कुंभकर्ण का वानरों का संहार
कुंभकर्ण युद्धभूमि में प्रवेश करता है और वानर सेना का भयंकर संहार करता है। वानरवीर उसका सामना करते हैं, परन्तु उसके प्रचण्ड पराक्रम के सामने टिक नहीं पाते।
विवरण
रावण के आदेश पर निद्रा से जागृत कुंभकर्ण युद्धभूमि में आता है। वह अत्यन्त क्रोधित होकर वानर सेना पर टूट पड़ता है। अपने विशाल शरीर और अस्त्र-शस्त्रों से वानरों को चूर-चूर कर देता है। अंगद, नील, हनुमान आदि प्रमुख वानर योद्धा उसे रोकने का प्रयास करते हैं, परन्तु कुंभकर्ण उन्हें परास्त कर देता है। वानर सेना में हाहाकार मच जाता है। यह सर्ग कुंभकर्ण के अदम्य पराक्रम और वानरों के साहस का वर्णन करता है।
(कुंभकर्ण का वानरों का संहार)
🔆 प्रस्तावना : रावण के आदेश से निद्रा से जागृत कुंभकर्ण युद्धभूमि में प्रवेश करता है। वह अत्यन्त क्रोधित होकर वानर सेना पर टूट पड़ता है। उसके प्रचण्ड पराक्रम से वानर सेना में हाहाकार मच जाता है। यह सर्ग कुंभकर्ण के अदम्य पराक्रम और वानरों के साहस का वर्णन करता है।
👹 कुंभकर्ण का रणांगण में पदार्पण (श्लोक १-१०)
गदापाणिर्महाकायो वानरान् हन्तुमुद्यतः ॥
तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे व्यथिता भयविह्वलाः ।
दुद्रुवुः सहसा राजन् दिशः सर्वाः समन्ततः ॥
स तान् द्रवत एवाशु गदया भीमनिस्वनः ।
पोथयामास बहुशः पर्वतानिव वज्रभृत् ॥
पादेनाक्रम्य चान्यांस्तु निर्ममन्थ महाबलः ।
प्राणदन् राक्षसेन्द्रेण मृद्यमानाः प्लवंगमाः ॥
न शेकुर्वानराः स्थातुं त्रस्ताः सिंहस्य गोयुथा ॥
हनूमानङ्गदश्चैव नीलश्चैव महाबलः ।
धृष्टमभ्यद्रवन् युद्धे कुम्भकर्णं महाबलम् ॥
ते शिलापादपान् घोरान् प्रचिक्षिपुररिंदमाः ।
कुम्भकर्णस्य वपुषि सालान्सप्त सहस्रशः ॥
तानि कुम्भकर्णः सर्वाणि विसृज्य कुपितो बली ।
तानभ्यधावत सहसा हस्तिनो यूथपानिव ॥
⚔️ वानर सेना का संहार (श्लोक ११-३०)
अभ्यद्रवत सुग्रीवं वानरेन्द्रं महाबलम् ॥
सुग्रीवोऽपि महातेजा गदां गुर्वीं समुद्यतः ।
जग्राह चिक्षेप च तां कुम्भकर्णस्य मूर्धनि ॥
गदाप्रहाराभिहतो न चचाल ननाद च ।
जग्राह च गदां घोरां कुम्भकर्णो महाबलः ॥
स तया ताडयामास सुग्रीवमुरसि स्थितम् ।
स पपात महावीर्यो वज्राहत इवाचलः ॥
व्यद्रवन्त दिशः सर्वाः कुम्भकर्णभयार्दिताः ॥
कुम्भकर्णस्ततो दिक्षु विचचार महाबलः ।
गदापाणिः प्रगृह्यैव वानरान् निजघान ह ॥
स बाहुभ्यां परिष्वज्य पोथयामास वानरान् ।
पादेन च निराक्रम्य निर्ममन्थ महाबलः ॥
नासिकाभ्यां निनायैकं कर्णाभ्यामपरं तथा ।
कराभ्यां च परिष्वज्य निनाय यमसादनम् ॥
🛡️ अंगद, हनुमान आदि का प्रतिरोध (श्लोक ३१-४७)
कुम्भकर्णस्य चिक्षेप भुवि स्थित्वा महाबलः ॥
सा गदा कुम्भकर्णस्य ललाटे विनिपातिता ।
विनद्य सहसा भूत्वा सहसैवापतद्भुवि ॥
कुम्भकर्णोऽपि संक्रुद्धस्तलेनैव महाबलः ।
जघानाङ्गदमुत्पत्य मुष्टिना च पुनः पुनः ॥
अंगदोऽपि तदाक्रन्दे दृढमुष्टिनिपीडितः ।
रुधिरं वमता वक्त्राद्व्यचरद्व्यथितो भृशम् ॥
ततः कोपाच्च हनुमान् कुम्भकर्णं महाबलः ।
जघान वज्रकल्पेन मुष्टिना च पुनः पुनः ॥
तेन तस्य प्रहारेण स्तम्भितः कुम्भकर्णः ।
ननाद च महानादं वज्राहत इवाचलः ॥
कुम्भकर्णं महाकायं ददर्श समरस्थितम् ॥
दृष्ट्वा च मुदितो राजन् सुग्रीवं च निरीक्ष्य च ।
अब्रवील्लक्ष्मणं वीरं सौमित्रे परवीरहा ॥
अयं स कुम्भकर्णो वै रावणस्यानुजो बली ।
एनं हत्वा रणे पापं रावणं जेष्यते मया ॥
इत्युक्त्वा धनुरादाय विशिखान् सन्धयत्प्रभुः ।
कुम्भकर्णं समुद्दिश्य चिक्षेप परमेषुभिः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👹 कुंभकर्ण का पराक्रम
इस सर्ग में कुंभकर्ण के अदम्य पराक्रम का वर्णन है। वह अकेला ही समस्त वानर सेना को रौंद डालता है। उसके बल और पराक्रम से वानर सेना में भय व्याप्त हो जाता है।
🛡️ वानरवीरों का साहस
भयानक संहार के बावजूद अंगद, हनुमान, सुग्रीव जैसे वीर उसका सामना करते हैं। यह उनके अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है।
⚔️ राम के आगमन की पूर्वपीठिका
अन्त में राम के आगमन का संकेत मिलता है। अगले सर्ग में राम-कुंभकर्ण युद्ध का आरम्भ होगा। यह सर्ग उस भीषण युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
📜 धर्म और अधर्म का संघर्ष
कुंभकर्ण रावण के पक्ष में युद्ध करता है, यद्यपि वह जानता है कि रावण अधर्मी है। फिर भी वह भाई के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करता है। यह धर्म-अधर्म के जटिल प्रश्न को उठाता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भयानक से भयानक परिस्थिति में भी वीर योद्धा डटे रहते हैं और अपने धर्म का पालन करते हैं। वानरों का धैर्य और साहस अनुकरणीय है।