युद्ध काण्ड अध्याय 27

कुंभकर्ण का युद्ध में जाना

रावण द्वारा कुंभकर्ण को जगाने का प्रयास, उसका युद्ध के लिए तैयार होना, और वानर सेना का संहार करने के लिए रणभूमि में प्रवेश।

विवरण

जब रावण की सेना वानरों के सामने कमजोर पड़ने लगती है, तब वह अपने महाबली भाई कुंभकर्ण को जगाने का निश्चय करता है। कुंभकर्ण छह मास की निद्रा में सोया हुआ था। रावण के आदेश पर हजारों राक्षस अनेक प्रकार के नगाढ़े, शंख और वाद्य बजाकर उसे जगाते हैं। जागने पर कुंभकर्ण भोजन की इच्छा से रावण के पास जाता है। रावण उसे युद्ध की विकट स्थिति बताता है और वानरों का संहार करने की प्रेरणा देता है। कुंभकर्ण पहले तो रावण को समझाता है कि यह राम से विरोध का उचित समय नहीं है, किन्तु फिर भी वह भाई के प्रेम और कर्तव्यवश युद्ध में जाने का निश्चय करता है। वह रावण को आश्वस्त करता है कि वह वानरों को मारकर राम को यमलोक पहुँचा देगा। फिर वह महापराक्रमी कुंभकर्ण भयंकर गर्जना करता हुआ रणभूमि की ओर प्रस्थान करता है। उसके पदों से पृथ्वी काँपने लगती है और वानर सेना में हाहाकार मच जाता है। यह सर्ग कुंभकर्ण के भीषण रूप और उसकी युद्ध-प्रतिज्ञा का अद्भुत वर्णन करता है।

(कुंभकर्ण का युद्ध में जाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण की सेना जब वानरों से पराजय का सामना कर रही थी, तब रावण ने अपने महाबली भाई कुंभकर्ण को जगाने का निश्चय किया। यह सर्ग उस भीषण युद्ध के दूसरे चरण का प्रारम्भ है, जिसमें कुंभकर्ण का रणांगण में प्रवेश होता है।

🛏️ कुंभकर्ण का जागरण (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः कुम्भकर्णं शयानं निशाचराः ।
प्रबोधयामासुरथो महाबलम् ॥
मृदङ्गशङ्खप्रणदैश्च वादितैः
प्रबोध्यमानः प्रबुबोध वीर्यवान् ॥
प्रबुद्धमात्रस्तु रणाय दुर्मदः
समुत्पपातासनतः स राक्षसः ।
बुभुक्षितस्त्रासयितुं दिशो दश
विनद्य घोरं रणशौण्डिनां वरः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कुम्भकर्णम् = कुंभकर्ण को; शयानम् = सोते हुए; निशाचराः = राक्षसों ने; प्रबोधयामासुः = जगाया; अथो = तब; महाबलम् = महाबली को; मृदङ्गशङ्खप्रणदैः = मृदंग और शंख की ध्वनियों से; च = तथा; वादितैः = बजाये गये वाद्यों से; प्रबोध्यमानः = जगाया जाता हुआ; प्रबुबोध = जाग उठा; वीर्यवान् = वीर; प्रबुद्धमात्रः = जागते ही; तु = तो; रणाय = युद्ध के लिए; दुर्मदः = उन्मत्त; समुत्पपात = उछल पड़ा; आसनतः = आसन से; सः = वह; राक्षसः = राक्षस; बुभुक्षितः = भूखा हुआ; त्रासयितुम् = भयभीत करने के लिए; दिशः = दिशाओं को; दश = दस; विनद्य = गरजकर; घोरम् = भयंकर; रणशौण्डिनाम् = युद्धशूरों में; वरः = श्रेष्ठ।
📖 भावार्थ : उसके बाद राक्षसों ने महाबली कुंभकर्ण को जगाने का प्रयास किया। मृदंग, शंख और अन्य वाद्यों की भयंकर ध्वनि से जगाया जाता हुआ वह वीर जाग उठा। जागते ही वह उन्मत्त हो युद्ध के लिए आसन से उछल पड़ा। अत्यन्त भूखा होने के कारण उसने दसों दिशाओं को भयभीत करने वाली भीषण गर्जना की।
॥ श्लोक ५-१२ ॥
ततः प्रगृह्यास्थिशिरः करेण स
विनद्य सिंह इव पर्वतात् ।
अभ्यद्रवत् तूर्णतरं स राक्षसो
यतः स्म शेते स्म पुरा प्रबोधितः ॥
स राक्षसेन्द्रं भ्रातरमुपस्थितं
ददर्श कुम्भकर्णो वदतां वरः ।
उवाच चैनं प्रणिपत्य मूर्ध्ना
किमाज्ञापयसि प्रभो ॥
📖 भावार्थ : फिर उसने हाथ में अस्थि (हड्डी) का मुण्ड लेकर पर्वत से सिंह के समान गर्जना करते हुए, जहाँ से जगाया गया था, वहाँ से शीघ्रता से आगे बढ़ा। वह श्रेष्ठ वक्ता कुंभकर्ण अपने भाई राक्षसराज रावण के पास गया और सिर झुकाकर प्रणाम कर बोला: "हे प्रभो! आप क्या आज्ञा देते हैं?"

🗣️ रावण-कुंभकर्ण संवाद (श्लोक १३-३२)

॥ श्लोक १३-२० ॥
ततः कुम्भकर्णं रावणः परिष्वज्य
उवाच वाक्यं मधुरं हितं च ।
भ्रातः किमर्थं त्वं न युद्धाय यासि
वानरानीकं विनिहन्तुमुग्रम् ॥
वानराः सुबहवः क्रूरकर्माणः
संग्रामे मम सेनां प्रध्वंसयन्ति ।
त्वं हि शूरो बलवान् पराक्रमी
शत्रून् विजित्य यशो मे प्रदेहि ॥
📖 भावार्थ : तब रावण ने कुंभकर्ण को आलिंगन करके मधुर एवं हितकारी वचन कहे: "हे भाई! तुम युद्ध के लिए क्यों नहीं जाते? उग्र वानरों की सेना का संहार क्यों नहीं करते? वानर बहुत हैं और क्रूरकर्मा हैं, वे संग्राम में मेरी सेना का संहार कर रहे हैं। तुम शूरवीर, बलवान और पराक्रमी हो, अतः शत्रुओं को जीतकर मुझे यश प्रदान करो।"
॥ श्लोक २१-३२ ॥
कुम्भकर्णस्तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं भ्रातुर्यशस्करम् ।
प्रत्युवाच महातेजा वचनं धर्मसंहितम् ॥
राजन् यदि त्वया पूर्वं मन्त्रयित्वा सुहृद्वृतैः ।
न कृतो राघवे यत्नस्तत इदं वैशसं महत् ॥
अद्य त्वहं गमिष्यामि रणाय सह वानरैः ।
निहत्य सर्वान् समरे करिष्ये त्वां सुखोदयम् ॥
📖 भावार्थ : भाई के यशस्वी वचन सुनकर महातेजस्वी कुंभकर्ण ने धर्मयुक्त वचन कहा: "हे राजन्! यदि पहले तुमने मित्रों सहित मंत्रणा करके राघव के प्रति प्रयत्न नहीं किया, तो यह बड़ा संकट आया है। आज मैं वानरों के साथ युद्ध करने जाऊँगा। उन सबको युद्ध में मारकर तुम्हें सुखी कर दूँगा।"

🚶 कुंभकर्ण का रणभूमि प्रस्थान (श्लोक ३३-४५)

॥ श्लोक ३३-४० ॥
एवमुक्त्वा ततो वीरः कुम्भकर्णो महाबलः ।
प्रायात् प्रहृष्टो युद्धाय वानरान् प्रति संयुगे ॥
तस्य निश्वसितेनैव वानराः सहसा दिशः ।
विद्रुता विमुखाः सर्वे हतशेषा भयार्दिताः ॥
तं दृष्ट्वा राक्षसं घोरं महाकायं महाबलम् ।
वानराः सहसा सर्वे पलायनपरायणाः ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर महाबली वीर कुंभकर्ण प्रसन्न होकर वानरों से युद्ध करने के लिए प्रस्थित हुआ। उसके श्वास भरने मात्र से ही सभी दिशाओं में वानर भयभीत होकर भागने लगे, जो बचे थे वे भी विमुख हो गये। उस घोर, महाकाय, महाबली राक्षस को देखते ही सभी वानर पलायन परायण हो गये।
॥ श्लोक ४१-४५ ॥
ततः सुग्रीवः सम्प्रेक्ष्य कुम्भकर्णं महाबलम् ।
अब्रवीत् सहसा रामं देवं सत्यपराक्रमम् ॥
एष राम महावीर्यः कुम्भकर्णो महाबलः ।
अभियाति दुराधर्षः सर्वान् नो हन्तुमुद्यतः ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं सुग्रीवस्य महात्मनः ।
प्रत्युवाच महातेजा वानरान् समुपस्थितान् ॥
अद्य पश्यत मद्बाणान् कुम्भकर्णस्य दारुणान् ।
वज्राशनिसमस्पर्शान् प्राणान् हर्तुं महात्मनः ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव ने महाबली कुंभकर्ण को देखकर तुरंत सत्यपराक्रमी देव राम से कहा: "हे राम! यह महावीर्य महाबल पराक्रमी कुंभकर्ण दुर्धर्ष है और हम सबको मारने के लिए उद्यत है।" महात्मा राघव ने सुग्रीव का वचन सुनकर उपस्थित वानरों से कहा: "आज तुम लोग मेरे उन दारुण बाणों को देखो, जो वज्राशनि के समान स्पर्श वाले हैं और कुंभकर्ण के प्राण हर लेंगे।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👹 कुंभकर्ण का चरित्र

कुंभकर्ण अत्यन्त बलशाली होते हुए भी धर्मज्ञ और भक्त भाई हैं। वे रावण को उसके अधर्म पर समझाते हैं, तथापि भाई के प्रेम में युद्ध करने जाते हैं।

💥 युद्ध की विकरालता

कुंभकर्ण का रणभूमि में प्रवेश वानर सेना में भय का संचार करता है। यह दर्शाता है कि राम के समक्ष अब सबसे बड़ा योद्धा आ खड़ा हुआ है।

🧠 रावण की दुर्बलता

रावण अपने भाई से सहायता माँगता है, यह उसकी बढ़ती हुई दुर्बलता और आसन्न विनाश का संकेत है।

🌊 आगामी संग्राम की भूमिका

यह सर्ग आगामी भीषण युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करता है, जिसमें कुंभकर्ण और राम का घोर संग्राम होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पराक्रमी होते हुए भी यदि हम अधर्म का साथ देते हैं तो अंततः विनाश निश्चित है। कुंभकर्ण ने रावण के अधर्म को जानते हुए भी उसका साथ दिया, और परिणामतः स्वयं भी मारा गया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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