युद्ध काण्ड अध्याय 31

कुंभकर्ण वध पर रावण का शोक

कुंभकर्ण के वध का समाचार सुनकर रावण अत्यंत शोकाकुल होता है और अपने भाई के गुणों का स्मरण करता है।

विवरण

कुंभकर्ण के मारे जाने पर रावण मूर्च्छित हो जाता है। होश में आने पर वह विलाप करता है, अपने भाई की वीरता, बल और समर्पण को याद करता है। वह कुंभकर्ण के शरीर के अंगों को देखकर और अधिक दुःखी होता है। रावण कहता है कि कुंभकर्ण के बिना युद्ध जीतना कठिन है। वह विभीषण को कोसता है जो राम के पक्ष में चला गया। अंत में वह युद्ध जारी रखने का निश्चय करता है।

(कुंभकर्ण वध पर रावण का शोक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : कुंभकर्ण के वध का समाचार सुनते ही रावण शोक से व्याकुल हो उठता है। वह अपने पराक्रमी भाई को याद करता है और विलाप करता है।

😢 रावण का विलाप (श्लोक १-२५)

॥ श्लोक १-१० ॥
ततः श्रुत्वा हतं भ्रातरं कुम्भकर्णं महाबलम् ।
रावणो मुमुहे राजा शोकेन महता वृतः ॥
स चिरं ध्यानमास्थाय विललाप सुदुःखितः ।
हा वीर हा महाबाहो हा भ्रातः क्व गतोऽसि मे ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; श्रुत्वा = सुनकर; हतम् = मारा गया; भ्रातरम् = भाई को; कुम्भकर्णम् = कुंभकर्ण; महाबलम् = महाबली; रावणः = रावण; मुमुहे = मूर्च्छित हो गया; राजा = राजा; शोकेन = शोक से; महता = बहुत अधिक; वृतः = घिरा हुआ; सः = वह; चिरम् = देर तक; ध्यानम् = ध्यान; आस्थाय = धारण कर; विललाप = विलाप किया; सुदुःखितः = अत्यंत दुःखी; हा वीर = हे वीर; हा महाबाहो = हे महाबाहो; हा भ्रातः = हे भाई; क्व गतः = कहाँ चले गए; असि = हो; मे = मेरे।
📖 भावार्थ : तब महाबली भाई कुंभकर्ण के मारे जाने का समाचार सुनकर राजा रावण महान शोक से घिरकर मूर्च्छित हो गया। वह देर तक ध्यान में लीन रहकर अत्यंत दुःखी होकर विलाप करने लगा: "हा वीर! हा महाबाहो! हा मेरे भाई! तू कहाँ चला गया?"
॥ श्लोक ११-२५ ॥
त्वयि जीवति मे भ्रातः कुतो भीः स्यात् कथंचन ।
इदानीं तु हते तस्मिन् किं करोमि क्व गच्छति ॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा राममेव समाश्रितः ।
सर्वं दैवस्य दोषोऽयं कालस्य पर्युपस्थितः ॥
📖 भावार्थ : "हे भाई, तुम्हारे जीवित रहते मुझे किसी प्रकार का भय नहीं था। अब तुम्हारे मारे जाने पर मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? धर्मात्मा विभीषण भी राम की शरण में चला गया। यह सब दैव का दोष है, काल का प्रभाव है।"

🔪 युद्ध का निश्चय (श्लोक २६-३५)

॥ श्लोक २६-३५ ॥
इत्येवं विलपन् राजा कुम्भकर्णं प्रियं वचः ।
उत्थाय सहसा क्रुद्धो युद्धायैव मनो दधे ॥
आहूय सेनापतिं च प्रहस्तं वाक्यमब्रवीत् ।
सज्जीकुरु बलं सर्वं युद्धं कर्तास्मि रावणः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार कुंभकर्ण के लिए प्रिय वचनों से विलाप करते हुए राजा अचानक उठा और क्रोधित होकर युद्ध के लिए मन बना लिया। उसने सेनापति प्रहस्त को बुलाकर कहा: "सारी सेना को सज्ज करो, मैं रावण युद्ध करूँगा।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 भाईचारा

रावण का कुंभकर्ण के प्रति गहरा स्नेह था, यद्यपि वह अधर्मी था।

🔥 क्रोध और युद्ध

शोक के बावजूद रावण का क्रोध उसे पुनः युद्ध के लिए प्रेरित करता है।

🎯 शिक्षा : शोक में भी धैर्य न खोना चाहिए। परन्तु रावण का क्रोध उसके विनाश का कारण बनता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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