युद्ध काण्ड अध्याय 29

कुंभकर्ण-राम युद्ध

कुंभकर्ण युद्धभूमि में प्रवेश करता है और वानर सेना का संहार करता है। अंत में राम उससे युद्ध करते हैं।

विवरण

रावण द्वारा जगाए जाने पर महापराक्रमी कुंभकर्ण युद्ध के लिए तैयार होता है। वह लंका से निकलकर वानर सेना पर टूट पड़ता है, हजारों वानरों को मार गिराता है। उसके भीषण पराक्रम से सभी वानर भयभीत हो जाते हैं। तब राम स्वयं कुंभकर्ण का सामना करते हैं। दोनों में घमासान युद्ध होता है, जिसमें राम दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हैं किंतु कुंभकर्ण मायावी शक्तियों से उनका सामना करता है। यह सर्ग कुंभकर्ण के अदम्य साहस और राम के धैर्य को दर्शाता है।

(कुंभकर्ण-राम युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : निद्रा से जागृत कुंभकर्ण भीषण रूप धारण कर युद्धभूमि में आता है। वानर सेना उसे देखकर त्रस्त हो जाती है। राम उसका सामना करते हैं और घोर युद्ध आरंभ होता है।

🏹 कुंभकर्ण का युद्ध-प्रवेश (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः प्रबुद्धो राजेन्द्र कुम्भकर्णो महाबलः ।
निर्ययौ नगरात् तूर्णं रावणेन समाहितः ॥
स ददर्श महात्मानं रामं दशरथात्मजम् ।
वानरैर्बहुभिः सार्धं युद्धाय समुपस्थितम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रबुद्धः = जागा हुआ; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; कुम्भकर्णः = कुंभकर्ण; महाबलः = महाबली; निर्ययौ = निकला; नगरात् = नगर से; तूर्णम् = शीघ्र; रावणेन = रावण द्वारा; समाहितः = प्रेरित; सः = उसने; ददर्श = देखा; महात्मानम् = महात्मा; रामम् = राम को; दशरथात्मजम् = दशरथ पुत्र; वानरैः = वानरों के साथ; बहुभिः = अनेक; सार्धम् = सहित; युद्धाय = युद्ध के लिए; समुपस्थितम् = उपस्थित।
📖 भावार्थ : हे राजेन्द्र! तब महाबली कुंभकर्ण निद्रा से जागकर रावण के कहने पर शीघ्र ही नगर से निकला। उसने महात्मा राम को देखा, जो दशरथपुत्र थे और अनेक वानरों के साथ युद्ध के लिए उपस्थित थे।
॥ श्लोक ६-१५ ॥
कुम्भकर्णो रणे क्रुद्धो वानरान् समताडयत् ।
गिरीन् प्रक्षिप्य वेगेन निजघान प्लवंगमान् ॥
ते भग्ना वानराः सर्वे दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ।
न शेकुः स्थातुमग्रे तु कुम्भकर्णस्य रक्षसः ॥
📖 भावार्थ : कुंभकर्ण युद्ध में क्रोधित होकर वानरों को मारने लगा। उसने वेग से पर्वतों को फेंककर वानरों को मार डाला। वे सभी वानर भग्न होकर सब दिशाओं में भाग गए। वे राक्षस कुंभकर्ण के सामने ठहर न सके।

⚔️ राम-कुंभकर्ण संग्राम (श्लोक १६-४८)

॥ श्लोक १६-३० ॥
ततो रामः महातेजाः कुम्भकर्णं महाबलम् ।
शरैराहत्य सङ्क्रुद्धस्तस्थौ सिंह इवानदत् ॥
कुम्भकर्णोऽपि संक्रुद्धो राघवं प्रति धन्विनम् ।
अभिदुद्राव वेगेन गर्जन् मेघ इवाम्बरे ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने महाबली कुंभकर्ण को बाणों से आहत करते हुए, क्रोधित होकर सिंह के समान गर्जना की। कुंभकर्ण भी क्रोधित होक� राम की ओर वेग से दौड़ा, आकाश में मेघ के समान गर्जना करता हुआ।
॥ श्लोक ३१-४८ ॥
तयोर्युद्धं समभवद् देवासुररणोपमम् ।
रामः शरैः कुम्भकर्णं विव्याध हृदि दारुणैः ॥
कुम्भकर्णो गदां गृह्य राममभ्यद्रवद् बली ।
रामश्चिच्छेद तां गदां शरैः सन्नतपर्वभिः ॥
एवं युद्धं प्रवृत्तं तद् भीमरूपं भयानकम् ।
📖 भावार्थ : उन दोनों का युद्ध देवासुर संग्राम के समान हुआ। राम ने कुंभकर्ण को हृदय में दारुण बाणों से बींधा। कुंभकर्ण ने गदा उठाकर राम पर प्रहार किया, पर राम ने तीक्ष्ण बाणों से उस गदा को काट डाला। इस प्रकार भीमरूप भयानक युद्ध चलता रहा।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👹 कुंभकर्ण का राक्षसी पराक्रम

कुंभकर्ण का युद्ध कौशल और बल अद्वितीय है। वह अकेला ही वानर सेना को तितर-बितर कर देता है।

🛡️ राम का धैर्य

राम शांतिपूर्वक कुंभकर्ण के प्रहारों का सामना करते हैं और अंत में उसे परास्त करने की योजना बनाते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि चाहे शत्रु कितना भी शक्तिशाली हो, धैर्य और नीति से उसका सामना किया जा सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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