युद्ध काण्ड अध्याय 33

निकुंभ का वध

निकुंभ युद्ध में वानर सेना का संहार करता है, अंततः हनुमान उसे मार गिराते हैं।

विवरण

निकुंभ सेनापति बनकर युद्धभूमि में उतरता है। वह अत्यंत पराक्रम से युद्ध करता है, अनेक वानरों को मार गिराता है। वानर सेना में हाहाकार मच जाता है। तब हनुमान उसका सामना करते हैं। दोनों में घोर युद्ध होता है। निकुंभ मायावी शक्तियों का प्रयोग करता है, परंतु हनुमान अपने बल और भक्ति से उसे परास्त कर देते हैं। अंततः हनुमान निकुंभ का वध कर देते हैं। इससे राक्षस सेना को बड़ा झटका लगता है।

(निकुंभ का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : निकुंभ सेनापति बनकर युद्ध में उतरता है और वानरों का संहार करता है। हनुमान उसका सामना करते हैं और अंततः उसका वध करते हैं।

💢 निकुंभ का आक्रमण (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-८ ॥
निकुम्भः सहसा क्रुद्धो वानरान् समताडयत् ।
गदया भीमरूपया निजघान प्लवंगमान् ॥
ते वानरा भयत्रस्ता निकुम्भभयपीडिताः ।
दुद्रुवुः सर्वतो राजन् न शेकुः स्थातुमग्रतः ॥
🔹 पदच्छेद : निकुम्भः = निकुंभ; सहसा = अचानक; क्रुद्धः = क्रोधित; वानरान् = वानरों को; समताडयत् = मारा; गदया = गदा से; भीमरूपया = भयंकर रूप वाली; निजघान = मार डाला; प्लवंगमान् = वानरों को; ते = वे; वानराः = वानर; भयत्रस्ताः = भय से त्रस्त; निकुम्भभयपीडिताः = निकुंभ के भय से पीड़ित; दुद्रुवुः = भागे; सर्वतः = सब ओर; राजन् = हे राजा; न शेकुः = नहीं कर सके; स्थातुम् = ठहरना; अग्रतः = सामने।
📖 भावार्थ : निकुंभ ने अचानक क्रोधित होकर वानरों को भयंकर गदा से मारना शुरू किया। वे वानर भय से त्रस्त होकर निकुंभ के सामने न ठहर सके और सब ओर भाग गए।
॥ श्लोक ९-१५ ॥
ततो हनूमान् संक्रुद्धो निकुम्भं प्रति धावितः ।
गदां गृहीत्वा वेगेन तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान क्रोधित होकर निकुंभ की ओर दौड़े और गदा उठाकर बोले: "ठहर, ठहर!"

⚡ हनुमान-निकुंभ युद्ध (श्लोक १६-४०)

॥ श्लोक १६-३० ॥
तयोर्युद्धं समभवद् भीमरूपं भयानकम् ।
निकुम्भो मायया युद्धं चकार स महाकपिः ॥
हनूमानपि तेजस्वी मायां तस्य व्यनाशयत् ।
गदया ताडयामास निकुम्भं हृदि दारुणम् ॥
📖 भावार्थ : उन दोनों का युद्ध भीमरूप और भयानक हुआ। निकुंभ ने माया से युद्ध किया, पर तेजस्वी हनुमान ने उसकी माया नष्ट कर दी और गदा से निकुंभ के हृदय पर प्रहार किया।
॥ श्लोक ३१-४० ॥
स पपात हतो भूमौ निकुम्भो राक्षसेश्वरः ।
तस्मिन् हते महावीर्ये राक्षसाः समकम्पयन् ॥
हाहाकारो महानासीत् सैन्येषु राक्षसेशितुः ।
हनूमता हतं दृष्ट्वा निकुम्भं युद्धदुर्मदम् ॥
📖 भावार्थ : वह राक्षसेश्वर निकुंभ मारा गया और भूमि पर गिर पड़ा। उस महावीर्य के मारे जाने पर राक्षस काँप उठे। हनुमान द्वारा उस युद्धदुर्मद निकुंभ को मारा देख राक्षसों की सेना में हाहाकार मच गया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦍 हनुमान का पराक्रम

हनुमान ने एक बार फिर अपनी वीरता का परिचय दिया और एक शक्तिशाली राक्षस का वध किया।

📉 रावण का घटता बल

निकुंभ के वध से रावण के प्रमुख योद्धा समाप्त हो गए, अब उसके पास स्वयं के अतिरिक्त कोई नहीं बचा।

🎯 शिक्षा : अधर्म और अहंकार के पुजारी अंततः नष्ट हो जाते हैं। धर्म की रक्षा करने वाले हनुमान जैसे भक्त सदा विजयी होते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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