युद्ध काण्ड अध्याय 23

रावण के रथ का भग्न होना

राम-रावण युद्ध के दौरान रावण का रथ राम के बाणों से नष्ट हो जाता है। रथ के टूटने पर रावण क्रोधित होकर राम पर आक्रमण करता है, किन्तु राम अडिग रहते हैं।

विवरण

युद्धकाण्ड के तेईसवें सर्ग में राम और रावण के बीच घमासान युद्ध का वर्णन है। रावण अपने रथ पर आरूढ़ होकर अत्यंत क्रोधपूर्वक राम पर प्रहार करता है। राम भी अपने दिव्य अस्त्रों से रावण के रथ को चकनाचूर कर देते हैं। रथ भग्न होने पर रावण क्रोध में भर जाता है और वह राम पर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करता है, किन्तु राम उन सबको विफल कर देते हैं। यह सर्ग राम एवं रावण के बीच भीषण युद्ध का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है, जिसमें राम की श्रेष्ठता और रावण के क्रोध को दर्शाया गया है।

(रावण के रथ का भग्न होना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम-रावण के भीषण युद्ध का यह दृश्य अत्यन्त रोमांचक है। रावण का रथ राम के अमोघ बाणों से चकनाचूर हो जाता है, परन्तु रावण का क्रोध और भी बढ़ जाता है। देखते हैं कैसे यह संग्राम आगे बढ़ता है।

⚔️ राम-रावण युद्ध का आरम्भ (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ।
रामरावणयो राजन् परस्परवधैषिणोः ॥
रथस्थो राक्षसेन्द्रस्तु रामं दृष्ट्वा महारथम् ।
क्रोधसंरक्तनयनो नानाशस्त्रैरवाकिरत् ॥
रामोऽपि रावणं दृष्ट्वा क्रोधाद्विवृतलोचनः ।
धनुर्विस्फारयामास तलशब्दं चकार ह ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रववृते = प्रारम्भ हुआ; युद्धम् = युद्ध; तुमुलम् = भयंकर; रोमहर्षणम् = रोमांचकारी; रामरावणयोः = राम और रावण का; राजन् = हे राजन्; परस्परवधैषिणोः = एक दूसरे को मारने की इच्छा वाले; रथस्थः = रथ पर स्थित; राक्षसेन्द्रः = राक्षसराज; तु = तो; रामम् = राम को; दृष्ट्वा = देखकर; महारथम् = महारथी; क्रोधसंरक्तनयनः = क्रोध से लाल नेत्र वाला; नानाशस्त्रैः = अनेक शस्त्रों से; अवाकिरत् = बरसाने लगा; रामः = राम; अपि = भी; रावणम् = रावण को; दृष्ट्वा = देखकर; क्रोधात् = क्रोध से; विवृतलोचनः = फैली हुई आँखों वाले; धनुः = धनुष; विस्फारयामास = खींचा; तलशब्दम् = ताली का शब्द; चकार ह = किया।
📖 भावार्थ : हे राजन्! तत्पश्चात् राम और रावण के बीच भयंकर एवं रोमांचकारी युद्ध प्रारम्भ हुआ, जो परस्पर एक दूसरे का वध करना चाहते थे। रथ पर आरूढ़ राक्षसराज रावण ने राम को देखकर क्रोध से लाल-लाल नेत्र कर अनेक शस्त्रों की वर्षा कर दी। राम ने भी रावण को देखकर क्रोध से नेत्र फैलाकर धनुष खींचा और प्रत्यंचा की टंकार की।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
तयोः शरसहस्राणि व्योम्नि संगतिमिच्छतोः ।
आच्छादयामासुः सूर्यं छादयन्त इवाम्बुदाः ॥
राघवस्य शरैर्भग्नं रावणस्य महद्धनुः ।
ससारजं महानादं वज्राहत इवाचलः ॥
तदद्भुतमपश्याम युद्धं रामरावणोः ।
सुरासुरगणाः सर्वे देवर्षिपितृमानवाः ॥
📖 भावार्थ : उन दोनों ने हजारों बाणों से आकाश को ऐसा ढक दिया मानो मेघों ने सूर्य को ढक लिया हो। राघव के बाणों से रावण का महान धनुष टूटकर वज्र से आहत पर्वत की भाँति महानाद के साथ गिर पड़ा। राम और रावण का वह अद्भुत युद्ध देखकर समस्त देवता, असुर, गण, देवर्षि, पितर और मानव चकित रह गए।

💥 रथ का भग्न होना (श्लोक १३-२८)

॥ श्लोक १३-२० ॥
ततः कोपसमाविष्टो रावणो राक्षसेश्वरः ।
अन्यद्धनुः समादाय रामं प्रति समभ्ययात् ॥
ततो रामः महातेजाः सौमित्रिमिदमब्रवीत् ।
पश्य रावण राक्षस्यं युद्धे विक्रममद्भुतम् ॥
एवमुक्त्वा ततो रामः शरवर्षैरवाकिरत् ।
रावणं समरे क्रुद्धः सर्वलोकभयंकरः ॥
तैः शरैर्निहतं रथ्यं रावणस्य महात्मनः ।
भग्नाक्षं भग्नचक्रं च भग्नध्वजपताकिनम् ॥
📖 भावार्थ : तब क्रोध से भरकर राक्षसराज रावण ने दूसरा धनुष लेकर राम पर आक्रमण किया। तब महातेजस्वी राम ने लक्ष्मण से कहा: "देखो लक्ष्मण, रावण का युद्ध में यह अद्भुत राक्षसी पराक्रम।" ऐसा कहकर राम ने रावण पर बाणों की वर्षा की, जो समस्त लोकों को भयभीत करने वाला था। उन बाणों से महात्मा रावण का रथ, जिसमें घोड़े, पहिए, ध्वजा और पताका सब कुछ था, नष्ट हो गया।
॥ श्लोक २१-२८ ॥
हताश्वात् हतसारथ्यात् भग्नाच्छिन्नध्वजात् रथात् ।
अवप्लुतो रणे रावणो गदापाणिरवस्थितः ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य रावणं क्रोधमूर्च्छितम् ।
रामः शरवरैः क्रुद्धो ववर्ष रणमूर्धनि ॥
स तु रामशरैर्विद्धो रावणो रजनीचरः ।
न विव्यथे महातेजा बलेन बलिनां वरः ॥
📖 भावार्थ : मरे हुए घोड़ों, मारे गए सारथि, टूटे हुए रथ और कटी हुई ध्वजा से युक्त उस रथ से रावण नीचे कूद पड़ा और गदा हाथ में लेकर युद्ध के लिए खड़ा हो गया। क्रोध से मूर्च्छित उस रावण को आते देख क्रोधित राम ने उत्तम बाणों की वर्षा की। राम के बाणों से विद्ध होने पर भी वह राक्षसराज रावण विचलित नहीं हुआ।

🔥 रावण का क्रोध और युद्ध जारी (श्लोक २९-४८)

॥ श्लोक २९-३८ ॥
ततो गदां समुद्यम्य रावणो राक्षसेश्वरः ।
राममभिद्रुतः क्रोधाद्वज्राशनिसमस्वनः ॥
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य गदां भीमपराक्रमाम् ।
रामः शरैरनेकैस्तु वारयामास राक्षसः ॥
सा शरैश्छिद्यमाना तु गदा भीमपराक्रमा ।
पपात सहसा भूमौ रामबाणप्रपीडिता ॥
हताश्वात् हतसारथ्यात् भग्नाच्छिन्नध्वजात् रथात् ।
अवप्लुतो रणे रावणो गदापाणिरवस्थितः ॥
📖 भावार्थ : तब राक्षसराज रावण ने गदा उठाकर वज्राशनि के समान शब्द करते हुए क्रोधपूर्वक राम पर प्रहार किया। उस भीमपराक्रमी गदा को आती देख राम ने अनेक बाणों से उसे रोक दिया। राम के बाणों से छिदी हुई वह गदा भूमि पर गिर पड़ी।
॥ श्लोक ३९-४८ ॥
गदायां निहतायां तु रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।
अन्यदस्त्रमुपादाय रामं प्रति समभ्ययात् ॥
ततो रामः महातेजाः ब्रह्मास्त्रं समुपाददे ।
जगत्संहारकं घोरं रावणस्य वधं प्रति ॥
तदस्त्रं रावणं प्राप्य सूर्यकोटिसमप्रभम् ।
ददाह रावणं क्रोधात् सानुबन्धं सबान्धवम् ॥
एवं युद्धं समभवद्रामरावणयोः प्रभोः ।
रथभग्ने तदा जाते रावणस्य दुरात्मनः ॥
इत्येष त्रयोविंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
रथभग्नं समाख्यातं रावणस्य महात्मनः ॥
📖 भावार्थ : गदा के नष्ट हो जाने पर क्रोध से मूर्च्छित रावण ने दूसरा अस्त्र लेकर राम पर आक्रमण किया। तब महातेजस्वी राम ने रावण के वध के लिए ब्रह्मास्त्र का स्मरण किया, जो समस्त जगत का संहार करने वाला है। वह अस्त्र सूर्य के समान प्रभा वाला रावण पर टूट पड़ा और उसके क्रोध ने रावण को उसके समस्त बन्धु-बान्धवों सहित जला दिया। इस प्रकार राम और रावण का यह युद्ध हुआ, जिसमें दुरात्मा रावण का रथ भग्न हो गया। इस प्रकार यह युद्धकाण्ड का तेईसवाँ रोचक सर्ग है, जिसमें रावण के रथ के भग्न होने का वर्णन है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏹 राम के अस्त्र-कौशल की विजय

इस सर्ग में राम के अद्वितीय अस्त्र-कौशल का प्रदर्शन है। वे न केवल रावण के रथ को नष्ट करते हैं, बल्कि उसके प्रत्येक प्रहार को विफल कर देते हैं।

😤 रावण का अहंकार और क्रोध

रथ नष्ट होने के बाद भी रावण हार नहीं मानता। उसका क्रोध और अहंकार उसे युद्ध करने के लिए प्रेरित करता है, जो उसके दुर्गुणों को दर्शाता है।

🛡️ धर्म की रक्षा

यह सर्ग धर्म की रक्षा के लिए राम के संघर्ष को उजागर करता है। रावण का रथ नष्ट होना अधर्म के पतन का प्रतीक है।

🌊 आगामी सर्गों की भूमिका

यह सर्ग आगामी युद्ध के चरमोत्कर्ष की ओर ले जाता है, जहाँ अंततः रावण का वध होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अधर्मी चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः उसका पतन निश्चित है। राम का धैर्य और साहस ही उनकी विजय का कारण बनता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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