कुंभकर्ण का युद्ध में जाना
रावण द्वारा कुंभकर्ण को जगाने का प्रयास, उसका युद्ध के लिए तैयार होना, और वानर सेना का संहार करने के लिए रणभूमि में प्रवेश।
विवरण
जब रावण की सेना वानरों के सामने कमजोर पड़ने लगती है, तब वह अपने महाबली भाई कुंभकर्ण को जगाने का निश्चय करता है। कुंभकर्ण छह मास की निद्रा में सोया हुआ था। रावण के आदेश पर हजारों राक्षस अनेक प्रकार के नगाढ़े, शंख और वाद्य बजाकर उसे जगाते हैं। जागने पर कुंभकर्ण भोजन की इच्छा से रावण के पास जाता है। रावण उसे युद्ध की विकट स्थिति बताता है और वानरों का संहार करने की प्रेरणा देता है। कुंभकर्ण पहले तो रावण को समझाता है कि यह राम से विरोध का उचित समय नहीं है, किन्तु फिर भी वह भाई के प्रेम और कर्तव्यवश युद्ध में जाने का निश्चय करता है। वह रावण को आश्वस्त करता है कि वह वानरों को मारकर राम को यमलोक पहुँचा देगा। फिर वह महापराक्रमी कुंभकर्ण भयंकर गर्जना करता हुआ रणभूमि की ओर प्रस्थान करता है। उसके पदों से पृथ्वी काँपने लगती है और वानर सेना में हाहाकार मच जाता है। यह सर्ग कुंभकर्ण के भीषण रूप और उसकी युद्ध-प्रतिज्ञा का अद्भुत वर्णन करता है।
(कुंभकर्ण का युद्ध में जाना)
🔆 प्रस्तावना : रावण की सेना जब वानरों से पराजय का सामना कर रही थी, तब रावण ने अपने महाबली भाई कुंभकर्ण को जगाने का निश्चय किया। यह सर्ग उस भीषण युद्ध के दूसरे चरण का प्रारम्भ है, जिसमें कुंभकर्ण का रणांगण में प्रवेश होता है।
🛏️ कुंभकर्ण का जागरण (श्लोक १-१२)
प्रबोधयामासुरथो महाबलम् ॥
मृदङ्गशङ्खप्रणदैश्च वादितैः
प्रबोध्यमानः प्रबुबोध वीर्यवान् ॥
प्रबुद्धमात्रस्तु रणाय दुर्मदः
समुत्पपातासनतः स राक्षसः ।
बुभुक्षितस्त्रासयितुं दिशो दश
विनद्य घोरं रणशौण्डिनां वरः ॥
विनद्य सिंह इव पर्वतात् ।
अभ्यद्रवत् तूर्णतरं स राक्षसो
यतः स्म शेते स्म पुरा प्रबोधितः ॥
स राक्षसेन्द्रं भ्रातरमुपस्थितं
ददर्श कुम्भकर्णो वदतां वरः ।
उवाच चैनं प्रणिपत्य मूर्ध्ना
किमाज्ञापयसि प्रभो ॥
🗣️ रावण-कुंभकर्ण संवाद (श्लोक १३-३२)
उवाच वाक्यं मधुरं हितं च ।
भ्रातः किमर्थं त्वं न युद्धाय यासि
वानरानीकं विनिहन्तुमुग्रम् ॥
वानराः सुबहवः क्रूरकर्माणः
संग्रामे मम सेनां प्रध्वंसयन्ति ।
त्वं हि शूरो बलवान् पराक्रमी
शत्रून् विजित्य यशो मे प्रदेहि ॥
प्रत्युवाच महातेजा वचनं धर्मसंहितम् ॥
राजन् यदि त्वया पूर्वं मन्त्रयित्वा सुहृद्वृतैः ।
न कृतो राघवे यत्नस्तत इदं वैशसं महत् ॥
अद्य त्वहं गमिष्यामि रणाय सह वानरैः ।
निहत्य सर्वान् समरे करिष्ये त्वां सुखोदयम् ॥
🚶 कुंभकर्ण का रणभूमि प्रस्थान (श्लोक ३३-४५)
प्रायात् प्रहृष्टो युद्धाय वानरान् प्रति संयुगे ॥
तस्य निश्वसितेनैव वानराः सहसा दिशः ।
विद्रुता विमुखाः सर्वे हतशेषा भयार्दिताः ॥
तं दृष्ट्वा राक्षसं घोरं महाकायं महाबलम् ।
वानराः सहसा सर्वे पलायनपरायणाः ॥
अब्रवीत् सहसा रामं देवं सत्यपराक्रमम् ॥
एष राम महावीर्यः कुम्भकर्णो महाबलः ।
अभियाति दुराधर्षः सर्वान् नो हन्तुमुद्यतः ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं सुग्रीवस्य महात्मनः ।
प्रत्युवाच महातेजा वानरान् समुपस्थितान् ॥
अद्य पश्यत मद्बाणान् कुम्भकर्णस्य दारुणान् ।
वज्राशनिसमस्पर्शान् प्राणान् हर्तुं महात्मनः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👹 कुंभकर्ण का चरित्र
कुंभकर्ण अत्यन्त बलशाली होते हुए भी धर्मज्ञ और भक्त भाई हैं। वे रावण को उसके अधर्म पर समझाते हैं, तथापि भाई के प्रेम में युद्ध करने जाते हैं।
💥 युद्ध की विकरालता
कुंभकर्ण का रणभूमि में प्रवेश वानर सेना में भय का संचार करता है। यह दर्शाता है कि राम के समक्ष अब सबसे बड़ा योद्धा आ खड़ा हुआ है।
🧠 रावण की दुर्बलता
रावण अपने भाई से सहायता माँगता है, यह उसकी बढ़ती हुई दुर्बलता और आसन्न विनाश का संकेत है।
🌊 आगामी संग्राम की भूमिका
यह सर्ग आगामी भीषण युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करता है, जिसमें कुंभकर्ण और राम का घोर संग्राम होगा।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पराक्रमी होते हुए भी यदि हम अधर्म का साथ देते हैं तो अंततः विनाश निश्चित है। कुंभकर्ण ने रावण के अधर्म को जानते हुए भी उसका साथ दिया, और परिणामतः स्वयं भी मारा गया।