कुंभकर्ण का जागरण
रावण अपनी सेना की दुर्दशा देखकर अपने महाबली भाई कुंभकर्ण को जगाने का निर्णय लेता है। राक्षस अनेक प्रकार से कुंभकर्ण को जगाने का प्रयास करते हैं - नगाड़ों, हाथियों और मांस के ढेरों से। अंततः कुंभकर्ण जागता है, भोजन करता है और रावण से मिलकर युद्ध का संकल्प लेता है।
विवरण
जब रावण देखता है कि उसकी सेना वानरों के हाथों पराजित हो रही है और उसके महारथी क्रमशः मारे जा रहे हैं, तब वह अपने अजेय भाई कुंभकर्ण को स्मरण करता है। कुंभकर्ण ब्रह्मा के वरदान के कारण वर्षों तक सोता है। रावण उसे जगाने का आदेश देता है। राक्षसगण कुंभकर्ण के विशाल शरीर पर सुगंधित द्रव्य छिड़कते हैं, मांस-मदिरा का ढेर लगाते हैं, और नगाड़ों तथा शंखों की गगनभेदी ध्वनि करते हैं। हाथियों के झुंड उसे रौंदते हैं, किन्तु वह नहीं जागता। अंत में अत्यधिक कोलाहल से कुंभकर्ण की निद्रा टूटती है। वह जागकर भोजन करता है और फिर रावण के पास जाता है। रावण उसे राम-लक्ष्मण और वानरों द्वारा लंका में उत्पात का वृत्तांत सुनाता है। कुंभकर्ण भाई को धैर्य देता है और राम का संहार करने का प्रण करता है। यह सर्ग कुंभकर्ण के महान व्यक्तित्व और उसके अदम्य साहस का परिचय देता है।
(कुंभकर्ण का जागरण)
🔆 प्रस्तावना : रावण की सेना जब वानरों के हाथों परास्त होने लगी, तब उसने अपने पराक्रमी भ्राता कुंभकर्ण को स्मरण किया। कुंभकर्ण ब्रह्मा के वरदान से वर्षों तक अचेत रहता है। यह सर्ग उसके जागरण की अद्भुत कथा प्रस्तुत करता है।
🥁 कुंभकर्ण को जगाने के प्रयास (श्लोक १-१८)
प्रबोधयत कुम्भकर्णं युद्धाय समुपस्थितम् ॥
तच्छ्रुत्वा राक्षसाः सर्वे जग्मुः कुम्भकर्णं प्रति ।
तं ददृशुर्महाकायं निद्रामुदितमच्युतम् ॥
गजेन्द्रैर्महिषीभिश्च खरैरुष्ट्रैश्च सर्वशः ।
आकीर्णं पतितैश्चान्यैः पादपैरिव पर्वतम् ॥
नानावादित्रघोषैश्च प्रबोधयितुमारभन् ॥
शतशश्च महाभेरीः प्रवादयितुमारभन् ।
वादित्राणि च दिव्यानि शंखकाहलकानि च ॥
गजाः कुम्भकर्णं त्रस्ता मृद्गन्ति स्म पदे पदे ।
न चैनं प्रतिबोधन्ते सुप्तं मदविवर्जितम् ॥
उपाहरन्त राक्षस्यः सुरां च बहुलासवाम् ॥
घ्रात्वा तु मांसगन्धं स क्षुधाविष्टो विनिःश्वसन् ।
प्रबुद्धः सहसा निद्रां ममर्द बलिनां वरः ॥
🍖 कुंभकर्ण का जागरण और भोजन (श्लोक १९-३२)
पपौ सुरां च विपुलां पुनः पुनरवर्तयत् ॥
तृप्तः सम्पूर्णकामस्तु विजहार यथासुखम् ।
ततः स रावणं द्रष्टुं प्रायात् परमसंवृतः ॥
रावणोऽपि तमायान्तं दृष्ट्वा हर्षसमन्वितः ।
उवाच परमप्रीतः स्वागतं ते महाबल ॥
🗣️ कुंभकर्ण-रावण संवाद (श्लोक ३३-४८)
किमर्थं मां समाहूय शयानं जागरित्वना ॥
किं कार्यं किं प्रयोजनं ब्रूहि राजन् महामते ।
करिष्ये सर्वमेवाहं शत्रूणां निग्रहं प्रति ॥
रावणः प्राह दुर्धर्ष रामो नाम महाबलः ।
सीतां हृत्वा वने दुष्टो लङ्कां यातो जनार्दनः ॥
तस्य साह्यं कपीन्द्राश्च बहवः समुपस्थिताः ।
ते नः सैन्यं विनिघ्नन्ति वानराः कामरूपिणः ॥
त्वदृते नास्ति मे शक्तिः समरे तान् निवारितुम् ।
तस्मात् त्वं समरे युध्य स्वसृजां भयनाशन ॥
प्रहस्य सुमहानादः प्रत्युवाच महाबलः ॥
नैषा कार्या मतिस्तात रामेण सह विग्रहे ।
यत्तु कार्यं त्वया राजन् भुक्तं फलमिदं तव ॥
अहं तु राममासाद्य सगणं सहलक्ष्मणम् ।
नयामि यमसाद्य त्वं पश्य मे विक्रमं युधि ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ वीरः कुम्भकर्णो महाबलः ।
यत्र रामः सह भ्रात्रा वानरैश्च समागतः ॥
⚔️ युद्ध का संकल्प (श्लोक ४९-५८)
वानरैः सह संग्रामे भीमरूपं भयानकम् ॥
स वानरान् विनिघ्नन्तं द्रुमैः पर्वतसानुभिः ।
न शेकुः प्रतिसंयोद्धुं वानराः क्षतविक्षताः ॥
रामस्तु तद्बलं दृष्ट्वा कुम्भकर्णेन पीडितम् ।
स्वयमेवाभवद् योद्धुं संनद्धो रणमूर्धनि ॥
इत्येष पञ्चविंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
कुम्भकर्णस्य जाग्रत्यै रावणस्य च निश्चयः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
😴 कुंभकर्ण की निद्रा
कुंभकर्ण की लम्बी निद्रा ब्रह्मा के वरदान का परिणाम है। यह सांकेतिक रूप से अज्ञान और प्रमाद का प्रतीक भी है। उसे जगाने के लिए अत्यधिक प्रयास करने पड़ते हैं।
🤝 भ्रातृ-प्रेम
रावण संकट में भाई को याद करता है और कुंभकर्ण बिना किसी हिचक के युद्ध के लिए तैयार हो जाता है, भले ही वह जानता हो कि रावण का मार्ग उचित नहीं है।
🍖 भोजन-प्रियता
कुंभकर्ण का अत्यधिक भोजन उसके विशाल शरीर और राक्षसी प्रवृत्ति को दर्शाता है। यह प्रसंग हास्य और वीभत्स रस का सृजन करता है।
⚔️ युद्ध-कौशल
कुंभकर्ण युद्ध में अद्वितीय है, और उसका संहार आगे चलकर राम के हाथों होगा। यह सर्ग उसके पराक्रम की भूमिका प्रस्तुत करता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि समय पर सही निर्णय न लेने का परिणाम भुगतना पड़ता है। रावण ने पहले कुंभकर्ण को नहीं जगाया और अब जागृत होने पर भी कुंभकर्ण का वध निश्चित है।