युद्ध काण्ड अध्याय 34

रावण का पुनः स्वयं युद्ध में जाना

रावण अपनी सेना की पराजय देखकर क्रोधित हो उठता है और स्वयं युद्ध में जाने का निश्चय करता है। वह रथ पर सवार होकर युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है।

विवरण

राम और वानर सेना द्वारा राक्षसों के लगातार पराजित होने के बाद रावण अत्यंत क्रोधित होता है। वह अपने मंत्रियों की सलाह को अनसुना कर स्वयं युद्ध में जाने का निर्णय लेता है। अपने रथ पर सवार होकर, विविध अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित, वह युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करता है। उसके जाने से राक्षस सेना में उत्साह का संचार होता है। रावण के रथ की गर्जना से तीनों लोक कंपित हो जाते हैं। यह सर्ग रावण के अहंकार और युद्ध के प्रति उसके दृढ़ निश्चय को दर्शाता है।

(रावण का पुनः स्वयं युद्ध में जाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राक्षस सेना के पराजित होने और अनेक वीर योद्धाओं के मारे जाने के पश्चात् रावण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वह स्वयं युद्ध में उतरने का निश्चय करता है। यह सर्ग रावण के रणोत्साह और उसके आत्मविश्वास का वर्णन करता है।

🔥 रावण का क्रोध और निर्णय (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः संप्रेक्ष्य रक्षांसि हन्यमानानि वानरैः ।
रावणः क्रोधमाहार्षीद् दिदृक्षुः स्वबलं महत् ॥
स मन्त्रिभिरुपासीनैरुच्यमानो हितं वचः ।
न चकार मतिं तेषां युद्धोद्योगपरायणः ॥
आरुरोह रथं शीघ्रं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।
ध्वजिनं हेमचित्राङ्गं रथघोषेण नादयन् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; संप्रेक्ष्य = देखकर; रक्षांसि = राक्षसों को; हन्यमानानि = मारे जाते हुए; वानरैः = वानरों द्वारा; रावणः = रावण; क्रोधम् = क्रोध; आहार्षीत् = धारण किया; दिदृक्षुः = देखने की इच्छा वाला; स्वबलम् = अपनी सेना को; महत् = महान; सः = वह; मन्त्रिभिः = मंत्रियों द्वारा; उपासीनैः = पास बैठे हुए; उच्यमानः = कहे जाने पर; हितम् = हितकर; वचः = वचन; न चकार = नहीं किया; मतिम् = बुद्धि; तेषाम् = उनकी; युद्धोद्योगपरायणः = युद्ध के लिए उद्यत; आरुरोह = चढ़ा; रथम् = रथ पर; शीघ्रम् = शीघ्र; तप्तकाञ्चनभूषणम् = तपे हुए सोने के आभूषणों से युक्त; ध्वजिनम् = ध्वजा वाले; हेमचित्राङ्गम् = सोने के चित्रों से सुशोभित; रथघोषेण = रथ की घोष से; नादयन् = नाद करता हुआ।
📖 भावार्थ : तब राक्षसों को वानरों द्वारा मारते देख रावण ने क्रोध धारण किया और अपनी महान सेना को देखने की इच्छा की। मंत्रियों द्वारा हितकर वचन कहे जाने पर भी वह युद्ध के लिए उद्यत हो गया और उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया। वह शीघ्र ही तपे हुए सोने के आभूषणों से युक्त, सोने के चित्रों से सुशोभित ध्वजा वाले रथ पर चढ़ा, जिसकी घोष से तीनों लोक गूंज उठे।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
तं रथस्थं महात्मानं रावणं राक्षसेश्वरम् ।
उपतस्थुर्महावीर्या राक्षसाः क्रोधमूर्च्छिताः ॥
ते रथैर्नागयानैश्च खरोष्ट्रैश्च समन्ततः ।
अन्वयुः परमक्रुद्धा रावणं युद्धदुर्मदम् ॥
📖 भावार्थ : उस रथ पर आरूढ़ महात्मा राक्षसेश्वर रावण के पास महावीर्य राक्षस क्रोध से मूर्च्छित होकर उपस्थित हुए। वे रथों, हाथियों, खच्चरों और ऊँटों पर सवार होकर सब ओर से परम क्रुद्ध होकर युद्ध के मद में चूर रावण के पीछे चले।

🚩 रावण का रथ और सेना (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-२० ॥
रथनेमिस्वनैर्घोरैर्भेरीशङ्खरवैस्तथा ।
दिशः सर्वा विरेजुश्च प्रकम्पितमहीतलाः ॥
तस्य यातस्य संग्रामे राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ।
बभूव तुमुलः शब्दः सागरस्येव पर्वणि ॥
📖 भावार्थ : रथ के नेमि (पहियों) की घोर ध्वनि तथा भेरी और शंख के रव से सभी दिशाएँ गूंज उठीं और पृथ्वी का तल काँप उठा। उस बुद्धिमान राक्षसेन्द्र के संग्राम में जाने पर वैसा ही तुमुल शब्द हुआ जैसा समुद्र के पर्व (अमावस्या या पूर्णिमा) के दिन होता है।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततो वानरसैन्यानि दृष्ट्वा रावणमागतम् ।
व्यथितानि दिशो याता राक्षसं घोरदर्शनम् ॥
कम्पन्ते स्म महाकायाः प्लवगा भीमविक्रमाः ।
दृष्ट्वा रावणमायान्तं मृगाः सिंहमिवागतम् ॥
📖 भावार्थ : तब रावण को आया देखकर वानर सेनाएँ व्यथित होकर दिशाओं को भागने लगीं। महाकाय और भीमविक्रमी वानर भी रावण को आते देखकर काँपने लगे, जैसे मृग सिंह को देखकर काँपते हैं।

🛡️ राम की ओर से स्वागत (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा समीक्ष्य रणपण्डितः ।
उवाच लक्ष्मणं वीरं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
अयं स रावणो दुष्टो युद्धाय समुपस्थितः ।
प्रतियोधयत क्षिप्रं मया सार्धं महारथाः ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा रणपण्डित श्रीराम ने देखा कि रावण युद्ध के लिए आ रहा है, तो वे वीर लक्ष्मण और महाबलशाली सुग्रीव से बोले: "यह वही दुष्ट रावण है जो युद्ध के लिए उपस्थित हुआ है। हे महारथियों, शीघ्र ही मेरे साथ मिलकर इसका सामना करो।"
॥ श्लोक ३३-३८ ॥
एवमुक्त्वा ततः श्रीमान् विष्णुतेजःसमद्युतिः ।
धनुरादाय चाप्यग्र्यं शरांश्चाशीविषोपमान् ॥
अतिष्ठद् गिरिशृङ्गस्थः सिंह इवागतो रणे ।
रावणं प्रति संक्रुद्धो वधाकाङ्क्षी महायशाः ॥
इत्येष त्रिंशः सर्गश्चतुर्थो युद्धकाण्डतः ।
रावणस्य विनिश्चयो रामस्य च महोद्यमः ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर विष्णु के तेज के समान द्युति वाले श्रीराम ने उत्तम धनुष और विषैले सर्पों के समान भयंकर बाण लेकर, पर्वत शिखर पर खड़े होकर, सिंह की भाँति युद्ध में स्थित हुए। वे महायशस्वी रावण के वध की इच्छा से अत्यंत क्रुद्ध हो गए। इस प्रकार यह युद्धकाण्ड का चौंतीसवाँ सर्ग है, जिसमें रावण का निश्चय और राम का महान उद्योग वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रावण का अहंकार

रावण मंत्रियों की सलाह को अनसुना कर स्वयं युद्ध में उतरता है, जो उसके अहंकार और युद्धोन्माद को दर्शाता है।

⚡ राम का साहस

राम बिना किसी भय के रावण का सामना करने को तैयार हो जाते हैं, जो उनके शौर्य और धैर्य का परिचायक है।

🎯 शिक्षा : अहंकार और क्रोध में होकर लिए गए निर्णय विनाशकारी होते हैं। रावण का युद्ध में जाना उसके विनाश की नींव रखता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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