कुंभकर्ण का वध
राम इंद्र के दिए हुए ब्रह्मास्त्र से कुंभकर्ण का वध करते हैं। कुंभकर्ण का विशाल शरीर समुद्र में गिरता है।
विवरण
घोर युद्ध के पश्चात राम कुंभकर्ण के पराक्रम से चिंतित हो जाते हैं। वे इंद्र द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र का स्मरण करते हैं और उससे कुंभकर्ण पर प्रहार करते हैं। ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से कुंभकर्ण के मस्तक और शरीर के टुकड़े हो जाते हैं। उसका विशाल शरीर गिरकर समुद्र में ज्वार उत्पन्न करता है। राक्षसों में हाहाकार मच जाता है। यह सर्ग राम की विजय और कुंभकर्ण के अंत का वर्णन करता है।
(कुंभकर्ण का वध)
🔆 प्रस्तावना : राम और कुंभकर्ण के बीच भीषण युद्ध चल रहा है। अब राम इंद्र के ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर कुंभकर्ण का वध करते हैं।
💥 ब्रह्मास्त्र का प्रयोग (श्लोक १-२०)
निहन्तुं क्रोधताम्राक्षः सन्दधे परमास्त्रवित् ॥
ब्रह्मास्त्रं परमं दिव्यं सन्दधे रघुनन्दनः ।
तस्य मन्त्रपुटे ध्यात्वा मुमोच परमात्मने ॥
पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥
तस्य पतत एवाशु शिरांसि त्रीणि भूतले ।
पेतुः सान्द्रं रुधिरमुद्वमन्ति स्म दारुणम् ॥
🌊 कुंभकर्ण का शरीर समुद्र में (श्लोक २१-५२)
सागरः सहसा वेलां समुत्सार्य महास्वनः ॥
तदा प्रभृति चोदधिः कुम्भकर्णहतो यथा ।
न वेलामतिवर्तेत इति लोकोऽनुपश्यति ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🏹 ब्रह्मास्त्र की महिमा
ब्रह्मास्त्र अप्रतिम अस्त्र है, जिसके सामने कोई टिक नहीं सकता। राम ने धर्मयुद्ध में इसका प्रयोग किया।
⚖️ कर्म का नियम
कुंभकर्ण ने अपने कर्मों से यह अंत पाया। उसकी मृत्यु से राक्षस सेना का मनोबल टूट गया।
🎯 शिक्षा : अधर्म का अंत निश्चित है। चाहे शक्तिशाली राक्षस ही क्यों न हो, धर्म की विजय होती है।