युद्ध काण्ड अध्याय 43

इंद्रजीत का लक्ष्मण से युद्ध

यज्ञ भंग होने के बाद इंद्रजीत और लक्ष्मण के बीच घोर युद्ध होता है। दोनों एक-दूसरे पर अस्त्र-शास्त्रों की वर्षा करते हैं।

विवरण

इंद्रजीत और लक्ष्मण के बीच भीषण युद्ध प्रारंभ होता है। दोनों महारथी हैं। इंद्रजीत अपनी माया का प्रयोग करता है, जबकि लक्ष्मण धैर्यपूर्वक उसका सामना करते हैं। युद्ध में दोनों ओर से अनेक अस्त्र चलते हैं। लक्ष्मण को विभीषण का सहयोग मिलता है, जो इंद्रजीत की युद्धनीति से अवगत हैं। यह युद्ध बहुत देर तक चलता है।

(इंद्रजीत का लक्ष्मण से युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : यज्ञ भंग होने के बाद इंद्रजीत अत्यंत क्रोधित होकर लक्ष्मण से युद्ध करने लगा। दोनों महारथियों के बीच घोर संग्राम छिड़ गया। यह सर्ग उस भीषण युद्ध का वर्णन करता है।

⚔️ युद्ध का आरंभ (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-८ ॥
ततः इन्द्रजित् क्रोधवशो लक्ष्मणं प्रति संयुगे ।
चिक्षेप बहुभिर्बाणैः सर्वगात्रेषु भीषणैः ॥
लक्ष्मणोऽपि महातेजाश्चिच्छेद तान् शरैः शितैः ।
न चचाल च संक्रुद्धः पर्वतो मेरुरादिवत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; इन्द्रजित् = इंद्रजीत; क्रोधवशः = क्रोध के वश में; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण पर; प्रति = प्रति; संयुगे = युद्ध में; चिक्षेप = छोड़ा; बहुभिः = बहुत से; बाणैः = बाणों से; सर्वगात्रेषु = सभी अंगों में; भीषणैः = भयंकर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; अपि = भी; महातेजाः = महान तेज वाले; चिच्छेद = काट डाला; तान् = उनको; शरैः = बाणों से; शितैः = तीक्ष्ण; न चचाल = नहीं हिले; च = और; संक्रुद्धः = अत्यंत क्रोधित; पर्वतः = पर्वत; मेरुः = मेरु; आदिवत् = आदि की तरह।
📖 भावार्थ : तब क्रोध के वश में हुए इंद्रजीत ने युद्ध में लक्ष्मण पर बहुत से भयंकर बाण चलाए। महातेजा लक्ष्मण ने उन बाणों को तीक्ष्ण बाणों से काट दिया और अत्यंत क्रोधित होकर भी वह मेरु पर्वत की भाँति स्थिर रहे।
॥ श्लोक ९-१२ ॥
ततः शरशतैस्तीक्ष्णैः प्रच्छादयत रावणिः ।
लक्ष्मणं रणमध्ये तु विभीषणमथापि च ॥
📖 भावार्थ : तब रावणि ने सैकड़ों तीक्ष्ण बाणों से रणमध्य में लक्ष्मण और विभीषण को ढक दिया।

🛡️ लक्ष्मण का धैर्य (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-२० ॥
लक्ष्मणस्तु महातेजा विभीषणमुवाच ह ।
पश्य रावणिजं वीर्यं मम चापि पराक्रमम् ॥
अद्य पातयिता भूमौ शिरस्तस्य दुरात्मनः ।
📖 भावार्थ : महातेजा लक्ष्मण ने विभीषण से कहा: "हे वीर, देखो रावणि के वीर्य और मेरे पराक्रम को। आज मैं उस दुरात्मा के सिर को भूमि पर गिरा दूंगा।"
॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः संक्रुद्धो रावणिः शक्तिं जग्राह भीषणाम् ।
लक्ष्मणाय चिक्षेप सर्वप्राणहरां रणे ॥
लक्ष्मणस्तु तया विद्धो न चचाल महाबलः ॥
📖 भावार्थ : तब अत्यंत क्रुद्ध रावणि ने भीषण शक्ति उठाई और लक्ष्मण पर चलाई, जो सर्वप्राणहरा थी। उस शक्ति से विद्ध होकर भी महाबली लक्ष्मण नहीं हिले।

🌀 माया और प्रतिमाया (श्लोक २६-४०)

॥ श्लोक २६-३३ ॥
ततो मायां महाघोरां रावणिः समयोजयत् ।
लक्ष्मणस्य वधार्थाय विभीषणनिवारितः ॥
विभीषणस्तु तां ज्ञात्वा लक्ष्मणाय न्यवेदयत् ।
एषा माया महाघोरा रावणेः प्रतिहन्यताम् ॥
📖 भावार्थ : तब रावणि ने लक्ष्मण के वध के लिए महाघोर माया का प्रयोग किया, किन्तु विभीषण ने उसे जानकर लक्ष्मण को बता दिया: "यह रावणि की महाघोर माया है, इसका प्रतिकार करो।"
॥ श्लोक ३४-४० ॥
लक्ष्मणस्तु तदा राजन् विभीषणवचः शृणु ।
दिव्यास्त्रैश्च तदा मायां नाशयामास रावणेः ॥
इत्येष त्रिचत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
इन्द्रजिद्युद्धमतुलं लक्ष्मणस्य च विक्रमः ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्, तब लक्ष्मण ने विभीषण के वचन सुनकर दिव्यास्त्रों से रावणि की माया का नाश कर दिया। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह तैंतालीसवाँ सर्ग है, जिसमें इंद्रजीत का अद्वितीय युद्ध और लक्ष्मण का पराक्रम वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ लक्ष्मण का धैर्य

लक्ष्मण अदम्य साहस और धैर्य का परिचय देते हैं, जो उनकी महानता का प्रतीक है।

🧠 विभीषण की भूमिका

विभीषण का ज्ञान और सलाह लक्ष्मण के लिए अमोघ अस्त्र साबित होती है।

🎯 शिक्षा : धैर्य और बुद्धिमान सलाह से बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना किया जा सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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