इंद्रजीत का निकुंभिला यज्ञ के लिए जाना
इंद्रजीत निकुंभिला नामक स्थान पर यज्ञ करने जाता है, जिससे उसे अमोघ शक्ति प्राप्त होती है। विभीषण को यह पता चलता है और वह राम को सूचित करता है।
विवरण
इंद्रजीत ने राम-लक्ष्मण को नागपाश में बांध दिया था, किन्तु वे गरुड़ के आने से मुक्त हो गए। अब इंद्रजीत पुनः युद्ध की तैयारी करता है। वह निकुंभिला नामक स्थान पर यज्ञ करने जाता है, जिससे उसे अमोघ शक्ति मिलती है और वह अजेय हो जाता है। विभीषण को यह पता चलता है। वह राम के पास जाकर बताता है कि यदि इंद्रजीत यज्ञ पूरा कर लेता है तो उसे हराना असंभव हो जाएगा। अतः यज्ञ भंग करना आवश्यक है। राम लक्ष्मण को यज्ञ भंग करने के लिए भेजते हैं।
(इंद्रजीत का निकुंभिला यज्ञ के लिए जाना)
🔆 प्रस्तावना : गरुड़ द्वारा नागपाश से मुक्त होने के बाद इंद्रजीत ने पुनः शक्ति प्राप्त करने के लिए निकुंभिला यज्ञ का निश्चय किया। विभीषण को यह पता चला और उन्होंने राम को इसके महत्व से अवगत कराया। यह सर्ग यज्ञ भंग की योजना का आधार बनता है।
🔥 यज्ञ का निर्णय (श्लोक १-१०)
जगाम निकुम्भिलां यज्ञं कर्तुं महामतिः ॥
तत्र गत्वा महातेजा यज्ञं चक्रे सुदारुणम् ।
येन देवासुरान् सर्वान् जेतुं शक्तो भवेदिति ॥
जयेन्द्रजितमित्येवं वाग्भिरुच्चैः प्रशस्य च ॥
📢 विभीषण की सूचना (श्लोक ११-२२)
ज्ञात्वा तद् रावणेः कर्म राममेवाभ्यगच्छत ॥
प्रणम्य शिरसा रामं विभीषण उवाच ह ।
अयं स रावणिः क्रूरो निकुम्भिल्यां महायशाः ॥
यज्ञं करोति दुर्धर्षो येन शक्तो भविष्यति ॥
तस्मात् त्वं लक्ष्मणं शीघ्रं प्रेषयस्व महाबलम् ।
यज्ञविघ्नं करोत्वेष यावन्न समाप्यते क्रतुः ॥
गच्छ सौम्य महाबाहो विभीषणवचः शृणु ॥
हत्वा तं रावणिं शीघ्रं यज्ञविघ्नं कुरुष्व ह ।
मया सार्धं समागत्य पश्चाद् युद्धं करिष्यसि ॥
🏃 लक्ष्मण का प्रस्थान (श्लोक २३-३६)
विभीषणेन सहितो जगाम निकुम्भिलाम् ॥
हनूमान् अंगदश्चैव सुग्रीवो जाम्बवांस्तथा ।
अन्वयुः परमक्रुद्धा लक्ष्मणं युद्धदुर्मदम् ॥
यज्ञं कुर्वाणमासीनं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥
इत्येष एकचत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
निकुम्भिलागमो यत्र रावणेश्च विचेष्टितम् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🕉️ यज्ञ का महत्व
निकुंभिला यज्ञ इंद्रजीत को अमोघ शक्ति प्रदान करता है, जिससे वह अजेय हो सकता है।
🤝 विभीषण की निष्ठा
विभीषण राम के प्रति पूर्ण निष्ठावान हैं और उनके हित के लिए रावणि के रहस्य बताते हैं।
🎯 शिक्षा : समय रहते शत्रु की योजना को विफल करना आवश्यक है, अन्यथा वह अजेय हो सकता है।