युद्ध काण्ड अध्याय 19

इंद्रजीत द्वारा राम-लक्ष्मण को नागपाश में बांधना

युद्ध में इन्द्रजित द्वारा राम और लक्ष्मण को नागपाश अस्त्र से बांधे जाने का वर्णन। वानर सेना शोकाकुल हो जाती है, किन्तु विभीषण उन्हें धैर्य बंधाते हैं। इन्द्रजित विजयी होकर लंका लौट जाता है।

विवरण

युद्धकाण्ड के उन्नीसवें सर्ग में इन्द्रजित (मेघनाद) अपने रथ पर आरूढ़ होकर भीषण संग्राम करता है। वह अदृश्य होकर दिव्य नागपाश अस्त्र का प्रयोग करता है, जिससे राम और लक्ष्मण सर्पों के फंदों में जकड़कर मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ते हैं। यह देख सारी वानर सेना हतप्रभ और शोकाकुल हो जाती है। हनुमान, सुग्रीव, जाम्बवान आदि प्रमुख वानर व्याकुल होकर खड़े हो जाते हैं। तब विभीषण प्रकट होकर सबको आश्वस्त करते हैं कि ये दोनों वीर अवध्य हैं और कोई न कोई (गरुड़) अवश्य इन्हें मुक्त करेगा। इन्द्रजित अपनी विजय का श्रेय लेकर लंका की ओर प्रस्थान करता है। यह सर्ग रामायण के महत्वपूर्ण मोड़ों में से एक है, जहाँ राम-लक्ष्मण पर संकट आता है और पाठकों के मन में उत्कंठा उत्पन्न होती है।

(इन्द्रजीत द्वारा राम-लक्ष्मण को नागपाश में बांधना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : युद्धकाण्ड के उन्नीसवें सर्ग में रावणपुत्र इन्द्रजित (मेघनाद) अपने अद्भुत युद्ध‑कौशल का परिचय देता है। वह राम और लक्ष्मण पर नागपाश नामक दिव्य अस्त्र का प्रयोग करता है, जिससे वे दोनों भाई सर्प‑रज्जुओं में जकड़कर मूर्छित हो जाते हैं। समस्त वानर‑सेना शोकसागर में डूब जाती है, किन्तु विभीषण उन्हें साहस बँधाते हैं।

⚡ इन्द्रजित का युद्ध और नागपाश का प्रयोग (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ।
इन्द्रजित् समरे क्रुद्धो राघवौ प्रति दुर्मदः ॥
स रथेन महाघोरेण धनुषा च महद्बलः ।
वानरान् व्याकुलान् कृत्वा रामलक्ष्मणयोर्युधि ॥
मुमोच नागपाशांस्तु दिव्यानस्त्रान् सुदारुणान् ।
यैर्बद्धौ तौ महात्मानौ रामलक्ष्मणौ रणे ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; प्रववृते = प्रारम्भ हुआ; युद्धम् = युद्ध; तुमुलम् = घोर; रोमहर्षणम् = रोमांचकारी; इन्द्रजित् = इन्द्रजित; समरे = युद्ध में; क्रुद्धः = क्रोधित; राघवौ = दोनों राघवों पर; प्रति = प्रति; दुर्मदः = दुर्मद; सः = वह; रथेन = रथ से; महाघोरेण = अत्यन्त भयंकर; धनुषा = धनुष से; च = और; महद्बलः = महान बलवान; वानरान् = वानरों को; व्याकुलान् = व्याकुल; कृत्वा = करके; रामलक्ष्मणयोः = राम-लक्ष्मण पर; युधि = युद्ध में; मुमोच = छोड़ा; नागपाशान् = नागपाशों को; तु = तो; दिव्यान् = दिव्य; अस्त्रान् = अस्त्रों को; सुदारुणान् = सुदारुण; यैः = जिनसे; बद्धौ = बाँध दिए गए; तौ = वे दोनों; महात्मानौ = महात्मा; रामलक्ष्मणौ = राम और लक्ष्मण; रणे = युद्ध में।
📖 भावार्थ : तब राम और लक्ष्मण के साथ इन्द्रजित का घोर रोमांचकारी युद्ध प्रारम्भ हुआ। क्रोधित होकर दुर्मद इन्द्रजित ने अपने भयंकर रथ और महान धनुष से वानरों को व्याकुल कर दिया। फिर उसने राम-लक्ष्मण पर दिव्य और सुदारुण नागपाश अस्त्र छोड़ दिए, जिनसे वे दोनों महात्मा युद्ध में जकड़ लिए गए।
॥ श्लोक ५-८ ॥
नागपाशैस्तदा बद्धौ पेततुर्धरणीतले ।
निश्चेष्टौ सहसा भूत्वा विसंज्ञौ रणमूर्धनि ॥
तौ दृष्ट्वा पतितौ भूमौ वानराः सर्व एव हि ।
विषादं परमं जग्मुर्निराशाः स्वस्ति राघवौ ॥
विभीषणस्तु तान् सर्वान् समाश्वास्य पुनः पुनः ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं न भेतव्यं कथंचन ॥
🔹 पदच्छेद : नागपाशैः = नागपाशों से; तदा = तब; बद्धौ = बंधे हुए; पेततुः = गिर पड़े; धरणीतले = भूमि पर; निश्चेष्टौ = चेष्टारहित; सहसा = अचानक; भूत्वा = होकर; विसंज्ञौ = मूर्छित; रणमूर्धनि = रणशिर पर; तौ = उन दोनों को; दृष्ट्वा = देखकर; पतितौ = गिरे हुए; भूमौ = भूमि पर; वानराः = वानर; सर्वे = सभी; एव = ही; हि = निश्चय ही; विषादम् = विषाद; परमम् = परम; जग्मुः = प्राप्त हुए; निराशाः = निराश; स्वस्ति = कल्याण के लिए; राघवौ = राघव; विभीषणः = विभीषण; तु = और; तान् = उन सबको; सर्वान् = सबको; समाश्वास्य = आश्वस्त करके; पुनः पुनः = बारंबार; उवाच = बोले; वचनम् = वचन; श्लक्ष्णम् = मधुर; न = नहीं; भेतव्यम् = डरना चाहिए; कथंचन = किसी भी प्रकार।
📖 भावार्थ : नागपाशों से बँधकर वे दोनों रणभूमि में अचेत होकर धरती पर गिर पड़े। उन्हें इस प्रकार गिरा देख सभी वानर अत्यन्त विषाद में डूब गए और राघवों के जीवन से निराश हो गए। किन्तु विभीषण ने उन सबको बार-बार आश्वस्त करते हुए मधुर वचन कहे, "किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिए।"
॥ श्लोक ९-१० ॥
नैतौ शक्यौ रणे हन्तुं दैवतैरपि संयुगे ।
नागपाशेन बद्धौ तु दैवयोगेन राघवौ ॥
अवश्यमेष नागेन्द्रः स्वयमेव भविष्यति ।
येनैतौ मोक्ष्यते वीरौ गरुत्मानिव पन्नगात् ॥
📖 भावार्थ : ये दोनों देवताओं के द्वारा भी युद्ध में मारे नहीं जा सकते। दैवयोग से ये नागपाश में बँधे हैं। निश्चय ही कोई नागेन्द्र (गरुड़) स्वयं आकर इन्हें मुक्त करेगा, जैसे गरुड़ सर्पों से मुक्त कराता है।

😢 वानरों का विलाप और विभीषण का सान्त्वना (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
हनूमान् सुग्रीवश्चैव जाम्बवान् च महाकपिः ।
नलनीलौ च तेजस्वी परिवार्य महारथौ ॥
तस्थुः परमसंत्रस्ता वेपमाना भयातुराः ।
न च किंचित्प्रजानन्ति शोकसंतापकर्शिताः ॥
ततो विभीषणो धीमान् समाश्वास्य वनौकसः ।
उवाच परमोदारं वचनं वानरान् प्रति ॥
📖 भावार्थ : हनूमान, सुग्रीव, जाम्बवान् और तेजस्वी नल-नील महारथी राम-लक्ष्मण को घेरकर खड़े हो गए। वे अत्यन्त भयभीत और काँपते हुए शोकसंताप से पीड़ित थे, कुछ भी सूझ नहीं पड़ रहा था। तब धीमान विभीषण ने सभी वानरों को आश्वस्त करके अत्यन्त उदार वचन कहे।
॥ श्लोक १६-२० ॥
न भेतव्यं भयत्रस्तैः कपीन्द्रा राघवौ प्रति ।
एतौ ह्यजेयौ संग्रामे सर्वैरपि सुरासुरैः ॥
क्षणेनैते समुत्तस्थुर्नागपाशाद्विमोक्षिताः ।
भविष्यति न संदेहो गरुडागमनं प्रति ॥
📖 भावार्थ : "कपीन्द्रो! भय से त्रस्त होने की आवश्यकता नहीं। ये दोनों राघव संग्राम में सब देवताओं और असुरों से भी अजेय हैं। क्षणभर में ही ये नागपाश से मुक्त होकर खड़े हो जाएँगे। गरुड़ के आगमन के विषय में कोई संदेह नहीं है।"

🏹 इन्द्रजित की विजय और लंका प्रत्यावर्तन (श्लोक २१-३५)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे विभीषणवचः श्रुताः ।
आश्वस्ता हृदये राजन् प्रतीक्षन्ते स्म राघवौ ॥
इन्द्रजित्तु रणे हृष्टो ज्वलयन्निव तेजसा ।
विजयं लब्ध्वा दुष्टात्मा ययौ लङ्कां प्रहर्षितः ॥
ततः सेना समग्रा सा राक्षसी भीमदर्शना ।
सिंहनादं विनाद्यैव प्रायात् पश्चान्महाबला ॥
दृष्ट्वा रामौ तथा बद्धौ राक्षसाश्च समन्ततः ।
प्रहर्षमतुलं लेभुर्जयोत्सवमिव स्थिताः ॥
📖 भावार्थ : तब सभी वानर विभीषण के वचन सुनकर आश्वस्त हुए और राघवों की प्रतीक्षा करने लगे। दूसरी ओर, दुष्टात्मा इन्द्रजित युद्ध में विजय पाकर अत्यन्त हर्षित होकर तेज से जलता हुआ सा लंका को लौट गया। उसके पीछे-पीछे भीमकाय राक्षसी सेना भी सिंहनाद करती हुई चली गई। राम-लक्ष्मण को इस प्रकार बँधा देख सब राक्षसों ने जैसे जयोत्सव में हो अत्यधिक हर्ष प्राप्त किया।
॥ श्लोक २६-३५ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरौ कपयः पर्यवारयन् ।
शोकसंतापसंयुक्ता न च शान्तिमुपागमन् ॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा पुनरेवाब्रवीदिदम् ।
धैर्यमालम्ब्य तिष्ठध्वं नाशुचिः परमं पदम् ॥
इत्युक्त्वा विररामाथ विभीषणो महामतिः ।
वानराश्चापि ते सर्वे प्रतीक्षन्ते स्म राघवौ ॥
इत्येष वाल्मीकिकृतौ युद्धकाण्डे महात्मनः ।
नागपाशाभिख्यातः सर्गः श्रीरामघातकः ॥
📖 भावार्थ : इसी बीच वीर कपियों ने राम-लक्ष्मण को घेर लिया, किन्तु शोक-संताप से युक्त होने के कारण उन्हें शान्ति नहीं मिल रही थी। धर्मात्मा विभीषण ने फिर कहा, "धैर्य धारण करो, यह अशुभ का समय नहीं है, परम पद की प्राप्ति होगी।" ऐसा कहकर महामति विभीषण रुक गए और सभी वानर राघवों की प्रतीक्षा करने लगे। इस प्रकार वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में यह नागपाशाख्य सर्ग पूरा हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌀 नागपाश का प्रतीकात्मक अर्थ

नागपाश केवल एक दिव्य अस्त्र नहीं, बल्कि माया, मोह एवं अज्ञान का प्रतीक है। राम-लक्ष्मण का इससे बँधना यह दर्शाता है कि भगवान भी लीला में माया से आविष्ट हो सकते हैं, किन्तु अपने भक्तों की पुकार पर वे तुरन्त मुक्त हो जाते हैं।

🛡️ विभीषण की भूमिका

विभीषण इस सर्ग में मार्गदर्शक और धैर्य के स्तम्भ बनकर उभरते हैं। उनका आश्वासन बताता है कि संकट काल में सच्चा मित्र ही सही मार्ग दिखाता है। उन्हें राम की अवध्यता का पूर्ण विश्वास है।

⚔️ इन्द्रजित का अहंकार

इन्द्रजित अपनी विजय पर मोहित होकर लंका लौटता है, यह उसके अहंकार की पराकाष्ठा है। उसे यह नहीं ज्ञात कि यह विजय केवल अस्थायी है और शीघ्र ही गरुड़ के आगमन से राम-लक्ष्मण मुक्त हो जाएँगे।

🌉 अगले सर्ग की भूमिका

यह सर्ग अगले सर्ग (२०) के लिए पृष्ठभूमि तैयार करता है, जिसमें गरुड़ के आगमन और नागपाश से मुक्ति का वर्णन होगा। यह रामकथा के रोमांच को बनाए रखता है।

🎯 शिक्षा : कभी-कभी धर्मात्मा भी संकट में पड़ जाते हैं, लेकिन उनका धैर्य और ईश्वर पर विश्वास ही उन्हें मुक्ति दिलाता है। सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति में भी साहस बँधाए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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