युद्ध काण्ड अध्याय 35

रावण-राम युद्ध

रावण और राम के बीच घोर युद्ध प्रारंभ होता है। दोनों एक-दूसरे पर अस्त्र-शास्त्रों की वर्षा करते हैं, और देवता भी इस युद्ध को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं।

विवरण

रावण और राम का युद्ध आरंभ होता है, जो अत्यंत भीषण और अद्भुत है। दोनों महारथी एक-दूसरे पर विविध दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हैं। रावण मायावी अस्त्रों का उपयोग करता है, जबकि राम अपने धैर्य और दिव्यास्त्रों से उनका सामना करते हैं। आकाश में देवता, गंधर्व और सिद्धगण इस अद्वितीय युद्ध को देखकर स्तब्ध रह जाते हैं। रावण के रथ और राम के रथ (या धरती पर खड़े होकर) के बीच घमासान संग्राम होता है। इस युद्ध में दोनों के बाणों से आकाश ढक जाता है।

(रावण-राम युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के रणांगण में आते ही राम-रावण का अद्वितीय युद्ध प्रारंभ होता है। दोनों एक-दूसरे पर अस्त्र-शास्त्रों की वर्षा करते हैं। यह सर्ग उस घोर संग्राम का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है।

⚔️ युद्ध का आरंभ (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-८ ॥
ततः रावणमायान्तं दृष्ट्वा रामो महाबलः ।
चकार युद्धं तुमुलं राक्षसेन्द्रेण धीमता ॥
उभौ महाबलौ वीरौ परस्परजिघांसया ।
चिक्षिपतुः शरव्रातान् मेघा इव सविद्युतः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रावणम् = रावण को; आयान्तम् = आते हुए; दृष्ट्वा = देखकर; रामः = राम; महाबलः = महान बल वाले; चकार = किया; युद्धम् = युद्ध; तुमुलम् = घोर; राक्षसेन्द्रेण = राक्षसों के राजा के साथ; धीमता = बुद्धिमान; उभौ = दोनों; महाबलौ = महान बल वाले; वीरौ = वीर; परस्परजिघांसया = एक-दूसरे को मारने की इच्छा से; चिक्षिपतुः = छोड़ा; शरव्रातान् = बाणों के समूह; मेघा इव = मेघों की तरह; सविद्युतः = बिजली युक्त।
📖 भावार्थ : तब आते हुए रावण को देखकर महाबली राम ने उस बुद्धिमान राक्षसराज के साथ घोर युद्ध आरंभ किया। दोनों महाबलशाली वीर एक-दूसरे को मारने की इच्छा से बाणों की वर्षा करने लगे, जैसे बिजलीयुक्त मेघ वर्षा करते हैं।
॥ श्लोक ९-१५ ॥
शरैः सुवर्णपुङ्खैश्च दीप्तैराशीविषोपमैः ।
आच्छादयत आकाशं रावणो राघवस्तथा ॥
न प्राज्ञायत किंचिच्च रविरभ्रैरिवावृतः ।
बाणजालैस्तदाकाशं समन्तात् प्रतिपेदिवान् ॥
📖 भावार्थ : सुवर्णपुङ्खों वाले और दीप्तिमान विषैले सर्पों के समान बाणों से रावण और राघव ने आकाश को ढक दिया। उस समय कुछ भी दिखाई नहीं देता था, जैसे बादलों से सूर्य ढक जाता है। बाणों के जाल से वह आकाश सब ओर से व्याप्त हो गया।

🌀 दिव्यास्त्रों का प्रयोग (श्लोक १६-३०)

॥ श्लोक १६-२२ ॥
ततः रावण संक्रुद्धो राघवं प्रति दुर्मतिः ।
प्रयुक्तवान् महामायां राक्षसी प्रति वै शरान् ॥
ते शरा राममुख्येन छिन्नाः श्रीरामसायकैः ।
पेतुर्धरणिपृष्ठे तु भग्नाश्च रणमूर्धनि ॥
📖 भावार्थ : तब दुर्मति रावण राम के प्रति अत्यंत क्रोधित होकर राक्षसी माया से युक्त बाणों का प्रयोग करने लगा। उन बाणों को श्रीराम ने अपने बाणों से काट दिया, जो टूटकर रणभूमि में धरती पर गिर पड़े।
॥ श्लोक २३-३० ॥
ततः श्रीराम धर्मात्मा ब्रह्मास्त्रं प्रति संदधे ।
तदस्त्रं रावणो दृष्ट्वा मायामाश्रित्य तस्थिवान् ॥
तयोर्युद्धं महद् घोरं देवगन्धर्वदानवाः ।
दृष्ट्वा विस्मयमापन्नाः शिरांसि च विधुन्वते ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र का संधान किया। उस अस्त्र को देखकर रावण ने माया का सहारा लिया और छिप गया। उन दोनों के घोर युद्ध को देखकर देवता, गंधर्व और दानव आश्चर्यचकित हो गए और सिर हिलाने लगे।

👁️ देवताओं का दृश्य (श्लोक ३१-४५)

॥ श्लोक ३१-۳۸ ॥
ततस्तु देवताः सर्वे समेत्य च सुरोत्तमाः ।
ऊचुः परस्परं राजन् रामरावणयो रणम् ॥
नैतद् मनुष्ययोर्युद्धं देवासुरनिभं महत् ।
रामो विष्णुः स्वयं साक्षाद् रावणः शङ्करः पुरा ॥
📖 भावार्थ : तब सभी देवता और सुरोत्तम एकत्र होकर आपस में राम और रावण के युद्ध के बारे में कहने लगे: "यह युद्ध मनुष्यों का नहीं है, बल्कि देवासुर के समान महान है। राम स्वयं साक्षात् विष्णु हैं और रावण पूर्व में शंकर था।"
॥ श्लोक ३९-४५ ॥
एवं तेषु ब्रुवाणेषु युद्धं चित्रमवर्तत ।
रावणस्य क्षयं कर्तुं रामस्य विजयाय च ॥
इत्येष पञ्चत्रिंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य वर्णितः ।
रामरावणयोर्युद्धं देवतानां च विस्मयः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार उनके कहते-कहते वह अद्भुत युद्ध चलता रहा, जो रावण के विनाश और राम की विजय के लिए था। इस प्रकार युद्धकाण्ड का पैंतीसवाँ सर्ग वर्णित हुआ, जिसमें राम-रावण का युद्ध और देवताओं का विस्मय बताया गया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚔️ धर्म और अधर्म का युद्ध

यह युद्ध धर्म (राम) और अधर्म (रावण) के बीच का संघर्ष है, जिसमें देवता भी राम की विजय की कामना करते हैं।

🌀 माया और सत्य

रावण की माया के सामने राम का सत्य और दिव्यास्त्र विजयी होते हैं।

🎯 शिक्षा : सत्य और धर्म की शक्ति सदैव माया और अधर्म पर भारी पड़ती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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