युद्ध काण्ड अध्याय 38

रावण का पराजित होना

राम और रावण के बीच भीषण युद्ध के बाद राम रावण को पराजित कर देते हैं। रावण का रथ भंग हो जाता है और वह धरती पर गिर जाता है।

विवरण

राम और रावण का युद्ध अपने चरम पर होता है। राम ब्रह्मास्त्र का संधान करते हैं और रावण के वक्ष पर प्रहार करते हैं। रावण का रथ भंग हो जाता है, उसके अस्त्र-शस्त्र निष्प्रभावी हो जाते हैं, और वह मूर्छित होकर धरती पर गिर जाता है। राक्षस सेना में हाहाकार मच जाता है, जबकि वानर सेना जय-जयकार करती है। राम रावण के प्रति आदर भाव रखते हैं, क्योंकि वह एक महान योद्धा है। यह सर्ग रावण की पराजय और राम की विजय की पूर्व घोषणा करता है।

(रावण का पराजित होना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टात्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम और रावण का युद्ध अब अंतिम चरण में है। राम ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं और रावण का रथ भंग कर देते हैं। यह सर्ग रावण की पराजय और राम की विजय का प्रारंभिक क्षण है।

🏹 ब्रह्मास्त्र का प्रयोग (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-८ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा रावणं प्रति संयुगे ।
ब्रह्मास्त्रं प्रसमाधाय मुमोचैनदरिंदमः ॥
तदस्त्रं प्रज्वलन् दीप्त्या रावणस्य वधाय वै ।
जगाम रथिनां श्रेष्ठं रावणं रणमूर्धनि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; श्रीरामः = श्रीराम; धर्मात्मा = धर्मात्मा; रावणम् = रावण के; प्रति = प्रति; संयुगे = युद्ध में; ब्रह्मास्त्रम् = ब्रह्मास्त्र; प्रसमाधाय = अच्छी तरह संधान कर; मुमोच = छोड़ा; एनत् = इसे; अरिंदमः = शत्रुओं का दमन करने वाले; तत् = वह; अस्त्रम् = अस्त्र; प्रज्वलन् = प्रज्वलित होता हुआ; दीप्त्या = तेज से; रावणस्य = रावण के; वधाय = वध के लिए; वै = ही; जगाम = गया; रथिनाम् = रथियों में; श्रेष्ठम् = श्रेष्ठ; रावणम् = रावण पर; रणमूर्धनि = रणभूमि में।
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा श्रीराम ने युद्ध में रावण के प्रति ब्रह्मास्त्र का संधान किया और उसे छोड़ दिया, वे शत्रुदमन करने वाले थे। वह अस्त्र प्रज्वलित तेज से रथियों में श्रेष्ठ रावण के वध के लिए रणभूमि में जा लगा।
॥ श्लोक ९-१२ ॥
तदस्त्रप्रहितो रामो रावणं समताडयत् ।
वक्षस्येव सुसंक्रुद्धः सर्वप्राणहरं महत् ॥
ततः स रावणो राजा भृशमार्तो ननाद ह ।
रथोपस्थे व्यतिष्ठत सम्मूर्छितः पपात च ॥
📖 भावार्थ : उस अस्त्र द्वारा प्रेरित होकर राम ने रावण के वक्ष पर प्रहार किया, अत्यंत क्रुद्ध होकर, वह सर्वप्राणहर महान अस्त्र था। तब वह राजा रावण अत्यंत पीड़ित होकर गर्जना कर उठा, और रथ के आसन पर बैठा रह गया (या: रथ के पास खड़ा रहा), फिर मूर्छित होकर गिर पड़ा।

💥 रथ का भंग होना (श्लोक १३-२२)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
तस्य रथो हतो राजन् सारथिश्च निपातितः ।
भग्नाश्च बहवो यूपा ध्वजो भग्नः पपात ह ॥
रावणस्य तदा राजन् रामबाणप्रपीडितः ।
बभूव विरथः श्रीमान् राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्, उसका रथ नष्ट हो गया, सारथि मारा गया, बहुत से यूप (ध्वजा के स्तम्भ) टूट गए और ध्वजा टूटकर गिर पड़ी। राम के बाणों से पीड़ित उस प्रतापी राक्षसेन्द्र श्रीमान् रावण उस समय विरथ हो गया।
॥ श्लोक १९-२२ ॥
तं दृष्ट्वा विरथं राजन् राक्षसाः पर्यवारयन् ।
रामबाणाभिभूतास्ते न शेकुः स्थातुमग्रतः ॥
हाहाकारो महानासीद् राक्षसानां विशां पते ।
वानराश्च महात्मानो नेदुर्हर्षसमन्विताः ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्, उसे विरथ देखकर राक्षसों ने चारों ओर से घेर लिया, किन्तु वे रामबाणों से अभिभूत होकर सामने ठहर न सके। राक्षसों में हाहाकार मच गया, हे विशांपते, और महात्मा वानर हर्ष से गर्जना करने लगे।

🙏 राम का आदर (श्लोक २३-३२)

॥ श्लोक २३-२८ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा विभीषणमभाषत ।
गच्छ शत्रोर्ममासन्नं रावणं युद्धदुर्मदम् ॥
न हन्तव्यः सुसंक्रुद्धैरयं शत्रुर्नृशंसवत् ।
योद्धव्यं धर्मतः सर्वैः क्षत्रियेण विशेषतः ॥
एतदर्थं हि राज्यानि योधवृत्तं विधीयते ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा श्रीराम ने विभीषण से कहा: "जाओ, मेरे शत्रु, युद्धदुर्मद रावण के पास। इस शत्रु को अत्यंत क्रोधित होकर भी नृशंसता से नहीं मारना चाहिए। सभी को धर्मपूर्वक युद्ध करना चाहिए, विशेषतः क्षत्रिय को। राज्यों की स्थापना भी योधवृत्त (युद्ध धर्म) के लिए ही होती है।"
॥ श्लोक २९-३२ ॥
विभीषणस्तु तच्छ्रुत्वा राघवस्य वचः शुभम् ।
रावणं प्रत्युवाचेदं प्राञ्जलिः समुपस्थितः ॥
रामस्य वचनात् राजन् क्षमस्व सुमहद्वचः ।
युद्धे नोत्सहसे भूयः कृतकर्मासि राक्षस ॥
इत्येष अष्टत्रिंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य वर्णितः ।
रावणस्य पराजयश्च रामस्य विजयस्तथा ॥
📖 भावार्थ : विभीषण ने राघव के उन शुभ वचनों को सुनकर, रावण के पास जाकर हाथ जोड़कर यह कहा: "हे राजन्, राम के वचन से यह सुमहद् वचन क्षमा करो। तुम युद्ध में फिर उत्साह नहीं रखते, तुमने अपना कर्म कर लिया है, हे राक्षस।" इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह अड़तीसवाँ सर्ग वर्णित हुआ, जिसमें रावण की पराजय और राम की विजय बताई गई है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕊️ राम का धर्मपरायणता

राम ने युद्ध के नियमों का पालन करते हुए रावण के प्रति भी आदर दिखाया, जो उनके चरित्र की महानता को दर्शाता है।

💔 रावण की दुर्दशा

रावण का विरथ होना और मूर्छित होना उसके अहंकार के अंत का प्रतीक है।

🎯 शिक्षा : पराजय के बाद भी शत्रु के प्रति सम्मान रखना उच्च चरित्र का लक्षण है। राम ने युद्ध धर्म का पालन किया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे अष्टत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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