युद्ध काण्ड अध्याय 24

रावण को मारने से राम का मना करना

युद्ध के दौरान जब रावण का रथ नष्ट हो जाता है और वह अकेला खड़ा होता है, तब राम उसे युद्ध के नियमों का पालन करते हुए जाने और अगले दिन लौटने को कहते हैं।

विवरण

राम-रावण युद्ध अपने चरम पर है। रावण अपने रथ पर आरूढ़ होकर अद्भुत पराक्रम दिखा रहा है। तभी राम दिव्य बाणों की वर्षा करते हैं और रावण के रथ को चूर-चूर कर देते हैं—घोड़े मारे जाते हैं, सारथि गिर जाता है, ध्वज टूट जाता है। रावण खड्ग और ढाल लेकर भूमि पर खड़ा हो जाता है, मानो प्रज्वलित अग्नि हो। उस समय राम के पास उसे मारने का सुनहरा अवसर होता है, किंतु वे युद्ध के धर्म को स्मरण रखते हैं। मातलि (इंद्र के सारथि) के अनुरोध पर भी राम रावण को मारने से मना कर देते हैं। वे रावण से कहते हैं, “तुम थके हुए हो, तुम्हारा रथ नष्ट हो चुका है, इसलिए जाओ, विश्राम करो और कल पुनः युद्ध के लिए लौट आओ।” रावण आश्चर्यचकित होकर लंका लौट जाता है। यह घटना राम के धर्मपरायण चरित्र और युद्ध-नीति के प्रति उनकी अडिग निष्ठा को उजागर करती है।

(रावण को मारने से राम का मना करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्विंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम-रावण युद्ध घोर रूप धारण कर चुका है। रावण अपने रथ पर आरूढ़ होकर अनेकों अस्त्र-शस्त्र चलाता है। राम भी दिव्यास्त्रों से उसका मुकाबला करते हैं। सहसा राम के बाणों से रावण का रथ चूर्ण हो जाता है। अब रावण खड्ग-ढाल लिए भूमि पर खड़ा है। राम के सामने उसे मारने का सुअवसर है, किंतु वे युद्ध के मर्यादा का पालन करते हुए उसे जीवनदान दे देते हैं।

🚩 रावण के रथ का वध (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः रावण आक्रन्द्य रथेनादित्यतेजसा ।
रामं योधयते क्रुद्धो दिव्यैरस्त्रैः सहस्रशः ॥
रामस्तु राक्षसेन्द्रस्य रथं दिव्यं महाबलः ।
शरैः सन्नतपर्वभिश्चकार चूर्णितं रणे ॥
हता हयाश्छिन्नरश्मिश्छिन्नध्वजपताकिनः ।
सारथिश्च हतो भूमौ रथो नष्टः समन्ततः ॥
अथ विरथः संग्रामे रावणः खड्गचर्मधृक् ।
अवतस्थे महीपृष्ठे प्रदीप्त इव पावकः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रावणः = रावण; आक्रन्द्य = गर्जना करके; रथेन = रथ द्वारा; आदित्यतेजसा = सूर्य के समान तेजस्वी; रामम् = राम को; योधयते = युद्ध करता है; क्रुद्धः = क्रोधित होकर; दिव्यैः = दिव्य; अस्त्रैः = अस्त्रों से; सहस्रशः = हजारों प्रकार से; रामः = राम; तु = और; राक्षसेन्द्रस्य = राक्षसराज के; रथम् = रथ को; दिव्यम् = दिव्य; महाबलः = महान बलशाली; शरैः = बाणों से; सन्नतपर्वभिः = सुन्दर पर्वों वाले; चकार = कर दिया; चूर्णितम् = चूर-चूर; रणे = युद्ध में; हताः = मारे गए; हयाः = घोड़े; छिन्नरश्मिः = टूटी हुई लगाम वाले; छिन्नध्वजपताकिनः = टूटे हुए ध्वज और पताका वाले; सारथिः = सारथि; च = भी; हतः = मारा गया; भूमौ = भूमि पर; रथः = रथ; नष्टः = नष्ट हो गया; समन्ततः = चारों ओर से; अथ = तब; विरथः = बिना रथ के; संग्रामे = युद्ध में; रावणः = रावण; खड्गचर्मधृक् = तलवार और ढाल धारण किए हुए; अवतस्थे = खड़ा हो गया; महीपृष्ठे = धरती की सतह पर; प्रदीप्तः = प्रज्वलित; इव = जैसे; पावकः = अग्नि।
📖 भावार्थ : तब रावण सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर सवार होकर क्रोधपूर्वक राम पर हजारों दिव्य अस्त्रों से प्रहार करने लगा। महाबली राम ने भी अपने सुंदर पर्वों वाले बाणों से राक्षसराज के उस दिव्य रथ को युद्ध में चूर-चूर कर दिया। घोड़े मारे गए, लगाम टूट गई, ध्वज और पताकाएँ धराशायी हो गईं, सारथि भी धरती पर मारा गया और रथ सब ओर से नष्ट हो गया। तब रथहीन रावण तलवार और ढाल लेकर धरती पर खड़ा हो गया, मानो प्रज्वलित अग्नि हो।
॥ श्लोक ५-१० ॥
तं दृष्ट्वा विरथं रामो मातलिं प्रत्यभाषत ।
अयमेको रणे रावणो निःशस्त्र इव लक्ष्यते ॥
किं कर्तव्यमतः परं ब्रूहि सारथे मम ।
न हि शक्नोमि संग्रामे शस्त्रं त्यक्तुमकिञ्चनम् ॥
मातलिर्वचनं श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञो धर्मयुक्तं वचस्तदा ॥
अयं स दुष्टो रक्षोऽधिपो बहुशः पापकारकः ।
हन्तव्यस्ते महाबाहो नैनं जातु विमोक्षयेत् ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं मातलेः सत्यवादिनः ।
उवाच परमोदारो धर्मं पुरस्कृतं कुरु ॥
📖 भावार्थ : उसे रथहीन देखकर राम ने मातलि से कहा, “यह रावण युद्ध में अकेला और निःशस्त्र-सा दिख रहा है। हे मेरे सारथे, अब आगे क्या करना चाहिए? मैं युद्ध में किसी अकिंचन (निःशस्त्र) व्यक्ति पर शस्त्र नहीं छोड़ सकता।” मातलि ने राम के उस क्लेशरहित कर्म वाले वचन को सुनकर महाप्राज्ञ होकर धर्मयुक्त उत्तर दिया, “यह वही दुष्ट राक्षसराज है जिसने बहुत पाप किए हैं। हे महाबाहो, इसका वध करना चाहिए, इसे कभी मत छोड़ो।” सत्यवादी मातलि के उन वचनों को सुनकर परमोदार राम ने कहा, “धर्म को ही आगे रखो।”

⚡ राम का रावण को सम्बोधन (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
ततः रामो महातेजाः रावणं प्रति अब्रवीत् ।
गच्छ राजन् क्षणं तावत् स्वस्थो युद्धाय निर्गतः ॥
विश्रान्तः सहसा भूत्वा श्वो युद्ध्यस्व मया सह ।
न हि धर्मविरुद्धं त्वां हन्यां रथविवर्जितम् ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो रामाद् रावणः परमाद्भुतम् ।
विस्मयं परमं गत्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥
धन्योऽसि राघव श्रेष्ठ यस्य ते धर्म एव हि ।
प्रधानं सर्वभूतेषु न त्वेवं विद्यते परम् ॥
इत्युक्त्वा राक्षसेन्द्रस्तु धाम प्रविवेश ह ।
लङ्कां प्रति ययौ तूर्णं सर्वसैन्यसमन्वितः ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने रावण से कहा, “हे राजन्, तुम अभी क्षणभर के लिए जाओ। विश्राम करके, स्वस्थ होकर युद्ध के लिए फिर निकलो। थके हुए हो, कल मेरे साथ युद्ध करो। मैं धर्म के विरुद्ध जाकर तुम्हें, जो रथविहीन हो, नहीं मार सकता।” राम का यह परम अद्भुत वचन सुनकर रावण अत्यधिक विस्मित हुआ और बोला, “हे श्रेष्ठ राघव, तुम धन्य हो, क्योंकि तुम्हारे लिए धर्म ही सर्वोच्च है। सभी प्राणियों में ऐसा धर्मपरायण कोई नहीं है।” ऐसा कहकर राक्षसराज शीघ्र ही अपने स्थान को लौट गया, और सब सेना सहित लंका में प्रवेश कर गया।
॥ श्लोक १८-२२ ॥
तं प्रयान्तं महाराजं रावणं राम एव च ।
ददर्श विस्मितः सर्वैः सहितो वानरैस्तदा ॥
विभीषणस्तु तं दृष्ट्वा रावणं यान्तमाहवात् ।
उवाच राघवं वाक्यं धर्मज्ञं धर्मसंहितम् ॥
किं त्वया न कृतो राजन् रिपुः संग्राम एव सः ।
अधर्मो यदि ते न स्याद्धर्म एव हि केवलः ॥
एवं ब्रुवति वैदेह्या भ्रातरि प्रीतिमान् भृशम् ।
उवाच राघवो वाक्यं धर्मार्थसहितं तदा ॥
📖 भावार्थ : उस महाराज रावण को जाते देखकर राम सभी वानरों के साथ विस्मित हो गए। विभीषण ने रावण को युद्ध से लौटते देखकर राम से धर्मयुक्त वचन कहे, “हे राजन्, आपने युद्ध में शत्रु को क्यों नहीं मारा? यदि आपको अधर्म नहीं लगता तो यह केवल धर्म ही है।” इस प्रकार वैदेही के भाई (विभीषण) के अत्यंत प्रीतिपूर्वक बोलने पर राम ने धर्म और अर्थ से युक्त वचन कहे।

🛡️ राम का धर्मोपदेश और युद्ध की प्रतीक्षा (श्लोक २३-३५)

॥ श्लोक २३-२८ ॥
न हिंस्यात् सर्वभूतानि धर्म एष सनातनः ।
युध्यमानः पराक्रान्तो न शत्रुं हन्तुमर्हति ॥
विश्रान्तः स पुनर्युद्ध्येत् समर्थश्च भवेद् युधि ।
तस्मादेनं विसृष्टवान् न मे धर्मो विहन्यते ॥
एवं रामेण धर्मज्ञा वानराः सम्बोधिताः ।
प्रशशंसुर्महात्मानं धर्मज्ञं धर्मचारिणम् ॥
ततः प्रभाते संप्राप्ते रावणः पुनरागतः ।
रथमारुह्य महता सैन्येन समवारयत् ॥
📖 भावार्थ : “सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए—यही सनातन धर्म है। युद्ध में पराक्रम करता हुआ भी शत्रु को जब वह असमर्थ हो तब नहीं मारना चाहिए। वह विश्राम करके फिर युद्ध करेगा और युद्ध में समर्थ हो जाएगा। इसलिए मैंने उसे छोड़ दिया, मेरा धर्म नष्ट नहीं होता।” इस प्रकार राम ने धर्मज्ञ वानरों को समझाया। उन सबने उस महात्मा, धर्मज्ञ और धर्माचरण करने वाले की प्रशंसा की। तत्पश्चात प्रभात होने पर रावण पुनः आया, रथ पर चढ़कर विशाल सेना के साथ उसने संध्या (युद्ध) किया।
॥ श्लोक २९-३५ ॥
ततो युद्धं महाघोरं पुनरासीत् तयोर्मृधे ।
रामरावणयो राजन् प्राणिनां हर्षवर्धनम् ॥
एतत्ते कथितं सर्वं यथावद् द्विजसत्तम ।
रामस्य धर्मनिष्ठत्वं रावणस्य च निग्रहः ॥
इत्येतत् कथितं राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
रामस्य चरितं पुण्यं युद्धकाण्डे प्रकीर्तितम् ॥
📖 भावार्थ : तब उन दोनों (राम और रावण) का भयंकर युद्ध पुनः आरम्भ हुआ, जो प्राणियों को हर्षित करने वाला था। हे राजन्, तुमने मुझसे जो पूछा था, वह सब मैंने यथावत् कह दिया—राम की धर्मनिष्ठा और रावण का दमन। इस प्रकार यह पवित्र रामचरित युद्धकाण्ड में कहा गया है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 मर्यादा पुरुषोत्तम राम

इस सर्ग में राम का चरित्र सर्वोच्च मर्यादा का परिचायक है। शत्रु को भी अवसर देना, उसकी दुर्दशा का लाभ न उठाना—यही उनका धर्म है।

⚖️ युद्ध-नीति और धर्म

प्राचीन भारतीय युद्ध-नीति में निःशस्त्र, रथहीन, विमुख शत्रु पर आक्रमण वर्जित था। राम इस नियम का पालन करते हैं।

🧠 रावण का विस्मय

रावण भी राम की उदारता से अभिभूत होता है। वह राम को धन्य कहता है—यह दर्शाता है कि धर्म की शक्ति असुरों को भी प्रभावित करती है।

🌅 अगले दिन का युद्ध

राम के इस त्याग से युद्ध और अधिक रोमांचक बन जाता है। अगले दिन रावण नवीनी ऊर्जा से युद्ध करता है, जिससे राम की विजय और भी गौरवशाली होती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा वीर वह है जो केवल शारीरिक बल से नहीं, बल्कि नैतिक बल से भी सम्पन्न हो। अवसर का लाभ उठाने की अपेक्षा धर्म का पालन करना ही श्रेष्ठ है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।