युद्ध काण्ड अध्याय 41

इंद्रजीत का निकुंभिला यज्ञ के लिए जाना

इंद्रजीत निकुंभिला नामक स्थान पर यज्ञ करने जाता है, जिससे उसे अमोघ शक्ति प्राप्त होती है। विभीषण को यह पता चलता है और वह राम को सूचित करता है।

विवरण

इंद्रजीत ने राम-लक्ष्मण को नागपाश में बांध दिया था, किन्तु वे गरुड़ के आने से मुक्त हो गए। अब इंद्रजीत पुनः युद्ध की तैयारी करता है। वह निकुंभिला नामक स्थान पर यज्ञ करने जाता है, जिससे उसे अमोघ शक्ति मिलती है और वह अजेय हो जाता है। विभीषण को यह पता चलता है। वह राम के पास जाकर बताता है कि यदि इंद्रजीत यज्ञ पूरा कर लेता है तो उसे हराना असंभव हो जाएगा। अतः यज्ञ भंग करना आवश्यक है। राम लक्ष्मण को यज्ञ भंग करने के लिए भेजते हैं।

(इंद्रजीत का निकुंभिला यज्ञ के लिए जाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : गरुड़ द्वारा नागपाश से मुक्त होने के बाद इंद्रजीत ने पुनः शक्ति प्राप्त करने के लिए निकुंभिला यज्ञ का निश्चय किया। विभीषण को यह पता चला और उन्होंने राम को इसके महत्व से अवगत कराया। यह सर्ग यज्ञ भंग की योजना का आधार बनता है।

🔥 यज्ञ का निर्णय (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः इन्द्रजित् संक्रुद्धो रामबाणप्रपीडितः ।
जगाम निकुम्भिलां यज्ञं कर्तुं महामतिः ॥
तत्र गत्वा महातेजा यज्ञं चक्रे सुदारुणम् ।
येन देवासुरान् सर्वान् जेतुं शक्तो भवेदिति ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; इन्द्रजित् = इंद्रजीत; संक्रुद्धः = अत्यंत क्रोधित; रामबाणप्रपीडितः = राम के बाणों से पीड़ित; जगाम = गया; निकुम्भिलाम् = निकुंभिला को; यज्ञम् = यज्ञ; कर्तुम् = करने के लिए; महामतिः = महान बुद्धि वाला; तत्र = वहाँ; गत्वा = जाकर; महातेजाः = महान तेज वाला; यज्ञम् = यज्ञ; चक्रे = किया; सुदारुणम् = अत्यंत भयंकर; येन = जिससे; देवासुरान् = देवताओं और असुरों; सर्वान् = सभी; जेतुम् = जीतने के लिए; शक्तः = समर्थ; भवेत् = हो जाए; इति = ऐसा।
📖 भावार्थ : तब राम के बाणों से पीड़ित, अत्यंत क्रोधित इंद्रजीत, यज्ञ करने के लिए निकुंभिला को गया। वहाँ जाकर महातेजा ने अत्यंत भयंकर यज्ञ आरंभ किया, जिससे वह सभी देवताओं और असुरों को जीतने में समर्थ हो सके।
॥ श्लोक ७-१० ॥
तं दृष्ट्वा राक्षसाः सर्वे हर्षनादान् प्रचक्रिरे ।
जयेन्द्रजितमित्येवं वाग्भिरुच्चैः प्रशस्य च ॥
📖 भावार्थ : उसे देखकर सभी राक्षसों ने हर्षनाद किए और "जय इंद्रजीत" कहकर ऊँचे स्वर में उसकी प्रशंसा की।

📢 विभीषण की सूचना (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
विभीषणस्तु तच्छ्रुत्वा राक्षसानां महास्वनम् ।
ज्ञात्वा तद् रावणेः कर्म राममेवाभ्यगच्छत ॥
प्रणम्य शिरसा रामं विभीषण उवाच ह ।
अयं स रावणिः क्रूरो निकुम्भिल्यां महायशाः ॥
यज्ञं करोति दुर्धर्षो येन शक्तो भविष्यति ॥
तस्मात् त्वं लक्ष्मणं शीघ्रं प्रेषयस्व महाबलम् ।
यज्ञविघ्नं करोत्वेष यावन्न समाप्यते क्रतुः ॥
📖 भावार्थ : विभीषण ने राक्षसों का वह महान स्वर सुनकर, रावणि के उस कर्म को जानकर, राम के पास गए। सिर झुकाकर राम को प्रणाम करके विभीषण ने कहा: "यह वही क्रूर रावणि है, महायशस्वी, जो निकुंभिला में यज्ञ कर रहा है, दुर्धर्ष, जिससे वह शक्तिशाली हो जाएगा। इसलिए आप महाबली लक्ष्मण को शीघ्र भेजिए। वह यज्ञ का विघ्न करे, जब तक कि यह क्रतु पूरा न हो जाए।"
॥ श्लोक १८-२२ ॥
रामस्तु प्रत्युवाचेदं लक्ष्मणं प्रियदर्शनम् ।
गच्छ सौम्य महाबाहो विभीषणवचः शृणु ॥
हत्वा तं रावणिं शीघ्रं यज्ञविघ्नं कुरुष्व ह ।
मया सार्धं समागत्य पश्चाद् युद्धं करिष्यसि ॥
📖 भावार्थ : राम ने प्रियदर्शन लक्ष्मण से कहा: "हे सौम्य महाबाहो, जाओ, विभीषण के वचन सुनो। उस रावणि को शीघ्र मारकर यज्ञ का विघ्न करो। मेरे साथ मिलकर पीछे युद्ध करोगे।"

🏃 लक्ष्मण का प्रस्थान (श्लोक २३-३६)

॥ श्लोक २३-२९ ॥
ततः लक्ष्मणो धर्मात्मा रामवाक्यप्रचोदितः ।
विभीषणेन सहितो जगाम निकुम्भिलाम् ॥
हनूमान् अंगदश्चैव सुग्रीवो जाम्बवांस्तथा ।
अन्वयुः परमक्रुद्धा लक्ष्मणं युद्धदुर्मदम् ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा लक्ष्मण राम के वचन से प्रेरित होकर विभीषण के साथ निकुंभिला को गए। हनुमान, अंगद, सुग्रीव और जाम्बवान भी परम क्रुद्ध होकर युद्धदुर्मद लक्ष्मण के पीछे चले।
॥ श्लोक ३०-३६ ॥
ते गत्वा निकुम्भिलां वीरा ददृशुस्तं रणे रिपुम् ।
यज्ञं कुर्वाणमासीनं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥
इत्येष एकचत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
निकुम्भिलागमो यत्र रावणेश्च विचेष्टितम् ॥
📖 भावार्थ : वे वीर निकुंभिला जाकर उस शत्रु को देखा, जो यज्ञ कर रहा था और अनेक राक्षसों से घिरा हुआ था। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह इकतालीसवाँ सर्ग है, जिसमें निकुंभिला का गमन और रावणि की चेष्टा वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕉️ यज्ञ का महत्व

निकुंभिला यज्ञ इंद्रजीत को अमोघ शक्ति प्रदान करता है, जिससे वह अजेय हो सकता है।

🤝 विभीषण की निष्ठा

विभीषण राम के प्रति पूर्ण निष्ठावान हैं और उनके हित के लिए रावणि के रहस्य बताते हैं।

🎯 शिक्षा : समय रहते शत्रु की योजना को विफल करना आवश्यक है, अन्यथा वह अजेय हो सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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