विभीषण का राम के शरण में जाने का निर्णय

रावण द्वारा अपमानित होने पर विभीषण चार राक्षसों के साथ लंका छोड़कर राम की शरण में जाते हैं। सुग्रीव और अन्य वानरों के संदेह के बावजूद, राम उनका भव्य स्वागत करते हैं और उन्हें लंका का राजा घोषित करते हैं।

विवरण

इस महत्वपूर्ण सर्ग में, विभीषण रावण की सभा में अंतिम प्रयास करते हैं और रावण से सीता को लौटाने और राम से मित्रता करने का आग्रह करते हैं। रावण, अपने अहंकार में चूर, इस सलाह को अपमान समझकर विभीषण को लात मारकर सभा से निकलवा देता है। अपमानित और असहाय, विभीषण अपने चार निष्ठावान साथियों के साथ लंका त्याग देते हैं। वे समुद्र पार करके राम के शिविर में पहुँचते हैं। वानर सेना के प्रमुख सदस्यों, विशेषकर सुग्रीव और हनुमान को उन पर संदेह होता है, क्योंकि वे रावण के भाई हैं। लेकिन राम, अपनी असीम करुणा और धर्म के ज्ञान से, सबको समझाते हैं कि शरण में आए किसी भी व्यक्ति का स्वागत किया जाना चाहिए, चाहे वह शत्रु ही क्यों न हो। राम विभीषण को आश्वासन देते हैं और उन्हें लंका का राजा घोषित करते हैं। यह घटना राम के उदार चरित्र और धर्म के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को दर्शाती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ४

(विभीषण का राम के शरण में जाने का निर्णय)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्थः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के दरबार में अंतिम बार सत्य की बात कहने वाले विभीषण को अपने ही भाई से लात और अपमान मिलता है। धर्म की राह पर चलने का यही क्षण उन्हें प्रभु श्रीराम की शरण तक ले आता है, जहाँ उनका राज्याभिषेक होना है। यह सर्ग शरणागति के सर्वोच्च आदर्श का प्रतीक है।

🏛️ रावण का क्रोध और विभीषण का निष्कासन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा सर्वधर्मविशारदः ।
पुनरप्यब्रवीद्वाक्यं हितं सत्यपराक्रमः ॥
रावणं क्रोधताम्राक्षं निश्वसन्तं यथा रणे ।
उचितं कुरु राजेन्द्र मा क्रोधं त्वं जुगुप्सितम् ॥
रामाद्विनाशः सर्वेषां राक्षसानां भविष्यति ।
यदि सीता न दास्यामि वैदेही राघवाय वै ॥
ममापि वचनं श्रुत्वा हितमर्थ्यं सुसंमतम् ।
रामं शरणमभ्येहि सुग्रीवेण समागतः ॥
🔹 पदच्छेद सहित भावार्थ : धर्मात्मा और सत्यपराक्रमी विभीषण ने क्रोध से लाल-पीली आँखों वाले रावण से पुनः हितकारी वचन कहा: "राजेन्द्र! उचित करो, इस जुगुप्सित क्रोध को त्यागो। यदि तुमने वैदेही सीता को राघव को नहीं लौटाया तो सभी राक्षसों का विनाश निश्चित है। मेरे इस हितकर वचन को सुनो और सुग्रीव सहित राम की शरण में जाओ।"
॥ श्लोक ५-१० ॥
इत्युक्त्वा राक्षसेन्द्रेण विभीषणममर्षणः ।
उत्थाय सहसा राजा प्रहसन्निव रावणः ॥
प्रत्युवाच ततो वाक्यं परुषं हेतुमत्स्थितम् ।
अवमत्य च तं भ्रातुः पादेन प्रहसन्निव ॥
विभीषणस्ततः क्रुद्धो निर्गतः सह बन्धुभिः ।
चतुर्भिरेव रक्षोभिराकाशं समुपाश्रितः ॥
ददर्श च ततो रामं सुग्रीवं च महाबलम् ।
समुद्रतीरमासाद्य वानरैः सह संवृतम् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहने पर अमर्षी राक्षसेन्द्र रावण तुरंत उठ खड़ा हुआ और हँसते हुए (क्रोध में) अपने भाई का तिरस्कार करते हुए उसे पैर से मारा और परुष वचन बोला। तब विभीषण क्रोधित होकर अपने चार राक्षस साथियों के साथ वहाँ से निकल गए और आकाश मार्ग से समुद्र तट पर पहुँचे, जहाँ महाबली राम और सुग्रीव वानरों से घिरे हुए थे।

🤔 संदेह से समर्पण तक: राम की शरण में (श्लोक ११-२४)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
ततः सुग्रीवो धर्मात्मा ददर्श विभीषणम् ।
सह बन्धुभिरायान्तं शङ्कामाप स वीर्यवान् ॥
सर्वे वानरमुख्याश्च जगृहुः सशरान् धनूंषि च ।
अभिपेतुः सुसंरब्धा विभीषणजिघांसया ॥
तानुवाच ततो रामो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ।
नैते वध्याः कथंचिद्धि शरणागतवत्सलाः ॥
शरणागतरक्षा हि धर्मः सनातनः स्मृतः ।
सत्येन रक्ष्यते धर्मः सत्यमेव परं बलम् ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा सुग्रीव ने विभीषण को बंधु-बांधवों सहित आते देखा और शंका में पड़ गए। सभी वानर प्रमुखों ने धनुष-बाण उठा लिए और विभीषण को मारने के लिए दौड़े। तब शुभलक्षण लक्ष्मण को देखकर राम ने कहा: "इन्हें कभी नहीं मारना चाहिए। शरण में आए हुए की रक्षा करना ही सनातन धर्म है। सत्य द्वारा ही धर्म की रक्षा होती है और सत्य ही परम बल है।"
॥ श्लोक १९-२४ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राघवस्य महात्मनः ।
विभीषणः सहामात्यः प्रणम्य शिरसा नृपम् ॥
उवाच परमोदारं वचनं धर्मसंहितम् ।
राम राम महाबाहो जानकीशो नमोस्तु ते ॥
त्वामहं शरणं प्राप्तः सर्वसौहार्दवर्जितः ।
भवन्तं द्रष्टुमिच्छामि सुग्रीवेण समागतः ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।
उवाच परमप्रीतो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥
अभिषेचयितुं राज्ये लङ्कायां राक्षसेश्वरम् ।
युक्तं हि सख्यमस्माकं विभीषणमरिंदम ॥
📖 भावार्थ : महात्मा राघव का यह वचन सुनकर विभीषण अपने अमात्यों सहित सिर झुकाकर बोले: "हे राम! हे महाबाहो! हे जानकीनाथ! आपको नमस्कार है। मैं सब प्रकार के सौहार्द से रहित होकर आपकी शरण में आया हूँ। मैं सुग्रीव के साथ आपके दर्शन की इच्छा रखता हूँ।" उनके वचन सुनकर सत्यपराक्रमी राम अत्यंत प्रसन्न हुए और लक्ष्मण से बोले: "इन अरिंदम विभीषण का लंका के राज्य के लिए अभिषेक करना उचित है। हमारी इनसे मित्रता होनी चाहिए।"

👑 राम द्वारा विभीषण का राज्याभिषेक (श्लोक २५-३०)

॥ श्लोक २५-३० ॥
ततः प्रीतेन मनसा रामो वचनमब्रवीत् ।
विभीषण महाभाग सख्यं ते सुगृहीतम् मया ॥
यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी ।
तावत् त्वं राक्षसेन्द्रत्वे लङ्कायां स्थापितो मया ॥
इत्युक्त्वा प्रददौ राज्यं लङ्कायां राक्षसेश्वरम् ।
विभीषणं महात्मानं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥
ववन्दे तं ततः सर्वे वानरा राक्षसास्तथा ।
जयशब्दो महानासीद्रामस्य च विशेषतः ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न मन से राम ने कहा: "हे महाभाग विभीषण! मैंने तुमसे मित्रता कर ली है। जब तक चंद्र-सूर्य रहेंगे और पृथ्वी रहेगी, तब तक तुम मेरे द्वारा लंका के राक्षसेन्द्र पद पर स्थापित किए गए हो।" ऐसा कहकर उन्होंने सर्वलोक नमस्कृत महात्मा विभीषण को लंका का राज्य प्रदान किया। तब सभी वानरों और राक्षसों ने उनका अभिवादन किया और विशेष रूप से राम के लिए महान जयशब्द हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙏 शरणागति का आदर्श

यह सर्ग बताता है कि सच्ची शरणागति में जाति, कुल या पूर्व वैर का विचार नहीं किया जाता। राम ने विभीषण के आत्मसमर्पण को स्वीकार कर मानवता को सर्वोच्च नैतिकता का पाठ पढ़ाया।

🧘 राम का करुण हृदय

जहाँ वानरों ने विभीषण को रावण का भाई मात्र देखा, वहीं राम ने उन्हें एक धर्मात्मा प्राणी देखा। यह राम के दिव्य और निष्पक्ष दृष्टिकोण को दर्शाता है।

⚖️ धर्म की स्थापना

राम ने युद्ध से पहले ही विभीषण को लंका का राज्य देकर यह सुनिश्चित कर दिया कि युद्ध के बाद लंका में एक धर्मी राजा की स्थापना होगी।

🚀 आगामी युद्ध की रणनीति

विभीषण के आगमन से राम की सेना को लंका की गुप्त जानकारियाँ और एक कुशल मार्गदर्शक मिल गया, जिसने युद्ध की दिशा बदल दी।

🎯 शिक्षा : जीवन में सबसे बड़ा बल शारीरिक नहीं, नैतिक होता है। रावण ने शारीरिक बल के मद में सत्य को त्याग दिया, जबकि राम ने सत्य और करुणा के बल पर विजय प्राप्त की। सच्चा नेतृत्व वही है जो शरण में आए हुए की रक्षा करे।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।