युद्ध काण्ड अध्याय 44

इंद्रजीत का वध

लक्ष्मण इंद्रजीत का वध कर देते हैं। इंद्रजीत के मरने से राक्षस सेना में हाहाकार मच जाता है और देवता पुष्प वर्षा करते हैं।

विवरण

लक्ष्मण और इंद्रजीत का युद्ध चरम पर होता है। विभीषण लक्ष्मण को बताते हैं कि इंद्रजीत को तब तक नहीं मारा जा सकता जब तक वह अपने यज्ञ को पूरा न कर ले। किन्तु यज्ञ भंग हो चुका है। लक्ष्मण इंद्रजीत के रथ को नष्ट कर देते हैं और अंत में इंद्रजीत के सिर को धड़ से अलग कर देते हैं। इंद्रजीत के मरने पर देवता पुष्प वर्षा करते हैं और वानर सेना जय-जयकार करती है। राक्षस सेना में शोक छा जाता है।

(इंद्रजीत का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : इंद्रजीत और लक्ष्मण के बीच युद्ध अपने अंतिम चरण में है। लक्ष्मण, विभीषण के मार्गदर्शन में, इंद्रजीत पर आक्रमण करते हैं और अंततः उसका वध कर डालते हैं। यह सर्ग उस ऐतिहासिक क्षण का वर्णन करता है।

🏹 अंतिम युद्ध (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-८ ॥
ततः इन्द्रजित् क्रोधवशो लक्ष्मणं प्रति संयुगे ।
अस्त्राणि विविधान्यस्त्रै रामस्यानुजमार्च्छयत् ॥
लक्ष्मणस्तु तदा राजन् विभीषणमुवाच ह ।
केनोपायेन वध्योऽयं रावणिर्युद्धदुर्मदः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; इन्द्रजित् = इंद्रजीत; क्रोधवशः = क्रोध के वश में; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण पर; प्रति = प्रति; संयुगे = युद्ध में; अस्त्राणि = अस्त्र; विविधानि = अनेक प्रकार के; अस्त्रै = अस्त्रों से; रामस्यानुजम् = राम के अनुज को; आर्च्छयत् = आच्छादित किया; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; तु = तो; तदा = तब; राजन् = हे राजा; विभीषणम् = विभीषण से; उवाच ह = बोले; केन = किस; उपायेन = उपाय से; वध्यः = वध करने योग्य; अयम् = यह; रावणिः = रावणि; युद्धदुर्मदः = युद्ध के मद में चूर।
📖 भावार्थ : तब क्रोध के वश में हुए इंद्रजीत ने युद्ध में लक्ष्मण पर अनेक प्रकार के अस्त्रों की वर्षा की। हे राजन्, तब लक्ष्मण ने विभीषण से पूछा: "किस उपाय से यह युद्धदुर्मद रावणि वध करने योग्य है?"
॥ श्लोक ९-१२ ॥
विभीषणस्तु तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणं प्रत्यभाषत ।
हतो माया यज्ञश्चास्य तस्माद् वध्यः स राक्षसः ॥
रथं चास्य विनाशाय बाणैश्छिन्धि समन्ततः ॥
📖 भावार्थ : विभीषण ने यह सुनकर लक्ष्मण से कहा: "इसकी माया और यज्ञ नष्ट हो चुके हैं, इसलिए यह राक्षस वध्य है। इसके रथ को बाणों से चारों ओर से नष्ट कर दो।"

💥 इंद्रजीत का वध (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-२० ॥
ततः लक्ष्मणो धर्मात्मा विभीषणवचः शृणु ।
शरैः सुवर्णपुङ्खैश्च रथं चास्य व्यशातयत् ॥
स हताश्वो हतरथो हतसारथिरेव च ।
अवप्लुत्य रथात् तूर्णं गदां जग्राह रावणिः ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा लक्ष्मण ने विभीषण के वचन सुनकर, सुवर्णपुङ्ख बाणों से उसके रथ को नष्ट कर दिया। मारे गए घोड़े, नष्ट रथ और मारे गए सारथि के साथ, रावणि ने रथ से कूदकर शीघ्र ही गदा उठा ली।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततो गदां समुद्यम्य रावणिः क्रोधमूर्च्छितः ।
लक्ष्मणस्य वधार्थाय चिक्षेप महतीं गदाम् ॥
लक्ष्मणस्तु तदा राजन् विभीषणमुवाच ह ।
पश्य मे भ्रातृजं वीर्यं येन हन्मि रणे रिपुम् ॥
इन्द्रास्त्रं प्रसमाधाय मुमोचैनदरिंदमः ।
तेनास्त्रेण हतः शत्रू रावणिः प्राप्तवान् वधम् ॥
📖 भावार्थ : तब क्रोध से मूर्च्छित रावणि ने गदा उठाकर लक्ष्मण के वध के लिए वह महती गदा फेंकी। हे राजन्, तब लक्ष्मण ने विभीषण से कहा: "देखो मेरे भ्रातृज (राम) के वीर्य को, जिससे मैं रण में शत्रु को मारूंगा।" इंद्रास्त्र का संधान करके उस अरिंदम ने उसे छोड़ा। उस अस्त्र से मारा गया शत्रु रावणि वध को प्राप्त हुआ।

🌺 देवताओं की वर्षा (श्लोक २६-४५)

॥ श्लोक २६-३४ ॥
तस्मिन् हते महावीर्ये रावणौ रणमूर्धनि ।
देवाः सगन्धर्वगणाः पुष्पवर्षमवाकिरन् ॥
वानराः सिंहनादांश्च चक्रुरुत्साहसंयुताः ॥
📖 भावार्थ : उस महावीर्य रावणि के रणभूमि में मारे जाने पर देवताओं और गंधर्वों ने पुष्प वर्षा की। वानरों ने उत्साह से सिंहनाद किए।
॥ श्लोक ३५-४५ ॥
हते तु रावणौ तस्मिन् राक्षसाः प्राद्रवन् भयात् ।
लक्ष्मणः पूजितो देवैः प्रणतः स्वजनं ययौ ॥
रामायाचष्ट तत्सर्वं लक्ष्मणः परवीरहा ॥
इत्येष चतुश्चत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
इन्द्रजिद्वध आख्यातो लक्ष्मणस्य च विक्रमः ॥
📖 भावार्थ : उस रावणि के मारे जाने पर राक्षस भय से भाग गए। देवताओं द्वारा पूजित लक्ष्मण स्वजनों के पास लौटे और राम को सब कुछ बताया। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह चवालीसवाँ सर्ग है, जिसमें इंद्रजीत का वध और लक्ष्मण का पराक्रम वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏆 इंद्रजीत वध का महत्व

इंद्रजीत रावण की सेना का सबसे शक्तिशाली योद्धा था। उसके वध से राम की विजय सुनिश्चित हो गई।

🙏 लक्ष्मण की भूमिका

लक्ष्मण ने अपने पराक्रम से यह सिद्ध कर दिया कि वे राम के योग्य अनुज हैं।

🎯 शिक्षा : सतत प्रयास और बुद्धिमान मार्गदर्शन से विजय अवश्य मिलती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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