कुंभकर्ण वध पर रावण का शोक
कुंभकर्ण के वध का समाचार सुनकर रावण अत्यंत शोकाकुल होता है और अपने भाई के गुणों का स्मरण करता है।
विवरण
कुंभकर्ण के मारे जाने पर रावण मूर्च्छित हो जाता है। होश में आने पर वह विलाप करता है, अपने भाई की वीरता, बल और समर्पण को याद करता है। वह कुंभकर्ण के शरीर के अंगों को देखकर और अधिक दुःखी होता है। रावण कहता है कि कुंभकर्ण के बिना युद्ध जीतना कठिन है। वह विभीषण को कोसता है जो राम के पक्ष में चला गया। अंत में वह युद्ध जारी रखने का निश्चय करता है।
(कुंभकर्ण वध पर रावण का शोक)
🔆 प्रस्तावना : कुंभकर्ण के वध का समाचार सुनते ही रावण शोक से व्याकुल हो उठता है। वह अपने पराक्रमी भाई को याद करता है और विलाप करता है।
😢 रावण का विलाप (श्लोक १-२५)
रावणो मुमुहे राजा शोकेन महता वृतः ॥
स चिरं ध्यानमास्थाय विललाप सुदुःखितः ।
हा वीर हा महाबाहो हा भ्रातः क्व गतोऽसि मे ॥
इदानीं तु हते तस्मिन् किं करोमि क्व गच्छति ॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा राममेव समाश्रितः ।
सर्वं दैवस्य दोषोऽयं कालस्य पर्युपस्थितः ॥
🔪 युद्ध का निश्चय (श्लोक २६-३५)
उत्थाय सहसा क्रुद्धो युद्धायैव मनो दधे ॥
आहूय सेनापतिं च प्रहस्तं वाक्यमब्रवीत् ।
सज्जीकुरु बलं सर्वं युद्धं कर्तास्मि रावणः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
💔 भाईचारा
रावण का कुंभकर्ण के प्रति गहरा स्नेह था, यद्यपि वह अधर्मी था।
🔥 क्रोध और युद्ध
शोक के बावजूद रावण का क्रोध उसे पुनः युद्ध के लिए प्रेरित करता है।
🎯 शिक्षा : शोक में भी धैर्य न खोना चाहिए। परन्तु रावण का क्रोध उसके विनाश का कारण बनता है।