युद्ध काण्ड अध्याय 22

रावण का राम से युद्ध

रावण राम के साथ युद्ध करने के लिए रणक्षेत्र में उतरता है। दोनों महारथियों के बीच घोर संग्राम होता है, जिसमें दिव्यास्त्रों का प्रयोग होता है और रावण को अपनी शक्ति का अहसास होता है।

विवरण

युद्धकाण्ड के इस महत्वपूर्ण सर्ग में रावण स्वयं राम के सम्मुख युद्ध के लिए प्रस्तुत होता है। वह अपने रथ पर आरूढ़ होकर रणभूमि में आता है, जिसे देखकर वानर सेना में हलचल मच जाती है। राम और रावण के बीच भयंकर युद्ध आरम्भ होता है। दोनों एक-दूसरे पर बाणवर्षा करते हैं, अनेक दिव्यास्त्रों का संधान होता है। रावण अपनी माया का प्रयोग करता है, किन्तु राम अपने धैर्य और शौर्य से उसका सामना करते हैं। अन्ततः रावण को पीछे हटना पड़ता है और वह कुछ समय के लिए युद्ध से विरत हो जाता है। यह सर्ग राम-रावण युद्ध के प्रारम्भिक चरण का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है।

(रावण का राम से युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वाविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण अब स्वयं युद्धभूमि में उतर चुका है। वह अपनी समस्त माया और शक्ति का प्रयोग करते हुए राम से भिड़ता है। यह सर्ग दो महारथियों के प्रथम साक्षात् युद्ध का अद्भुत वर्णन प्रस्तुत करता है।

🏹 रावण का रणक्षेत्र में प्रवेश (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः स रावणो राजा श्रुत्वा तद्राक्षसक्षयम् ।
क्रोधसंरक्तनयनो निर्ययौ सहसा पुरात् ॥
रथेनादित्यवर्णेन मणिकाञ्चनभूषितेन ।
महता वेगवता राजा सेनया परिवारितः ॥
तं दृष्ट्वा समरे वीरं रावणं राक्षसेश्वरम् ।
वानराः सम्प्रदुद्रुवुर्दृष्ट्वा तं भीमविक्रमम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सः = वह; रावणः = रावण; राजा = राजा; श्रुत्वा = सुनकर; तत् = उस; राक्षसक्षयम् = राक्षसों के विनाश को; क्रोधसंरक्तनयनः = क्रोध से लाल नेत्रों वाला; निर्ययौ = निकला; सहसा = सहसा; पुरात् = नगर से; रथेन = रथ से; आदित्यवर्णेन = सूर्य के समान तेजस्वी; मणिकाञ्चनभूषितेन = रत्न और स्वर्ण से सुसज्जित; महता = महान; वेगवता = वेगवान; राजा = राजा; सेनया = सेना से; परिवारितः = घिरा हुआ; तम् = उस; दृष्ट्वा = देखकर; समरे = युद्ध में; वीरम् = वीर; रावणम् = रावण को; राक्षसेश्वरम् = राक्षसों के स्वामी को; वानराः = वानर; सम्प्रदुद्रुवुः = भाग गए; दृष्ट्वा = देखकर; तम् = उस; भीमविक्रमम् = भयंकर पराक्रमी को।
📖 भावार्थ : उसके बाद राक्षसों का विनाश सुनकर राजा रावण क्रोध से लाल-लाल नेत्रों वाला होकर सहसा नगर से बाहर निकला। वह सूर्य के समान तेजस्वी, रत्न और स्वर्ण से सुसज्जित, महान वेगवान रथ पर आरूढ़ था और चारों ओर से सेना से घिरा हुआ था। युद्ध में उस राक्षसेश्वर भीम पराक्रमी रावण को देखकर वानर भयभीत होकर भागने लगे।
॥ श्लोक ६-१० ॥
तान् विद्रुतान् समीक्ष्याथ हनूमान् मारुतात्मजः ।
अभ्यधावत संक्रुद्धो रावणं युद्धदुर्मदम् ॥
तयोर्युद्धं समभवद् घोरं लोमहर्षणम् ।
हनूमद्रावणस्यैव परस्परजिगीषयोः ॥
📖 भावार्थ : उन वानरों को भागते देख हनुमान क्रोधित हो उठे और युद्ध के मद में चूर रावण पर झपटे। तब हनुमान और रावण के बीच परस्पर जिगीषा से भयंकर और रोमांचकारी युद्ध हुआ।

⚔️ राम और रावण का घोर युद्ध (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
रावणः शरवर्षेण रामं ववर्ष वीर्यवान् ।
रामोऽपि राक्षसेन्द्रं तं शरैरन्यैरवाकिरत् ॥
तयोर्बाणाः सुविमलाः खे शुशुभिरे भृशम् ।
खद्योताः शरदीवोग्राः परस्परजयैषिणोः ॥
रावणेन ततो माया प्रयुक्ता रणमूर्धनि ।
स रथी रथिनां श्रेष्ठः सर्वलोकभयावहा ॥
तां मायां राघवो दृष्ट्वा मोहयन्तीं महाबलः ।
न चचाल महातेजाः स्मितपूर्वमुवाच ह ॥
📖 भावार्थ : वीर्यवान् रावण ने बाणों की वर्षा से राम को ढक दिया। राम ने भी उस राक्षसेन्द्र पर दूसरे बाणों से प्रहार किया। परस्पर जय की इच्छा रखने वाले उन दोनों के निर्मल बाण आकाश में शरद् ऋतु के खद्योतों (जुगनुओं) के समान अत्यन्त शोभायमान हो रहे थे। तब रावण ने रणभूमि में माया का प्रयोग किया, जो सर्वलोकभयावहा थी। उस माया से मोहित करने वाली को देखकर भी महाबलशाली राम विचलित नहीं हुए और मुस्कुराते हुए बोले।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
मायेयं राक्षसी राजन् बालिशा तव सुव्रत ।
न मां मोहयितुं शक्या माया तव कदाचन ॥
इत्युक्त्वा राघवो बाणै रावणं समवाकिरत् ।
स ताडितो महाबाणैः रामेण रणमूर्धनि ॥
विसंज्ञः स पपाताथ रथोपस्थे स राक्षसः ।
ततो हाहाकृतं सर्वं राक्षसानां महद्बलम् ॥
ततः स रावणो राजा प्रतिलभ्य च चेतनाम् ।
निवृत्तो रथमादाय युद्धायैव मनो दधे ॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा, "हे राक्षसराज! यह तुम्हारी बालिश राक्षसी माया मुझे कभी मोहित नहीं कर सकती।" ऐसा कहकर राघव ने बाणों से रावण को ढक दिया। रणभूमि में राम के महान बाणों से आहत होकर रावण रथ पर ही मूर्छित हो गिरा। तब राक्षसों की महान सेना में हाहाकार मच गया। फिर रावण को चेतना लौटी और वह रथ लेकर युद्ध के लिए लौटा।

🛡️ युद्ध का मध्यांतर (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
ततः प्रववृते युद्धं पुनरेव महद्भयम् ।
रामरावणयो राजन् सर्वलोकभयावहम् ॥
रामेण विमुखीकृत्य रावणः स रणाजिरात् ।
निवृत्तः सहसा राजन् राक्षसैः परिवारितः ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
तुष्टुवुः राघवं वीरं जयेनाभ्यर्दयन् मुदा ॥
📖 भावार्थ : तब राम और रावण के बीच पुनः भयंकर युद्ध हुआ, जो सब लोकों को भयभीत करने वाला था। राम ने रावण को युद्धक्षेत्र से विमुख कर दिया। तब रावण राक्षसों से घिरा हुआ सहसा वहाँ से लौट गया। तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और परमर्षियों ने राम की स्तुति की और उन्हें जय से अभिनन्दित किया।
॥ श्लोक ३३-३८ ॥
इत्येष द्वाविंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
रामरावणयो राजन् युद्धं परमदारुणम् ॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि नित्यं भक्तिसमन्वितः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह रोचक द्वाविंश सर्ग है, जिसमें राम और रावण के परम दारुण युद्ध का वर्णन है। जो इसे नित्य भक्तिपूर्वक पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में महीयते (पूजित) होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रावण का अहंकार

रावण ने स्वयं युद्ध में आकर भी राम के सम्मुख टिक न सका। यह उसके अहंकार और अधर्म के पतन का सूचक है।

🛡️ राम का धैर्य

राम ने माया से मोहित हुए बिना, धैर्य और साहस से रावण का सामना किया। यह धर्म की विजय का प्रतीक है।

🌌 देवताओं का हस्तक्षेप

युद्ध में देवताओं और ऋषियों की उपस्थिति और राम की स्तुति यह दर्शाती है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड राम के पक्ष में है।

📖 शिक्षा

यह सर्ग हमें सिखाता है कि चाहे शत्रु कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, धर्म का मार्ग न छोड़ने वाले की विजय निश्चित है।

🎯 शिक्षा : राम के अटल साहस और धैर्य ने रावण की माया को परास्त कर दिया। यह सर्ग हमें प्रेरणा देता है कि संकट में धैर्य न खोएं और सत्य के पथ पर अडिग रहें।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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