रावण द्वारा विभीषण का अपमान

रावण अपनी मंत्रणा सभा में विभीषण की सीता लौटाने की सलाह को अस्वीकार करता है और उनका अपमान करता है। क्रोधित होकर वह विभीषण को निकाल देता है, जिसके बाद विभीषण राम की शरण में चले जाते हैं।

विवरण

लंका दहन के बाद रावण अपने मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श कर रहा था। विभीषण, जो धर्म और नीति के ज्ञाता थे, ने रावण को समझाया कि सीता को राम को लौटा देना ही उचित है। उन्होंने राम की शक्ति, धर्मपरायणता और उनके दैवीय स्वरूप का उल्लेख किया तथा युद्ध के विनाशकारी परिणामों से अवगत कराया। किन्तु रावण ने अहंकार में आकर न केवल विभीषण की सलाह ठुकरा दी, वरन् उन्हें कायर, धोखेबाज और शत्रु का पक्षधर कहकर अपमानित किया। रावण के कठोर वचन सुनकर विभीषण ने लंका त्यागने का निर्णय लिया और अपने चार साथियों के साथ समुद्र पार कर राम के शिविर में जा पहुँचे। इस सर्ग में रावण के अहंकार और विभीषण की बुद्धिमत्ता का स्पष्ट चित्रण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ३

(रावण द्वारा विभीषण का अपमान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ तृतीयः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण की सभा में विभीषण धर्म और नीति की बात करते हैं, किन्तु रावण अहंकार में उनका अपमान कर देता है। यह सर्ग रावण के पतन की शुरुआत और विभीषण के उत्थान का सूचक है।

🏛️ रावण की मंत्रणा सभा (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततः स रावणो राजा सभां सम्पूज्य मन्त्रिणः ।
उवाच परमोद्विग्नो विभीषणमभाषत ॥
किं त्वं मन्यसे विभीषण अस्मिन् वानरसंकटे ।
कथं नः श्रेय एव स्याद् ब्रूहि सत्यं हितं च नः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सः = वह; रावणः = रावण; राजा = राजा; सभाम् = सभा में; सम्पूज्य = सम्मानित करके; मन्त्रिणः = मंत्रियों को; उवाच = बोला; परमोद्विग्नः = अत्यन्त व्याकुल; विभीषणम् = विभीषण से; अभाषत = बोला; किम् = क्या; त्वम् = तुम; मन्यसे = मानते हो; विभीषण = हे विभीषण; अस्मिन् = इस; वानरसंकटे = वानरों के संकट में; कथम् = कैसे; नः = हमारा; श्रेयः = कल्याण; एव = ही; स्यात् = हो; ब्रूहि = कहो; सत्यम् = सत्य; हितम् = हितकर; च = और; नः = हमारे लिए।
📖 भावार्थ : उसके बाद राजा रावण ने सभा में मंत्रियों का सम्मान करके अत्यन्त व्याकुल होकर विभीषण से कहा: "हे विभीषण, तुम इस वानरों के संकट के बारे में क्या सोचते हो? हमारा कल्याण कैसे हो सकता है? हमारे लिए सत्य और हित की बात कहो।"
॥ श्लोक ३-५ ॥
एवमुक्तस्तु रावणेन विभीषणो महामतिः ।
प्रत्युवाच तदा राजन् वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
श्रूयतां राजशार्दूल यन्मे वक्ष्यामि साम्प्रतम् ।
रामेण सह सन्धानं कुरुष्वाक्लिष्टकर्मणा ॥
सीता तस्मै प्रदातव्या मिथ्याचारविवर्जिता ।
एष नः श्रेयसः पन्था युद्धं हि न हितं तव ॥
📖 भावार्थ : रावण के ऐसा कहने पर महामति विभीषण ने, जो वाक्यविशारद थे, राजा से कहा: "हे राजशार्दूल! मैं अब जो कहूँगा उसे सुनिए। अक्लिष्टकर्मा राम के साथ संधि कर लीजिए। मिथ्याचार से रहित सीता को उन्हें लौटा दीजिए। यही हमारे कल्याण का मार्ग है, क्योंकि युद्ध आपके लिए हितकर नहीं है।"

⚔️ विभीषण की सलाह और रावण का क्रोध (श्लोक ६-१५)

॥ श्लोक ६-१० ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।
प्रत्युवाच ससंरम्भं विभीषणमवस्थितम् ॥
धिग् बलं धिग् पराक्रमं धिग् ज्ञानं धिग् विचक्षणम् ।
यस्य मे त्वं हितं वाक्यमेवमाह विनाशनम् ॥
किं त्वं न जानासे वीर्यं मम रामस्य च ध्रुवम् ।
यन्मां सन्धानमिच्छस्त्वं कातर्याद् धर्मसंहितम् ॥
न त्वया सह मे वासो यो मां वेत्सि पराक्रमम् ।
गच्छ त्वं शरणं रामं यदि ते साधु मन्यते ॥
📖 भावार्थ : उनके वचन सुनकर रावण क्रोध से मूर्च्छित हो गया और संरम्भ से वहाँ खड़े विभीषण से बोला: "धिक्कार है तेरे बल को, धिक्कार पराक्रम को, धिक्कार ज्ञान और चातुर्य को, जो तू मुझे ऐसा विनाशकारी हित-वचन कह रहा है। क्या तू मेरे और राम के वीर्य को नहीं जानता, जो तू कायरता से धर्मसंगत संधि चाहता है? मुझे तुझ जैसे कायर के साथ निवास नहीं चाहिए, जो मेरे पराक्रम को नहीं पहचानता। यदि तू चाहे तो राम की शरण में जा।"
॥ श्लोक ११-१५ ॥
एवमुक्तस्तु रावणेन विभीषणो महायशाः ।
न चुकोप महातेजाः प्रत्युवाच च रावणम् ॥
यथेष्टं तव राजेन्द्र वर्तितव्यं न संशयः ।
न त्वहं त्वद्धिताद् अन्यद् वक्तुं शक्तः कथंचन ॥
एवमुक्त्वा समुत्थाय सभायां राक्षसाधिपम् ।
प्रणम्य शिरसा भूमौ जगामाकाशमेव च ॥
📖 भावार्थ : रावण के ऐसा कहने पर महायशस्वी विभीषण क्रोधित नहीं हुए, बल्कि महातेजस्वी होते हुए भी उन्होंने रावण से कहा: "हे राजेन्द्र! तुम जैसा चाहो वैसा करो, इसमें संशय नहीं। परन्तु मैं तुम्हारे हित के अलावा कुछ और कहने में समर्थ नहीं हूँ।" ऐसा कहकर वे सभा में से उठे, राक्षसाधिप को भूमि पर सिर झुकाकर प्रणाम किया और आकाश मार्ग से चले गए।

🕊️ विभीषण का निष्कासन और राम की शरण में जाना (श्लोक १६-३०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततो विभीषणः श्रीमान् चतुर्भिः सह राक्षसैः ।
आकाशेनापतद् वीरो यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥
ते समुद्रं समासाद्य राघवस्य निवेशनम् ।
अवतेरुर्महावीर्या ददृशुश्च महाबलम् ॥
रामं सत्यपराक्रान्तं लक्ष्मणं च महाबलम् ।
अभिगम्य विभीषणस्तु वाक्यमाह स सादरम् ॥
राम राम महाबाहो राक्षसोऽहं समागतः ।
त्वत्सकाशं परित्यक्तो रावणेन दुरात्मना ॥
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि धर्मज्ञ शरणागत ।
रक्ष मां शरणापन्नं भवन्तं शरणं गतम् ॥
📖 भावार्थ : तब श्रीमान् विभीषण चार राक्षसों के साथ आकाश मार्ग से उस स्थान पर गए जहाँ लक्ष्मण सहित राम थे। वे महावीर्य समुद्र को पार कर राघव के निवास स्थान पर उतरे और महाबलशाली राम को देखा। सत्यपराक्रमी राम और महाबली लक्ष्मण के पास जाकर विभीषण ने सादर कहा: "हे राम! हे महाबाहो! मैं राक्षस हूँ और दुरात्मा रावण द्वारा त्याग दिए जाने पर आपकी शरण में आया हूँ। हे धर्मज्ञ! हे शरणागतवत्सल! मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।"
॥ श्लोक २१-३० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामः सौमित्रिणा सह ।
सम्मन्त्र्य मन्त्रिभिः सार्धं प्रत्युवाच विभीषणम् ॥
स्वागतं ते महाभाग ब्रूहि किं करवाणि ते ।
अभयं ते प्रयच्छामि शरणागतवत्सलः ॥
इत्युक्त्वा परिषस्वजे लक्ष्मणश्च महाबलः ।
ततो विभीषणः प्रीतः श्रिया परमया युतः ॥
रामेण सहितः श्रीमान् विभीषणो महायशाः ।
निवासं कल्पयामासु राघवस्यानुशासनात् ॥
इत्येष तृतीयः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
विभीषणपरित्यागो रावणस्य च निश्चयः ॥
📖 भावार्थ : उनके वचन सुनकर राम ने सुग्रीव और मंत्रियों के साथ विचार करके विभीषण से कहा: "हे महाभाग! आपका स्वागत है। बताइए, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? मैं शरणागतवत्सल हूँ, आपको अभय प्रदान करता हूँ।" ऐसा कहकर उन्होंने विभीषण को गले लगाया और लक्ष्मण ने भी। तब विभीषण अत्यन्त प्रसन्न हुए और परम श्री से युक्त हो गए। महायशस्वी विभीषण ने राम के साथ रहकर, उनकी आज्ञा से निवास किया। इस प्रकार यह युद्धकाण्ड का तीसरा रोचक सर्ग है, जिसमें विभीषण का परित्याग और रावण का हठ दिखाया गया है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रावण का अहंकार

रावण का अहंकार उसे विभीषण जैसे हितैषी की बात मानने से रोकता है। वह न केवल सलाह अस्वीकार करता है, बल्कि अपने ही भाई का अपमान करके उसे निकाल देता है। यह अहंकार ही उसके विनाश का कारण बनता है।

💡 विभीषण की बुद्धिमत्ता

विभीषण धर्म और नीति के मार्ग पर चलते हैं। वे रावण के क्रोध के बावजूद अविचलित रहते हैं और राम की शरण में जाकर सही निर्णय लेते हैं। यह उनकी दूरदर्शिता और धर्मनिष्ठा को दर्शाता है।

🧠 राम का शरणागतवत्सल स्वभाव

राम बिना किसी हिचकिचाहट के विभीषण को शरण देते हैं, चाहे वे राक्षस ही क्यों न हों। यह राम के उदार और धर्मनिष्ठ स्वभाव को उजागर करता है।

🌊 आगामी काण्ड की भूमिका

यह सर्ग विभीषण के राम से मिलन का वर्णन करता है, जो आगे चलकर लंका विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विभीषण की सहायता से ही राम को लंका के रहस्यों का पता चलता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और मूर्खता के कारण हितैषियों की बात न मानना विनाश का मार्ग है, जबकि धर्म और बुद्धि का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। विभीषण का राम की शरण में जाना सच्चे धर्म का मार्ग है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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