कुंभकर्ण का रावण से मिलना
रावण द्वारा कुंभकर्ण को जगाने का आदेश, उसका जागरण, भोजन, रावण से भेंट और युद्ध के लिए प्रस्थान। कुंभकर्ण रावण को उसके कर्मों की भर्त्सना करता है किन्तु भाई के प्रेम में युद्ध हेतु तैयार हो जाता है।
विवरण
जब रावण अपनी सेना की पराजय और राम-लक्ष्मण के पराक्रम से चिंतित हो जाता है, तब वह अपने महाबली भाई कुंभकर्ण को स्मरण करता है। कुंभकर्ण छह मास की निद्रा में सोया है। रावण उसे जगाने के लिए अनेक उपाय करता है – हाथी, नगाड़े, मधुर संगीत और सुंदर स्त्रियाँ। अंततः कुंभकर्ण जागता है, भारी मात्रा में भोजन करता है और रावण के पास जाता है। रावण उसे राम और वानरों द्वारा उत्पन्न संकट से अवगत कराता है। कुंभकर्ण पहले रावण को उसके दुष्कर्मों के लिए धिक्कारता है और सीता को लौटाने की सलाह देता है, किन्तु रावण के आग्रह पर वह युद्ध करने का वचन देता है और रणभूमि की ओर प्रस्थान करता है। यह सर्ग कुंभकर्ण के असीम बल एवं भाई के प्रति उसके अटूट प्रेम का सुंदर चित्रण प्रस्तुत करता है।
(कुंभकर्ण का रावण से मिलना)
🔆 प्रस्तावना : रावण की सेना राम एवं वानरों से पराजित हो रही है। अनेक योद्धा मारे जा चुके हैं। तब रावण अपने महाबली भाई कुंभकर्ण को स्मरण करता है, जो छह मास की निद्रा में सोया है। यह सर्ग उस अद्भुत वीर के जागरण और उसके रावण से संवाद का वर्णन करता है।
🛌 कुंभकर्ण का जागरण (श्लोक १-१०)
प्रबोधयेति कुंभकर्णं राक्षसानिदमब्रवीत् ॥
गच्छध्वं त्वरिता दूता हस्तियूथपसंयुताः ।
नानावादित्रघोषैश्च कुंभकर्णं प्रबोधय ॥
ते तु दूता ययुः शीघ्रं कुंभकर्णस्य शासनात् ।
नानागन्धरसैर्भक्ष्यैः संप्रहारैश्च संयुताः ॥
गन्धर्वाप्सरसां घोषैः स्त्रीणां च मधुरस्वनैः ॥
वादित्राणां च निनदैः शङ्खदुन्दुभिनिस्वनैः ।
प्रबुद्धः स महातेजा विह्वलो वानरर्षभः ॥
उत्थाय च महावीर्यो भक्ष्यान् भक्षयते बहून् ।
मेषान् महिषांश्चैव वराहान् रुधिरोक्षितान् ॥
🍖 कुंभकर्ण का भोजन और रावण दरबार में आगमन (श्लोक ११-२०)
प्रहृष्टवदनो राज्ञः समीपं समुपागमत् ॥
तं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रोऽपि समुत्पतितवान् हि सः ।
आलिलिङ्ग च बाहुभ्यां प्रीत्या परमया युतः ॥
उपविष्टस्ततो राजा कुंभकर्णमुवाच ह ।
भ्रातः कुशलमद्य ते कच्चित्स्वप्नेन नन्दन ॥
कुशलं च मम स्वप्नः सर्वमेतदनामयम् ॥
किं त्वामागमनं राजन् किं करोमि तव प्रियम् ।
येन त्वं व्याकुलो दीनो वदनं ते विवर्णवत् ॥
रावणः प्राह दुःखार्तः शृणु भ्रातः महाबल ।
रामेण सुग्रीवसख्य वानरैश्च समागतैः ॥
लङ्का मम पुरी दग्धा हता वीराश्च राक्षसाः ।
तस्य निग्रहणे शक्तो नान्यः पश्यामि राक्षसम् ॥
🗣️ कुंभकर्ण का उपदेश और युद्ध प्रतिज्ञा (श्लोक २१-३५)
नूनं त्वया महत् पापं कृतं राक्षसपुङ्गव ॥
यस्य ते राघवो राजन् समरे नोपतिष्ठति ।
वैदेही हरणं चैव कथं त्वं कर्तुमर्हसि ॥
तस्याद्य रामस्य वधं करिष्ये सहलक्ष्मणम् ।
सुग्रीवं च सहामात्यं वानरांश्च समागतान् ॥
यदि त्वं मत्प्रियं कुर्याः सीतां त्वं प्रतिदापय ।
अथवा राघवः श्रीमान् मया सह युयुत्सते ॥
प्रणम्य शिरसा भ्रातुः प्रययौ राक्षसेश्वरः ॥
ततो युद्धाय संनद्धः कुंभकर्णो महाबलः ।
निर्ययौ नगरात्तूर्णं वानरान् प्रति संयुगे ॥
तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ।
हनूमांस्तु महातेजा न चचाल च वीर्यवान् ॥
इत्येष षड्विंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
कुंभकर्णस्य संवादं रावणस्य च वर्णितम् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 कुंभकर्ण का आदर्श चरित्र
कुंभकर्ण अद्भुत बलशाली होते हुए भी धर्मज्ञ है। वह रावण के कुकर्मों की निन्दा करता है, फिर भी भाई के प्रति प्रेम और कर्तव्यवश युद्ध में जाता है। यह उसकी महानता को दर्शाता है।
💡 रावण का हठ और विनाश
रावण के पास कुंभकर्ण जैसा धर्मज्ञ भाई है, पर वह उसकी सलाह नहीं मानता। यह उसके अहंकार और दुराग्रह को दिखाता है, जो उसके विनाश का कारण बनता है।
🧠 कुंभकर्ण का उपदेश
कुंभकर्ण ने रावण को सीता लौटाने का परामर्श दिया, जो नीति और धर्म के अनुकूल था। उसके वचन आज भी राजनीति और नैतिकता के लिए प्रासंगिक हैं।
⚔️ युद्ध की भीषणता की पूर्वपीठिका
यह सर्ग आगामी कुंभकर्ण-राम युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करता है, जिसमें कुंभकर्ण अपनी अदम्य वीरता का परिचय देगा और अंततः मारा जाएगा।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा वीर वही है जो धर्म को जानते हुए भी कर्तव्यपालन हेतु अपने प्राणों की बाजी लगा दे। कुंभकर्ण का बलिदान अमर है।