होश में आने पर वह पुत्र के गुणों का स्मरण करते हुए विलाप करता है। वह राम और लक्ष्मण को कोसता है और युद्ध में जाने का निश्चय करता है। उसकी पत्नियाँ भी शोक करती हैं। रावण की सेना में भी शोक की लहर दौड़ जाती है। रावण अब स्वयं युद्ध के लिए तैयार होता है।

(इंद्रजीत वध पर रावण का शोक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : इंद्रजीत के वध का समाचार सुनकर रावण शोक से व्याकुल हो गया। अपने परम प्रिय पुत्र के वियोग में वह विलाप करने लगा। यह सर्ग उस करुण दृश्य का वर्णन करता है।

😢 समाचार सुनना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः श्रुत्वा हतं पुत्रं रावणो राक्षसेश्वरः ।
निपपात महीपृष्ठे मुहूर्तं च विचेतनः ॥
ततः संज्ञां समासाद्य विललाप सुदुःखितः ।
हा पुत्र हा महाबाहो हा वीर हा महाबल ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; श्रुत्वा = सुनकर; हतम् = मारे गए; पुत्रम् = पुत्र को; रावणः = रावण; राक्षसेश्वरः = राक्षसों का राजा; निपपात = गिर पड़ा; महीपृष्ठे = धरती पर; मुहूर्तम् = कुछ समय; च = और; विचेतनः = बेहोश; ततः = उसके बाद; संज्ञाम् = होश; समासाद्य = प्राप्त कर; विललाप = विलाप किया; सुदुःखितः = अत्यंत दुःखी; हा पुत्र = हे पुत्र; हा महाबाहो = हे महाबाहो; हा वीर = हे वीर; हा महाबल = हे महाबलशाली।
📖 भावार्थ : तब पुत्र के मारे जाने का समाचार सुनकर राक्षसराज रावण धरती पर गिर पड़ा और कुछ समय के लिए बेहोश हो गया। फिर होश में आकर अत्यंत दुःखी होकर विलाप करने लगा: "हे पुत्र, हे महाबाहो, हे वीर, हे महाबलशाली!"
॥ श्लोक ७-१० ॥
कथं त्वं निहतः संख्ये लक्ष्मणेन सुरारिणा ।
येन जित्वा पुरा देवान् सगन्धर्वान् सदानवान् ॥
📖 भावार्थ : "तू, जिसने पूर्व में देवताओं, गंधर्वों और दानवों को जीत लिया था, वह कैसे रण में लक्ष्मण के द्वारा मारा गया?"

💔 रावण का विलाप (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
त्वयि वीर हते पुत्र न शान्तिर्हृदयस्य मे ।
न मे प्रियं राज्येन न प्राणैर्न धनेन च ॥
यस्य त्वं निधनं प्राप्तो लक्ष्मणेन बलीयसा ।
तं न पश्यामि संग्रामे हत्वा शत्रुं निवर्तये ॥
📖 भावार्थ : "हे वीर पुत्र, तुम्हारे मारे जाने पर मेरे हृदय को शांति नहीं है। न राज्य, न प्राण, न धन मुझे प्रिय हैं। जिस बलशाली लक्ष्मण ने तुम्हें मारा, उसे युद्ध में मारकर ही मैं लौटूंगा।"
॥ श्लोक १८-२२ ॥
एवं विलप्य बहुधा रावणो राक्षसेश्वरः ।
उत्थाय च महाराज युद्धायैव मनो दधे ॥
आज्ञापयामास तदा बलं सर्वं समन्ततः ।
युद्धायैव दृढं क्रुद्धः पुत्रशोकसमन्वितः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार बहुत विलाप करके राक्षसराज रावण, हे महाराज, उठकर युद्ध के लिए मन लगा बैठा। उसने सब ओर से सेना को युद्ध के लिए आज्ञा दी, पुत्रशोक से युक्त और अत्यंत क्रुद्ध होकर।

👸 रानियों का शोक (श्लोक २३-३२)

॥ श्लोक २३-२८ ॥
मन्दोदरी तु तच्छ्रुत्वा हतं पुत्रं महाबलम् ।
निपपात महीपृष्ठे हाहाकारं चकार ह ॥
तां दृष्ट्वा पतितां देवीं राक्षस्यः समुपाद्रवन् ।
आश्वासयन्त्यो बहुधा विलपन्तीं सुदुःखिताम् ॥
📖 भावार्थ : मन्दोदरी ने भी महाबली पुत्र के मारे जाने का समाचार सुनकर धरती पर गिरकर हाहाकार किया। उस देवी को गिरी हुई देखकर राक्षस स्त्रियाँ दौड़ीं और बहुत प्रकार से आश्वासन देने लगीं, जो अत्यंत दुःखी होकर विलाप कर रही थी।
॥ श्लोक २९-३२ ॥
राक्षसाश्च महावीर्याः शोकव्याकुलचेतसः ।
युद्धोत्सुकाः समाजग्मु रावणस्याज्ञया तदा ॥
📖 भावार्थ : महावीर्य राक्षस भी शोक से व्याकुल चित्त होकर, युद्ध के लिए उत्सुक होकर रावण की आज्ञा से एकत्र हुए।

🔰 युद्ध का निर्णय (श्लोक ३३-४०)

॥ श्लोक ३३-४० ॥
ततः रावणो दुष्टात्मा रामं लक्ष्मणमेव च ।
हन्तुकामः सुसंक्रुद्धो युद्धाय समुपस्थितः ॥
आरुरोह रथं शीघ्रं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।
राक्षसैः परिवार्याथ युद्धायाभिमुखो ययौ ॥
इत्येष पञ्चचत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
रावणस्य सुतशोको रामयुद्धाय निर्गमः ॥
📖 भावार्थ : तब दुष्टात्मा रावण राम और लक्ष्मण को मारने की इच्छा से अत्यंत क्रुद्ध होकर युद्ध के लिए उपस्थित हुआ। वह शीघ्र ही तपे हुए सोने के आभूषणों से युक्त रथ पर चढ़ा और राक्षसों से घिरकर युद्ध के लिए अभिमुख हो गया। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह पैंतालीसवाँ सर्ग है, जिसमें रावण का पुत्रशोक और राम से युद्ध के लिए निर्गमन वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 पितृ-वियोग

रावण का शोक अत्यंत मार्मिक है, जो उसके हृदय की कोमलता को दर्शाता है, यद्यपि वह अत्याचारी है।

⚔️ प्रतिशोध की अग्नि

पुत्र के वध ने रावण को और अधिक क्रोधित कर दिया और वह अंतिम युद्ध के लिए तैयार हो गया।

🎯 शिक्षा : अत्याचारी के पास भी पुत्र-स्नेह होता है, किन्तु उसके कर्म उसे विनाश की ओर ले जाते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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