युद्ध काण्ड अध्याय 39

इंद्रजीत का पुनः युद्ध में आना

रावण की सेना की दयनीय स्थिति देखकर इंद्रजीत पुनः युद्ध में आने का निश्चय करता है। वह रावण से आज्ञा लेकर रथ पर सवार होकर युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है।

विवरण

रावण के पराजित होने के बाद राक्षस सेना में हाहाकार मच जाता है। तब महावीर इंद्रजीत अपने पिता रावण से युद्ध में जाने की आज्ञा मांगता है। रावण उसे आशीर्वाद देता है। इंद्रजीत रथ पर आरूढ़ होकर, विविध अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित, युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है। उसे देखकर वानर सेना में भय का संचार होता है, क्योंकि वह पूर्व में इंद्र को पराजित कर चुका है।

(इंद्रजीत का पुनः युद्ध में आना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के पराजित होने और उसके रथ के भंग हो जाने के बाद राक्षस सेना निराश हो गई। तब इंद्रजीत ने पिता की आज्ञा लेकर पुनः युद्ध में आने का निर्णय लिया। यह सर्ग उसके रणोत्साह और वानर सेना में भय के संचार का वर्णन करता है।

⚔️ इंद्रजीत का निर्णय (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः संप्रेक्ष्य रक्षांसि हन्यमानानि वानरैः ।
रावणिं क्रोधसंयुक्तो रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥
पुत्र गच्छ महाबाहो युद्धायैव समाहितः ।
जहि शत्रून् रणे वीर यथा वृत्रं पुरंदरः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; संप्रेक्ष्य = देखकर; रक्षांसि = राक्षसों को; हन्यमानानि = मारे जाते हुए; वानरैः = वानरों द्वारा; रावणिम् = रावणि (इंद्रजीत) को; क्रोधसंयुक्तः = क्रोध से युक्त; रावणः = रावण; वाक्यम् = वचन; अब्रवीत् = बोला; पुत्र = हे पुत्र; गच्छ = जाओ; महाबाहो = महाबाहो; युद्धाय = युद्ध के लिए; एव = ही; समाहितः = तत्पर होकर; जहि = मारो; शत्रून् = शत्रुओं को; रणे = रण में; वीर = हे वीर; यथा = जैसे; वृत्रम् = वृत्र को; पुरंदरः = इंद्र ने।
📖 भावार्थ : तब राक्षसों को वानरों द्वारा मारे जाते देखकर रावण क्रोध से युक्त होकर इंद्रजीत से बोला: "हे पुत्र महाबाहो, युद्ध के लिए तत्पर होकर जाओ। हे वीर, रण में शत्रुओं को मारो, जैसे इंद्र ने वृत्र को मारा था।"
॥ श्लोक ७-१२ ॥
स तु पित्रा समादिष्टो रावणेन महात्मना ।
आरुरोह रथं शीघ्रं तप्तकाञ्चनभूषणम् ॥
तमारूढं रथेन्द्रेण दीप्यमानं स्वतेजसा ।
न शेकुर्वानरा द्रष्टुं भास्करं प्रति रश्मयः ॥
📖 भावार्थ : उसने पिता महात्मा रावण की आज्ञा पाकर शीघ्र ही तपे हुए सोने के आभूषणों से युक्त रथ पर चढ़ाई की। उस रथेन्द्र पर आरूढ़, अपने तेज से दीप्यमान उसे देखना वानरों के लिए असंभव था, जैसे सूर्य को देखना किरणों के लिए कठिन है।

😨 वानरों में भय (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-२० ॥
तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे विव्यथुर्भयशङ्किताः ।
स्मृत्वा तस्य पुरा कर्म येन जित्वा सुरेश्वरम् ॥
सुग्रीवस्त्वब्रवीद्रामं भयार्तः शरणैषिणम् ।
अयं स रावणिः क्रूरो युद्धाय समुपस्थितः ॥
📖 भावार्थ : उसे देखकर सभी वानर भय से व्याकुल हो गए, उसके पूर्व के कर्मों को स्मरण करके, जिससे उसने देवराज इंद्र को भी जीत लिया था। सुग्रीव ने भयार्त होकर राम से कहा: "यह वही क्रूर रावणि है जो युद्ध के लिए उपस्थित हुआ है।"
॥ श्लोक २१-२५ ॥
रामस्तु प्रत्युवाचेदं सुग्रीवं सत्यविक्रमः ।
न भेतव्यं प्लवंगेन्द्र मया सार्धं समागतः ॥
अहमेनं विनाशिष्ये ससैन्यं रणमूर्धनि ।
प्रतीक्षतां भवानत्र यावदेनं निहन्म्यहम् ॥
📖 भावार्थ : सत्यविक्रम राम ने सुग्रीव से कहा: "हे प्लवंगेन्द्र, डरना नहीं चाहिए। वह मेरे साथ युद्ध के लिए आया है। मैं इसको ससैन्य रणभूमि में नष्ट कर दूंगा। आप यहाँ प्रतीक्षा करें जब तक मैं इसका वध कर दूं।"

🔮 युद्ध की तैयारी (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा धनुरादाय वीर्यवान् ।
उवाच लक्ष्मणं वीरं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
सज्जीभवन्तु सैन्यानि राक्षसेन्द्रजितं प्रति ।
अद्य पश्यत मे वीर्यं युद्धे तस्मिन् दुरात्मनि ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा वीर्यवान् श्रीराम ने धनुष उठाकर वीर लक्ष्मण और महाबली सुग्रीव से कहा: "सेनाएँ राक्षसेन्द्रजित के विरुद्ध सज्ज हो जाएँ। आज उस दुरात्मा के साथ युद्ध में मेरा वीर्य देखो।"
॥ श्लोक ३३-३८ ॥
ततः प्रहृष्टा वानराः सुग्रीवप्रमुखास्तदा ।
नर्दन्तः सिंहनादांश्च चेलुः सर्वे समन्ततः ॥
इत्येष एकोनचत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
रावणेः पुनरागमो रामस्य च महोद्यमः ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव आदि प्रमुख वानर हर्षित होकर सिंहनाद करते हुए चारों ओर से चल दिए। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह उनतालीसवाँ सर्ग है, जिसमें रावणि का पुनः आगमन और राम का महान उद्योग वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👊 इंद्रजीत का साहस

पिता की पराजय के बाद भी इंद्रजीत युद्ध में उतरता है, जो उसकी वीरता और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है।

🛡️ राम का आत्मविश्वास

राम वानरों को आश्वस्त करते हैं और स्वयं युद्ध के लिए तत्पर होते हैं।

🎯 शिक्षा : कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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