युद्ध काण्ड अध्याय 21

रावण का पुनः युद्ध में प्रवेश

रावण अपनी सेना का संहार देखकर अत्यन्त क्रोधित हो उठता है और स्वयं युद्धभूमि में प्रवेश करने का निर्णय लेता है। वह अपने रथ पर आरूढ़ होकर राम की ओर बढ़ता है और उन्हें युद्ध के लिए ललकारता है।

विवरण

जब रावण देखता है कि उसके असंख्य राक्षस योद्धा वानरों द्वारा मारे जा चुके हैं और उसकी सेना छिन्न-भिन्न हो रही है, तो वह अत्यन्त क्रोध से भर जाता है। वह विभीषण के परित्याग और हनुमान के लंका दहन की घटनाओं को याद करता है। अब वह स्वयं राम-लक्ष्मण का सामना करने का निर्णय लेता है। अपने भव्य रथ पर सवार होकर, विविध अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित, रावण युद्धभूमि में प्रकट होता है। उसके आते ही वानरों में भय का संचार होता है, किन्तु राम अत्यन्त शान्त रहते हैं। रावण राम को कठोर वचनों से उकसाता है और दोनों में घोर युद्ध आरम्भ होता है। यह सर्ग राम-रावण के महासंग्राम के प्रारम्भ का सूचक है।

(रावण का पुनः युद्ध में प्रवेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : जब रावण देखता है कि उसके असंख्य राक्षस योद्धा वानरों द्वारा मारे जा चुके हैं, तब वह अत्यन्त क्रोधित हो उठता है। वह स्वयं रणभूमि में उतरने का निश्चय करता है। यह सर्ग राम-रावण के महासंग्राम के प्रारम्भ का अद्भुत वर्णन प्रस्तुत करता है।

🔥 रावण का क्रोध और युद्ध-निर्णय (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः संप्रेक्ष्य रावणः संचुक्रोध महाबलः।
हतानि यूथपालानि वानरैः सर्वतो दिशम्॥
ददंश दशनैरोष्ठं नेत्रैरग्निशिखोपमैः।
उवाच च महातेजा विभीषणमपश्यतः॥
अद्यापि निहनिष्यामि रामं लक्ष्मणमेव च।
हत्वा वानरवीरांश्च करिष्ये धरणीं समाम्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; संप्रेक्ष्य = देखकर; रावणः = रावण; संचुक्रोध = अत्यन्त क्रोधित हुआ; महाबलः = महाबली; हतानि = मारे गए; यूथपालानि = सेनानायकों को; वानरैः = वानरों द्वारा; सर्वतः = सब ओर; दिशम् = दिशाओं में; ददंश = काटा; दशनैः = दाँतों से; ओष्ठम् = ओंठ; नेत्रैः = आँखों से; अग्निशिखोपमैः = अग्नि की ज्वाला के समान; उवाच = बोला; च = और; महातेजाः = महान तेजस्वी; विभीषणम् = विभीषण को; अपश्यतः = न देखकर (अर्थात विभीषण के परित्याग को याद करके); अद्यापि = आज ही; निहनिष्यामि = मार डालूँगा; रामम् = राम को; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; एव = ही; च = और; हत्वा = मारकर; वानरवीरान् = वानर वीरों को; करिष्ये = कर दूँगा; धरणीम् = पृथ्वी को; समाम् = समतल (श्मशान के समान)।
📖 भावार्थ : उसके बाद महाबली रावण ने चारों ओर वानरों द्वारा मारे गए अपने योद्धाओं को देखा तो वह अत्यन्त क्रोधित हो उठा। उसने क्रोध में अपने दाँतों से ओंठ काटा और उसकी आँखें अग्नि-ज्वाला के समान हो गईं। विभीषण को न देखकर (उसके परित्याग का स्मरण कर) वह महातेजस्वी रावण बोला: "आज ही मैं राम और लक्ष्मण का वध कर डालूँगा तथा समस्त वानर वीरों को मारकर इस पृथ्वी को श्मशान के समान समतल कर दूँगा।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
इत्युक्त्वा रथमास्थाय दिव्यं रत्नविभूषितम्।
युक्तं हरियुगैः शीघ्रैः प्रययौ यत्र राघवौ॥
तस्य रथस्य निर्घोषो दिवमापूरयन्नभः।
बभूव तुमुलो घोरो राक्षसानां हर्षयन्॥
शङ्खदुन्दुभिनादांश्च वादित्राणि च सर्वशः।
प्रवादयन्ति रक्षांसि हर्षात्सिंहनादसंयुतम्॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर रावण रत्नों से विभूषित दिव्य रथ पर आरूढ़ हुआ, जो तीव्रगामी हरियुगल (घोड़ों) से युक्त था, और वह उस स्थान की ओर चल पड़ा जहाँ राम-लक्ष्मण थे। उसके रथ का भयंकर घोष आकाश और दिशाओं में भर गया, जिससे समस्त राक्षस हर्षित हो उठे। राक्षसों ने हर्ष से शंख, दुन्दुभि और अनेक वाद्य बजाए तथा सिंहनाद किया।

🚀 रावण के रथ और आयुधों का वर्णन (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
तस्य रथस्य चक्राणि नेमिघोषैः समन्ततः।
दिशः समाकुलीचक्रुः सूर्यस्येव परिभ्रमात्॥
ध्वजश्च विमले तस्मिन्महेन्द्रध्वजसंनिभः।
वीरुधां लतिका चित्रा माला च विविधा शुभा॥
सधनुश्चर्म खड्गं च शूलं परशुमेव च।
बिभ्रत् स राक्षसो राजा बभौ साक्षादिवान्तकः॥
तमापतन्तं सहसा रामो दृष्ट्वा महाबलम्।
अब्रवीत् सौम्यया वाचा लक्ष्मणं परवीरहा॥
📖 भावार्थ : उस रथ के चक्रों की नेमि (परिधि) का घोष चारों दिशाओं को व्याकुल कर रहा था, मानो सूर्य के परिभ्रमण का घोष हो। उस रथ पर विमल (स्वच्छ) ध्वज था, जो इन्द्र के ध्वज के समान सुशोभित था। उस पर वीरुधों की चित्र-विचित्र लताएँ और विविध प्रकार की शुभ मालाएँ लटक रही थीं। धनुष, चर्म, खड्ग, शूल और परशु धारण किए वह राक्षसराज साक्षात् यमराज के समान प्रतीत हो रहा था। उस महाबली को सहसा आते देख परवीरहा राम ने सौम्य वाणी में लक्ष्मण से कहा।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
एष राक्षसराजोऽसौ क्रोधसंरक्तलोचनः।
अभ्येति सहसा युद्धे संनद्धो रथमास्थितः॥
अद्यैनं निहनिष्यामि सानुबन्धं सराक्षसम्।
पश्यतां वानरेन्द्राणां त्वरितं सम्प्रहारिणाम्॥
इत्युक्त्वा धनुरायम्य रामः परपुरञ्जयः।
स्थितो गिरिरिवाचलः प्रतीक्षन् रावणं रणे॥
📖 भावार्थ : "यह वही राक्षसराज है, जिसकी आँखें क्रोध से लाल हैं, यह युद्ध के लिए सन्नद्ध हो रथ पर आरूढ़ हो सहसा आ रहा है। आज मैं इसे इसके समस्त अनुचरों और राक्षसों सहित मार डालूँगा, यह देखेंगे समस्त वानरेन्द्र जो युद्ध के लिए उत्सुक हैं।" ऐसा कहकर राम ने धनुष चढ़ाया और पर्वत के समान अचल होकर रण में रावण की प्रतीक्षा करने लगे।

⚔️ राम-रावण युद्ध का प्रारम्भ (श्लोक २६-४०)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
ततः स रावणो रामं दृष्ट्वा सन्नद्धमाहवे।
क्रोधसंरक्तनयनो बाणवर्षैरवाकिरत्॥
रामोऽपि राक्षसेन्द्रस्य सायकैः सन्निवारयन्।
बाणजालानि चिच्छेद लीलयैव महाबलः॥
तयोर्युद्धं समभवदतुलं रोमहर्षणम्।
देवासुररणप्रख्यं सर्वप्राणिभयंकरम्॥
ववर्षतुः शरव्रातैः परस्परजिगीषया।
रामरावणयोः सङ्ख्ये देवानामपि विस्मयः॥
📖 भावार्थ : तब रावण ने युद्ध के लिए सन्नद्ध राम को देखकर क्रोध से लाल-लाल आँखों से उन पर बाणों की वर्षा कर दी। राम ने भी राक्षसेन्द्र के बाणों को रोकते हुए, महाबली होने के कारण लीलापूर्वक उसके बाण-जालों को काट डाला। उन दोनों का भयंकर युद्ध हुआ, जो देवासुर संग्राम के समान रोमांचकारी और समस्त प्राणियों को भय देने वाला था। राम और रावण ने परस्पर जिगीषा से शरव्रातों की वर्षा की, जिसे देख देवता भी विस्मित हो गए।
॥ श्लोक ३३-४० ॥
रावणो राममुख्यांश्च बाणान् गृह्य महाबलः।
चिक्षेप युगपत् क्रुद्धो वज्रानिव शतक्रतुः॥
रामस्तु रावणं वीरो बाणैर्बहुभिराचितम्।
विव्याध परमक्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥
तद्युद्धमद्भुतं वीरौ चक्रतुः सूद्वेजनम्।
सर्वेषां प्राणिनां तत्र देवानां च महात्मनाम्॥
📖 भावार्थ : महाबली रावण ने क्रुद्ध होकर एक साथ अनेक बाण उठाए और उन्हें इन्द्र के वज्र के समान राम पर फेंका। तब वीर राम ने अत्यन्त क्रोधित होकर रावण को, जो अनेक बाणों से आच्छादित था, ऐसे बींधा जैसे सिंह क्षुद्र मृग को बींधता है। उन दोनों वीरों ने वहाँ अद्भुत और भयानक युद्ध किया, जिससे समस्त प्राणी और महात्मा देवता भी उद्विग्न हो गए।

🔚 सर्ग का उपसंहार (श्लोक ४१-४८)

॥ श्लोक ४१-४८ ॥
एवं तयोः प्रवृत्तेऽथ संग्रामे लोमहर्षणे।
निवृत्ते च दिने प्राप्ते सन्ध्याकाले समागते॥
अस्तं गते सहस्रांशौ रात्रौ च समुपस्थिते।
युद्धं विरमयामासुरनीकस्थाः परस्परम्॥
रामो धनुषि सन्धाय शरं ब्रह्मास्त्रतेजसा।
विरराम महातेजा रावणोऽपि न्यवर्तत॥
इत्येष एकविंशः सर्गो युद्धे रामस्य रक्षसाम्।
रावणस्य च संरम्भो वर्णितो भयवर्धनः॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार उन दोनों का रोमांचकारी संग्राम चल रहा था। दिन समाप्त हो गया और सन्ध्या का समय आ गया। सहस्रांशु सूर्य अस्त हो गए और रात्रि उपस्थित हो गई। तब दोनों ओर के योद्धाओं ने परस्पर युद्ध विराम कर दिया। राम ने धनुष पर ब्रह्मास्त्र के तेज से युक्त शर चढ़ाकर युद्ध से विरति ली और महातेजा रावण भी लौट गया। इस प्रकार यह इक्कीसवाँ सर्ग है, जिसमें राम के साथ राक्षसों के युद्ध में रावण के संरम्भ (उत्साह) का भयवर्धक वर्णन है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रावण का अहंकार और पराक्रम

इस सर्ग में रावण का अहंकार चरम पर है। वह स्वयं को अजेय मानता है और राम-लक्ष्मण का वध करने का डींग हाँकता है। उसके रथ और आयुधों का वर्णन उसकी समृद्धि और शक्ति को दर्शाता है।

💡 राम का धैर्य और वीरता

राम अत्यन्त शान्त रहते हुए रावण का सामना करते हैं। उनका कहना है कि आज ही वे रावण का अन्त कर देंगे। उनका पर्वत के समान अचल रहना उनके आत्मविश्वास को प्रदर्शित करता है।

🌙 सन्ध्या-विधान और युद्ध-विराम

सूर्यास्त के बाद युद्ध विराम की परम्परा का पालन दोनों पक्ष करते हैं। यह प्राचीन भारतीय युद्ध-नीति का सूचक है।

⚡ आगे की रणभूमि की झलक

यह सर्ग राम-रावण के बीच आगामी घोर संग्राम की भूमिका तैयार करता है, जो आने वाले सर्गों में और अधिक भयंकर रूप धारण करेगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और क्रोध में होकर किया गया युद्ध-प्रवेश भी अन्त में पराजय ही देता है। रावण का उत्साह और आत्मविश्वास उसके पतन का कारण बनता है, जबकि राम का धैर्य और नीति उनकी विजय सुनिश्चित करती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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