युद्ध काण्ड अध्याय 37

राम द्वारा रावण की माया का भेद

राम रावण की माया का भेद जान लेते हैं और वानर सेना को समझाते हैं कि यह सब माया है। वे सभी को आश्वस्त करते हैं और रावण से युद्ध जारी रखते हैं।

विवरण

राम रावण की माया का रहस्य समझ जाते हैं। वह देखते हैं कि रावण ने माया से अनेक रूप रच लिए हैं, किन्तु असली रावण एक ही है। राम वानर सेना को संबोधित करते हुए समझाते हैं कि यह सब माया है और उन्हें भय त्याग कर युद्ध में डटे रहना चाहिए। वे विभीषण से भी रावण की माया के बारे में पूछते हैं और उनसे रावण की कमजोरी जानने का प्रयास करते हैं। राम के आश्वासन से वानर सेना पुनः साहस करके युद्ध के लिए तैयार हो जाती है।

(राम द्वारा रावण की माया का भेद)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण की माया से त्रस्त वानर सेना को देखकर राम न केवल स्वयं माया का भेद समझ गए, बल्कि अपनी वाणी से सेना का मनोबल भी बढ़ाया। यह सर्ग राम के कूटनीतिक और सैन्य कौशल का परिचायक है।

🔍 माया का भेद (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा विभीषणमभाषत ।
का इयं रावणस्यैषा माया परमदारुणा ॥
कथं विनाश्यते राजन् केन वा न प्रबाध्यते ।
एतदिच्छामि तत्त्वेन वेदितुं त्वद्वचो यथा ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; श्रीरामः = श्रीराम; धर्मात्मा = धर्मात्मा; विभीषणम् = विभीषण से; अभाषत = बोले; का = क्या; इयम् = यह; रावणस्य = रावण की; एषा = यह; माया = माया; परमदारुणा = अत्यंत भयंकर; कथम् = कैसे; विनाश्यते = नष्ट होती है; केन वा = किससे या; न प्रबाध्यते = नहीं बाधित होती; एतत् = यह; इच्छामि = चाहता हूँ; तत्त्वेन = तत्त्व से; वेदितुम् = जानना; त्वद्वचो = आपके वचनों के अनुसार; यथा = जैसे।
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा श्रीराम ने विभीषण से पूछा: "रावण की यह परम भयंकर माया क्या है? यह कैसे नष्ट होती है? किससे यह बाधित नहीं होती? मैं इसे तत्त्व से जानना चाहता हूँ, आप वैसा ही बताइए जैसा है।"
॥ श्लोक ७-१० ॥
ततः विभीषणो राजन् रामं सत्यपराक्रमम् ।
उवाच वचनं काले राक्षसेन्द्रस्य मायिकम् ॥
एषा रावण माया ते राक्षसी परमाद्भुता ।
ब्रह्मणा निर्मिता पूर्वं रावणस्याभयार्थिना ॥
सा तु दिव्यास्त्रयोगेन नश्यते नात्र संशयः ॥
📖 भावार्थ : तब राजन्, विभीषण ने सत्यपराक्रमी राम से राक्षसेन्द्र की उस माया के विषय में उचित समय पर कहा: "यह रावण की राक्षसी, परम अद्भुत माया है, जो पूर्व में ब्रह्मा द्वारा रावण को अभय देने के लिए निर्मित की गई थी। किन्तु यह दिव्य अस्त्रों के प्रयोग से नष्ट हो जाती है, इसमें संशय नहीं।"

🗣️ राम का वानर सेना को सम्बोधन (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
ततः श्रीरामो वानरान् सुग्रीवप्रमुखान् प्रति ।
उवाच वचनं धीमान् भयत्रस्तान् समन्ततः ॥
न भेतव्यं प्लवंगाश्च नैषा सत्या विनिर्मिता ।
माया रावणराजस्य विनशिष्यति सायकैः ॥
प्रतियोधयत क्षिप्रं मया सार्धमरिंदमाः ॥
📖 भावार्थ : तब धीमान् श्रीराम ने सुग्रीव आदि प्रमुख वानरों से, जो चारों ओर से भय से त्रस्त थे, कहा: "हे प्लवंगमो, डरना नहीं चाहिए। यह रावणराज की माया सत्य नहीं है, यह मेरे बाणों से नष्ट हो जाएगी। हे अरिंदमो, शीघ्र ही मेरे साथ युद्ध करो।"
॥ श्लोक १८-२२ ॥
तच्छ्रुत्वा वानराः सर्वे राघवस्य वचः शुभम् ।
विस्मयं परमं जग्मुः प्रहर्षं चोपपेदिरे ॥
त्यक्त्वा भयं महात्मानो युद्धायैव मनो दधुः ॥
📖 भावार्थ : राघव के उन शुभ वचनों को सुनकर सभी वानरों ने परम विस्मय और हर्ष का अनुभव किया। भय त्यागकर उन महात्माओं ने युद्ध के लिए मन लगा दिया।

⚔️ पुनः युद्ध (श्लोक २३-३६)

॥ श्लोक २३-३० ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा धनुरादाय वीर्यवान् ।
विव्याध रावणं क्रुद्धो बहुभिः सायकैः शितैः ॥
रावणोऽपि महाराज रामं क्रोधसमन्वितः ।
विव्याध बहुभिर्बाणैर्दिव्यैराशीविषोपमैः ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा वीर्यवान् श्रीराम ने धनुष उठाकर क्रुद्ध होकर रावण को बहुत से तीक्ष्ण बाणों से बींधा। हे महाराज, रावण ने भी क्रोध से युक्त होकर राम को दिव्य और विषैले सर्पों के समान अनेक बाणों से बींधा।
॥ श्लोक ३१-३६ ॥
तयोर्युद्धं महद् घोरं प्रवृत्तं रोमहर्षणम् ।
देवासुरगणा यत्र विस्मयं परमं ययुः ॥
रामबाणप्रतिहता रावणस्य च मायिका ।
नाशं याता महाराज रामस्य विजयो महान् ॥
इत्येष सप्तत्रिंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य कीर्तितः ।
रामस्य मायाभेदश्च रावणस्य पराजयः ॥
📖 भावार्थ : उन दोनों का वह महान् घोर एवं रोमहर्षण युद्ध प्रवृत्त हुआ, जिसे देखकर देवता और असुर भी परम विस्मय को प्राप्त हुए। राम के बाणों से प्रतिहत होकर रावण की माया का नाश हो गया, हे महाराज, और राम की महान विजय हुई। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह सैंतीसवाँ सर्ग कीर्तित हुआ, जिसमें राम द्वारा माया का भेद और रावण की पराजय वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧠 राम की बुद्धिमत्ता

राम न केवल योद्धा हैं, बल्कि कुशल सेनापति भी हैं, जो सेना का मनोबल बढ़ाना जानते हैं।

🤝 विभीषण की भूमिका

विभीषण राम को रावण की कमजोरी बताते हैं, जो राम की विजय में सहायक होता है।

🎯 शिक्षा : कठिन परिस्थितियों में धैर्य और बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए, साथ ही अपने साथियों का उत्साह बनाए रखना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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