युद्ध काण्ड अध्याय 25

कुंभकर्ण का जागरण

रावण अपनी सेना की दुर्दशा देखकर अपने महाबली भाई कुंभकर्ण को जगाने का निर्णय लेता है। राक्षस अनेक प्रकार से कुंभकर्ण को जगाने का प्रयास करते हैं - नगाड़ों, हाथियों और मांस के ढेरों से। अंततः कुंभकर्ण जागता है, भोजन करता है और रावण से मिलकर युद्ध का संकल्प लेता है।

विवरण

जब रावण देखता है कि उसकी सेना वानरों के हाथों पराजित हो रही है और उसके महारथी क्रमशः मारे जा रहे हैं, तब वह अपने अजेय भाई कुंभकर्ण को स्मरण करता है। कुंभकर्ण ब्रह्मा के वरदान के कारण वर्षों तक सोता है। रावण उसे जगाने का आदेश देता है। राक्षसगण कुंभकर्ण के विशाल शरीर पर सुगंधित द्रव्य छिड़कते हैं, मांस-मदिरा का ढेर लगाते हैं, और नगाड़ों तथा शंखों की गगनभेदी ध्वनि करते हैं। हाथियों के झुंड उसे रौंदते हैं, किन्तु वह नहीं जागता। अंत में अत्यधिक कोलाहल से कुंभकर्ण की निद्रा टूटती है। वह जागकर भोजन करता है और फिर रावण के पास जाता है। रावण उसे राम-लक्ष्मण और वानरों द्वारा लंका में उत्पात का वृत्तांत सुनाता है। कुंभकर्ण भाई को धैर्य देता है और राम का संहार करने का प्रण करता है। यह सर्ग कुंभकर्ण के महान व्यक्तित्व और उसके अदम्य साहस का परिचय देता है।

(कुंभकर्ण का जागरण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण की सेना जब वानरों के हाथों परास्त होने लगी, तब उसने अपने पराक्रमी भ्राता कुंभकर्ण को स्मरण किया। कुंभकर्ण ब्रह्मा के वरदान से वर्षों तक अचेत रहता है। यह सर्ग उसके जागरण की अद्भुत कथा प्रस्तुत करता है।

🥁 कुंभकर्ण को जगाने के प्रयास (श्लोक १-१८)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः कुम्भकर्णं द्रष्टुं रावणो वाक्यमब्रवीत् ।
प्रबोधयत कुम्भकर्णं युद्धाय समुपस्थितम् ॥
तच्छ्रुत्वा राक्षसाः सर्वे जग्मुः कुम्भकर्णं प्रति ।
तं ददृशुर्महाकायं निद्रामुदितमच्युतम् ॥
गजेन्द्रैर्महिषीभिश्च खरैरुष्ट्रैश्च सर्वशः ।
आकीर्णं पतितैश्चान्यैः पादपैरिव पर्वतम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कुम्भकर्णम् = कुंभकर्ण को; द्रष्टुम् = देखने के लिए; रावणः = रावण; वाक्यम् = वचन; अब्रवीत् = बोला; प्रबोधयत = जगाओ; कुम्भकर्णम् = कुंभकर्ण को; युद्धाय = युद्ध के लिए; समुपस्थितम् = तैयार; तत् = वह; श्रुत्वा = सुनकर; राक्षसाः = राक्षस; सर्वे = सब; जग्मुः = गए; कुम्भकर्णम् = कुंभकर्ण के पास; प्रति = पास; तम् = उसे; ददृशुः = देखा; महाकायम् = विशाल शरीर वाले; निद्रामुदितम् = निद्रा से मुक्त (यहाँ अर्थ सोते हुए); अच्युतम् = अचल; गजेन्द्रैः = श्रेष्ठ हाथियों से; महिषीभिः = भैंसों से; च = और; खरैः = गधों से; उष्ट्रैः = ऊँटों से; च = तथा; सर्वशः = सब ओर से; आकीर्णम् = व्याप्त; पतितैः = गिरे हुए; च = और; अन्यैः = अन्य; पादपैः = वृक्षों से; इव = जैसे; पर्वतम् = पर्वत।
📖 भावार्थ : तब रावण ने कुंभकर्ण को देखने के लिए कहा: "कुंभकर्ण को जगाओ, युद्ध उपस्थित है।" यह सुनकर सभी राक्षस कुंभकर्ण के पास गए। उन्होंने उस विशालकाय को सोते देखा, जैसे कोई पर्वत गिरे हुए वृक्षों से घिरा हो – वहाँ हाथी, भैंसे, गधे, ऊँट और अन्य पशु गिरे पड़े थे।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे मांसशोणितभोजनाः ।
नानावादित्रघोषैश्च प्रबोधयितुमारभन् ॥
शतशश्च महाभेरीः प्रवादयितुमारभन् ।
वादित्राणि च दिव्यानि शंखकाहलकानि च ॥
गजाः कुम्भकर्णं त्रस्ता मृद्गन्ति स्म पदे पदे ।
न चैनं प्रतिबोधन्ते सुप्तं मदविवर्जितम् ॥
📖 भावार्थ : तब वे मांस-रुधिर भोजी राक्षस अनेक प्रकार के वाद्यों की ध्वनि से उसे जगाने लगे। सैकड़ों महानगाड़े बजाए गए, दिव्य वाद्य, शंख और काहल बजाए गए। भयभीत हाथी पद-पद पर कुंभकर्ण को रौंदते थे, पर वह मदहीन सोया रहा, उसे जगा न सके।
॥ श्लोक १३-१८ ॥
ततः प्रभूतमांसानि गोमहिष्याजवानि च ।
उपाहरन्त राक्षस्यः सुरां च बहुलासवाम् ॥
घ्रात्वा तु मांसगन्धं स क्षुधाविष्टो विनिःश्वसन् ।
प्रबुद्धः सहसा निद्रां ममर्द बलिनां वरः ॥
📖 भावार्थ : तब राक्षसियाँ बहुत सा मांस (गाय, भैंस, बकरी आदि का) और मदिरा ले आईं। मांस की गंध पाकर वह क्षुधा से व्याकुल होकर जोर से श्वास लेने लगा और सहसा निद्रा से जाग उठा – वह बलियों में श्रेष्ठ कुंभकर्ण।

🍖 कुंभकर्ण का जागरण और भोजन (श्लोक १९-३२)

॥ श्लोक १९-२५ ॥
स तानि मांसराशींश्च बुभुजे राक्षसेश्वरः ।
पपौ सुरां च विपुलां पुनः पुनरवर्तयत् ॥
तृप्तः सम्पूर्णकामस्तु विजहार यथासुखम् ।
ततः स रावणं द्रष्टुं प्रायात् परमसंवृतः ॥
रावणोऽपि तमायान्तं दृष्ट्वा हर्षसमन्वितः ।
उवाच परमप्रीतः स्वागतं ते महाबल ॥
📖 भावार्थ : उस राक्षसेश्वर ने मांस के ढेर खाए, विशाल मात्रा में मदिरा पी, और बार-बार पीता रहा। तृप्त और सभी कामनाओं से पूर्ण होकर वह यथासुख विहार करने लगा। फिर वह रावण से मिलने गया, अत्यन्त आवृत (आभूषणों से सज्जित) होकर। रावण भी उसे आता देख हर्षित हुआ और बोला: "महाबल! तुम्हारा स्वागत है।"

🗣️ कुंभकर्ण-रावण संवाद (श्लोक ३३-४८)

॥ श्लोक ३३-४० ॥
कुम्भकर्णस्तु तेजस्वी रावणं प्रत्यभाषत ।
किमर्थं मां समाहूय शयानं जागरित्वना ॥
किं कार्यं किं प्रयोजनं ब्रूहि राजन् महामते ।
करिष्ये सर्वमेवाहं शत्रूणां निग्रहं प्रति ॥
रावणः प्राह दुर्धर्ष रामो नाम महाबलः ।
सीतां हृत्वा वने दुष्टो लङ्कां यातो जनार्दनः ॥
तस्य साह्यं कपीन्द्राश्च बहवः समुपस्थिताः ।
ते नः सैन्यं विनिघ्नन्ति वानराः कामरूपिणः ॥
त्वदृते नास्ति मे शक्तिः समरे तान् निवारितुम् ।
तस्मात् त्वं समरे युध्य स्वसृजां भयनाशन ॥
📖 भावार्थ : तेजस्वी कुंभकर्ण ने रावण से कहा: "हे राजन्! मुझे सोते हुए जगाकर क्यों बुलाया? क्या कार्य है, क्या प्रयोजन? महामते! बताइए। मैं शत्रुओं के निग्रह के लिए सब कुछ करूँगा।" रावण बोला: "दुर्धर्ष! राम नाम का महाबली है। उस दुष्ट ने वन में सीता का हरण कर लिया और लंका में लाया। उसकी सहायता के लिए अनेक वानरेन्द्र आए हैं। वे कामरूपी वानर हमारी सेना का संहार कर रहे हैं। तुम्हारे बिना मैं उन्हें रोकने में असमर्थ हूँ। अतः तुम युद्ध में संलग्न होकर हमारे कुल के भय का नाश करो।"
॥ श्लोक ४१-४८ ॥
कुम्भकर्णस्तु तच्छ्रुत्वा रावणस्य वचः शुभम् ।
प्रहस्य सुमहानादः प्रत्युवाच महाबलः ॥
नैषा कार्या मतिस्तात रामेण सह विग्रहे ।
यत्तु कार्यं त्वया राजन् भुक्तं फलमिदं तव ॥
अहं तु राममासाद्य सगणं सहलक्ष्मणम् ।
नयामि यमसाद्य त्वं पश्य मे विक्रमं युधि ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ वीरः कुम्भकर्णो महाबलः ।
यत्र रामः सह भ्रात्रा वानरैश्च समागतः ॥
📖 भावार्थ : कुंभकर्ण ने रावण के उत्तम वचन सुनकर, महानाद करके हँसते हुए उत्तर दिया: "हे तात! राम के साथ विग्रह करने की यह बुद्धि ठीक नहीं है। हे राजन्! जो कर्तव्य था वह तुमने किया, अब इसका फल तुम भोगो। मैं राम, लक्ष्मण और वानरों को यमलोक पहुँचा दूँगा। तुम युद्ध में मेरा पराक्रम देखो।" ऐसा कहकर महाबली वीर कुंभकर्ण उधर गया जिधर राम अपने भाई और वानरों के साथ थे।

⚔️ युद्ध का संकल्प (श्लोक ४९-५८)

॥ श्लोक ४९-५८ ॥
ततः प्रववृते युद्धं कुम्भकर्णस्य रक्षसः ।
वानरैः सह संग्रामे भीमरूपं भयानकम् ॥
स वानरान् विनिघ्नन्तं द्रुमैः पर्वतसानुभिः ।
न शेकुः प्रतिसंयोद्धुं वानराः क्षतविक्षताः ॥
रामस्तु तद्बलं दृष्ट्वा कुम्भकर्णेन पीडितम् ।
स्वयमेवाभवद् योद्धुं संनद्धो रणमूर्धनि ॥
इत्येष पञ्चविंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
कुम्भकर्णस्य जाग्रत्यै रावणस्य च निश्चयः ॥
📖 भावार्थ : तब उस राक्षस कुंभकर्ण का वानरों के साथ भीमरूपी, भयानक युद्ध प्रारम्भ हुआ। वृक्षों और पर्वतों से प्रहार करते हुए कुंभकर्ण ने वानरों को मारना शुरू किया। घायल हुए वानर उसके सामने टिक न सके। राम ने कुंभकर्ण से पीड़ित उस बल को देखकर स्वयं युद्ध के लिए संनद्ध हो गए। इस प्रकार यह युद्धकाण्ड का पच्चीसवाँ रोचक सर्ग है, जिसमें कुंभकर्ण का जागरण और रावण का निश्चय वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😴 कुंभकर्ण की निद्रा

कुंभकर्ण की लम्बी निद्रा ब्रह्मा के वरदान का परिणाम है। यह सांकेतिक रूप से अज्ञान और प्रमाद का प्रतीक भी है। उसे जगाने के लिए अत्यधिक प्रयास करने पड़ते हैं।

🤝 भ्रातृ-प्रेम

रावण संकट में भाई को याद करता है और कुंभकर्ण बिना किसी हिचक के युद्ध के लिए तैयार हो जाता है, भले ही वह जानता हो कि रावण का मार्ग उचित नहीं है।

🍖 भोजन-प्रियता

कुंभकर्ण का अत्यधिक भोजन उसके विशाल शरीर और राक्षसी प्रवृत्ति को दर्शाता है। यह प्रसंग हास्य और वीभत्स रस का सृजन करता है।

⚔️ युद्ध-कौशल

कुंभकर्ण युद्ध में अद्वितीय है, और उसका संहार आगे चलकर राम के हाथों होगा। यह सर्ग उसके पराक्रम की भूमिका प्रस्तुत करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि समय पर सही निर्णय न लेने का परिणाम भुगतना पड़ता है। रावण ने पहले कुंभकर्ण को नहीं जगाया और अब जागृत होने पर भी कुंभकर्ण का वध निश्चित है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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