युद्ध काण्ड अध्याय 40

इंद्रजीत द्वारा माया से युद्ध

इंद्रजीत युद्ध में माया का प्रयोग करता है। वह अदृश्य होकर राम और लक्ष्मण पर बाणों की वर्षा करता है और दोनों भाइयों को नागपाश में बांध देता है।

विवरण

इंद्रजीत राम और लक्ष्मण से युद्ध करता है। वह माया का प्रयोग करके अदृश्य हो जाता है और आकाश से बाणों की वर्षा करता है। राम और लक्ष्मण उसे देख नहीं पाते, किन्तु उसके बाणों से घायल होते हैं। अंत में इंद्रजीत नागपाश नामक दिव्य अस्त्र का प्रयोग करता है, जिससे राम और लक्ष्मण बंध जाते हैं। वे मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं। यह देख वानर सेना में हाहाकार मच जाता है। इंद्रजीत विजयी होकर लंका लौट जाता है।

(इंद्रजीत द्वारा माया से युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : इंद्रजीत ने राम से युद्ध करने के लिए माया का सहारा लिया। वह अदृश्य होकर बाणों की वर्षा करता है और अंत में नागपाश से राम-लक्ष्मण को बांध देता है। यह सर्ग इंद्रजीत की मायावी युद्ध कला का वर्णन करता है।

🌀 माया का प्रयोग (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-८ ॥
ततः इन्द्रजित् क्रोधवशो रामं लक्ष्मणमेव च ।
मायामास्थाय दुर्धर्षो युद्ध्यमानो न दृश्यते ॥
स रथेन महाघोरेण सिंहनादेन नादयन् ।
दिशः सर्वा विदिशश्च बाणवर्षैरवाकिरत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; इन्द्रजित् = इंद्रजीत; क्रोधवशः = क्रोध के वश में; रामम् = राम पर; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण पर; एव = ही; च = और; मायाम् = माया; आस्थाय = धारण कर; दुर्धर्षः = अजेय; युद्ध्यमानः = युद्ध करता हुआ; न दृश्यते = दिखाई नहीं देता; सः = वह; रथेन = रथ से; महाघोरेण = अत्यंत भयंकर; सिंहनादेन = सिंहनाद से; नादयन् = नाद करता हुआ; दिशः = दिशाओं; सर्वाः = सभी; विदिशः = विदिशाओं; च = और; बाणवर्षैः = बाणों की वर्षा से; अवाकिरत् = आच्छादित कर दिया।
📖 भावार्थ : तब क्रोध के वश में हुए अजेय इंद्रजीत ने माया धारण कर राम और लक्ष्मण से युद्ध किया, किन्तु वह दिखाई नहीं दे रहा था। वह अत्यंत भयंकर रथ से सिंहनाद करता हुआ, सभी दिशाओं और विदिशाओं को बाणों की वर्षा से आच्छादित कर रहा था।
॥ श्लोक ९-१२ ॥
रामस्तु भृशसंक्रुद्धो लक्ष्मणेन समन्वितः ।
दिशो विदिश आकाशं बाणैरापूरयद् बली ॥
न च तं द्रष्टुमशकत् मायया प्रतिसंवृतम् ॥
📖 भावार्थ : राम अत्यंत क्रुद्ध होकर लक्ष्मण के साथ मिलकर दिशाओं, विदिशाओं और आकाश को बाणों से भर रहे थे, किन्तु उस माया से आच्छादित इंद्रजीत को देख नहीं पा रहे थे।

🐍 नागपाश (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-२० ॥
ततः स रावणिर्मायां समास्थाय सुदारुणाम् ।
नागपाशेन तौ बद्ध्वा रामलक्ष्मणावरिंदमौ ॥
ननाद सिंहनादं च हर्षेण महता वृतः ।
वानराश्च भयत्रस्ता विदुद्रुवुरितस्ततः ॥
📖 भावार्थ : तब उस रावणि ने अत्यंत दारुण माया धारण कर, उन अरिंदम राम-लक्ष्मण को नागपाश से बांध दिया। और हर्ष से भरकर सिंहनाद किया। वानर भय से त्रस्त होकर इधर-उधर भागने लगे।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
तौ दृष्ट्वा नागपाशेन बद्धौ रामसलक्ष्मणौ ।
हाहाकारो महानासीत् सर्वेषां वानराधिपे ॥
सुग्रीवो विह्वलः शोकाद् विभीषणसमन्वितः ।
निषेदुर्धरणीपृष्ठे मुह्यमाना मुहुर्मुहुः ॥
📖 भावार्थ : राम और लक्ष्मण को नागपाश से बंधा देखकर सभी वानरों में हाहाकार मच गया। सुग्रीव शोक से विह्वल हो गए और विभीषण के साथ धरती पर गिरकर बार-बार मूर्छित होने लगे।

🏹 इंद्रजीत की विजय (श्लोक २६-४२)

॥ श्लोक २६-३४ ॥
ततः प्रहृष्टो रावणिः पितुरन्तिकमागतः ।
उवाच प्रणतो वाक्यं रावणं राक्षसेश्वरम् ॥
बद्धौ मया महाबाहो रामलक्ष्मणवानरौ ।
नागपाशेन दुर्धर्षौ किं करोमि तवानघ ॥
📖 भावार्थ : तब हर्षित होकर रावणि पिता के पास आया और राक्षसेश्वर रावण से प्रणाम करके बोला: "हे महाबाहो, मैंने राम-लक्ष्मण को नागपाश से बांध दिया है। ये दोनों दुर्धर्ष हैं। हे अनघ, अब मैं क्या करूं?"
॥ श्लोक ३५-४२ ॥
रावणस्तु तदा राजन् पुत्रं संपूज्य भाषत ।
साधु पुत्र महाबाहो कृतं कर्म सुदुष्करम् ॥
विश्राम्यतां भवानद्य श्वो युद्धं करवामहे ।
इत्युक्त्वा प्रेषयामास रावणो रावणिं गृहम् ॥
इत्येष चत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य वर्णितः ।
इन्द्रजिन्मायया युद्धं रामलक्ष्मणबन्धनम् ॥
📖 भावार्थ : तब राजा रावण ने पुत्र की प्रशंसा करते हुए कहा: "साधु, हे पुत्र महाबाहो, तुमने अत्यंत दुष्कर कर्म किया है। आज तुम विश्राम करो, कल युद्ध करेंगे।" ऐसा कहकर रावण ने रावणि को घर भेज दिया। इस प्रकार युद्धकाण्ड का चालीसवाँ सर्ग वर्णित हुआ, जिसमें इंद्रजीत की माया से युद्ध और राम-लक्ष्मण का बंधन बताया गया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐍 नागपाश का प्रभाव

नागपाश एक दिव्य अस्त्र है, जिससे राम-लक्ष्मण बंध जाते हैं, जो युद्ध के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है।

😢 वानरों की दुर्दशा

राम-लक्ष्मण के बंधन से वानर सेना में शोक और भय छा जाता है।

🎯 शिक्षा : युद्ध में कभी-कभी परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो जाती हैं, लेकिन धैर्य नहीं खोना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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