युद्ध काण्ड अध्याय 17

रावण का सेनापतियों को आदेश

रावण अपने समस्त सेनापतियों, राक्षसवीरों एवं योद्धाओं को युद्ध के लिए आदेश देता है। वह उन्हें राम-लक्ष्मण और वानर सेना का सामना करने के लिए प्रेरित करता है और कुम्भकर्ण को जगाने का भी आदेश देता है।

विवरण

विभीषण के परामर्श और वानर सेना के समुद्र पार करने के समाचार से क्रोधित एवं चिंतित रावण अपनी सारी सेना को युद्ध के लिए संगठित करने हेतु सेनापतियों को आदेश देता है। वह अपने महल के सिंहासन कक्ष में सभी प्रमुख राक्षस योद्धाओं—प्रहस्त, निकुम्भ, कुम्भ, धूम्राक्ष, दुर्मुख, महापार्श्व, अतिकाय, और विशेष रूप से इन्द्रजित को—बुलाता है और उनका उत्साहवर्धन करता है। रावण उन्हें वानरों की शक्ति की उपेक्षा न करने की चेतावनी देता है, किन्तु साथ ही उनके (राक्षसों के) अद्वितीय पराक्रम की याद दिलाता है। वह सेना को चतुरंगिणी रूप से सज्जित होकर नगर के द्वारों की रक्षा करने का आदेश देता है। सबसे महत्वपूर्ण बात, वह अपने शक्तिशाली भाई कुम्भकर्ण को उसकी निद्रा से जगाने का आदेश देता है, क्योंकि वह समझता है कि कुम्भकर्ण के बिना यह युद्ध जीतना कठिन होगा। यह सर्ग राक्षस सेना की युद्ध-तैयारियों और उनके भयानक उत्साह का चित्रण करता है।

(रावण का सेनापतियों को युद्ध-आदेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तदशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम-लक्ष्मण और विशाल वानर सेना के लंका की ओर बढ़ने के समाचार से रावण का मन क्रोध और चिंता से दोलायमान है। वह अपने समस्त बल की शक्ति को एकत्रित करने का निर्णय लेता है। यह सर्ग उसके युद्ध-आदेश और राक्षस सेना के उद्दाम उत्साह का वर्णन करता है, साथ ही उसके सबसे शक्तिशाली भाई कुम्भकर्ण के जागरण की आज्ञा भी देता है।

👑 रावण की युद्ध परिषद (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः समुद्रतीरे तु वानराणां महाचमूः ।
ददृशे रावणेनाशु चिन्तयानेन रक्षसा ॥
स दृष्ट्वा महतीं सेनां वानराणां तरस्विनाम् ।
उवाच परमक्रुद्धो राक्षसान् रावणस्तदा ॥
यथा वः कथितं पूर्वं बलं वानरयूथपाः ।
तथैवैते समायाताः समुद्रं लंघयिष्यतः ॥
तस्मात् सर्वे समानीताः ससैन्याः सपदानुगाः ।
युद्धायाभिमुखाः स्थातुं रामस्य सह वानरैः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; समुद्रतीरे = समुद्र के तट पर; तु = तो; वानराणाम् = वानरों की; महाचमूः = महान सेना; ददृशे = दिखाई दी; रावणेन = रावण को; आशु = शीघ्र; चिन्तयानेन = चिंता करते हुए; रक्षसा = राक्षस को; सः = उसने; दृष्ट्वा = देखकर; महतीम् = महान; सेनाम् = सेना; वानराणाम् = वानरों की; तरस्विनाम् = बलशाली; उवाच = बोला; परमक्रुद्धः = अत्यंत क्रोधित; राक्षसान् = राक्षसों से; रावणः = रावण; तदा = तब; यथा = जैसे; वः = तुमसे; कथितम् = कहा गया; पूर्वम् = पहले; बलम् = बल; वानरयूथपाः = वानरों के सेनापति; तथैव = वैसे ही; एते = ये; समायाताः = आ गए हैं; समुद्रम् = समुद्र; लंघयिष्यतः = पार करेंगे; तस्मात् = इसलिए; सर्वे = सभी; समानीताः = एकत्र करो; ससैन्याः = सेना सहित; सपदानुगाः = पदातियों सहित; युद्धाय = युद्ध के लिए; अभिमुखाः = सन्मुख; स्थातुम् = खड़े होने के लिए; रामस्य = राम के; सह = साथ; वानरैः = वानरों के।
📖 भावार्थ : उसके बाद, चिंताग्रस्त राक्षस रावण ने समुद्र के तट पर वानरों की उस विशाल सेना को देखा। उस महान और बलशाली वानरों की सेना को देखकर अत्यंत क्रोधित होकर रावण राक्षसों से बोला: "पहले मैंने तुमसे वानर सेनापतियों के बल का जैसा वर्णन किया था, वैसे ही ये समुद्र पार करने के लिए आ गए हैं। इसलिए तुम सब अपनी-अपनी समस्त सेना और पैदल सैनिकों को लेकर एकत्र हो जाओ, ताकि राम और वानरों के साथ युद्ध के लिए तैयार रहो।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
ते राक्षसाः समानीता रावणेन महात्मना ।
उत्पेतुः समरे शूराः सिंहा इव नदन्ति च ॥
प्रहस्तो निकुम्भश्च कुम्भश्चैव महाबलः ।
धूम्राक्षो दुर्मुखश्चैव महापार्श्वोऽतिकायकः ॥
इन्द्रजिच्च महातेजा रावणिः परवीरहा ।
एते चान्ये च बहवो राक्षसा भीमविक्रमाः ॥
आजग्मुः सहसा सर्वे रावणस्य निवेशनम् ।
रावणेन समादिष्टा युद्धायाभिमुखाः स्थिताः ॥
📖 भावार्थ : महात्मा रावण द्वारा बुलाए गए वे सभी शूरवीर राक्षस युद्ध के लिए उत्सुक होकर सिंहों की तरह गर्जना करने लगे। प्रहस्त, निकुम्भ, महाबली कुम्भ, धूम्राक्ष, दुर्मुख, महापार्श्व, अतिकाय, और परवीरहा महातेजस्वी रावणि इन्द्रजित—ये सभी तथा अन्य अनेक भीमविक्रमी राक्षस रावण की आज्ञा से तुरंत उसके निवास स्थान पर आ गए और युद्ध के लिए तैयार हो गए।

⚔️ सेनापतियों का उत्साह और रावण का संबोधन (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
ततः प्रहस्तः समरे वाक्यमाह महाबलः ।
अद्यैव तान् हनिष्यामि सरामान् सहलक्ष्मणान् ॥
निकुम्भस्त्वब्रवीद्वाक्यं प्रहस्य रजनीचरः ।
एकोऽहं निहनिष्यामि वानरान् सहराक्षसान् ॥
ततः कुम्भो महातेजा रावणं प्रत्यभाषत ।
अहं रामं वधिष्यामि सुग्रीवं च महाबलम् ॥
एवं ब्रुवति कुम्भे तु धूम्राक्षः प्रत्यभाषत ।
क्षिप्रमेव हनिष्यामि सर्वानेव वनौकसः ॥
दुर्मुखस्त्वब्रवीद्वाक्यं गर्जन् मेघ इवाम्भसः ।
लक्ष्मणं निहनिष्यामि रामं वा युधि दुर्जयम् ॥
महापार्श्वस्तदा राजन्नब्रवीद्राक्षसेश्वरम् ।
अहमेको हनिष्यामि वानरीं वाहिनीं महत् ॥
अतिकायस्ततो राजन् रावणं प्रत्यभाषत ।
निर्जिता मे पुरा देवा दानवाश्च महाबलाः ॥
किमु वानरमात्रेण रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
तमहं निहनिष्यामि सभ्रातृकं ससैन्यकम् ॥
📖 भावार्थ : तब महाबली प्रहस्त युद्ध के लिए कहने लगा: "आज ही मैं राम-लक्ष्मण सहित उन सबको मार डालूँगा।" उसके बाद राक्षस निकुम्भ ने हँसते हुए कहा: "मैं अकेला ही सब वानरों और राक्षसों को मार डालूँगा।" फिर महातेजस्वी कुम्भ ने रावण से कहा: "मैं राम और महाबली सुग्रीव को मारूँगा।" कुम्भ के ऐसा कहने पर धूम्राक्ष बोला: "मैं शीघ्र ही सब वानरों को मार डालूँगा।" तब दुर्मुख ने वर्षा के बादल के समान गरजकर वचन कहा: "मैं युद्ध में दुर्जय राम या लक्ष्मण को मारूँगा।" उसके बाद महापार्श्व ने राक्षसेश्वर से कहा: "मैं अकेला ही वानरों की उस महान सेना को मार डालूँगा।" तत्पश्चात अतिकाय ने रावण से कहा: "पहले मैंने देवताओं और महाबलशाली दानवों को जीत लिया था। फिर साधारण वानरमात्र राम की तो बात ही क्या है? मैं उसे उसके भाई और सेना सहित मार डालूँगा।"
॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततः प्रहस्य रावणः प्रोवाचेदं वचस्तदा ।
साधु साधु महाभागा युद्धेऽस्मिन् प्रतिभान्विताः ॥
न खल्ववज्ञा कर्तव्या वानरेषु बलीयसि ।
हनुमान् यत्र विक्रान्तो येन दग्धा पुरी मम ॥
तथापि युष्मद्वीर्येण विश्वस्तोऽस्मि परंतपाः ।
युद्ध्यध्वं सहिताः सर्वे रामेण सह वानरैः ॥
द्वाराणि चैव सर्वाणि लङ्कायाः सुसमाहिताः ।
रक्षध्वं बलमुख्यैश्च स्थापयध्वं समन्ततः ॥
अहमप्यचिरात् तात कुम्भकर्णं महाबलम् ।
बोधयिष्यामि संप्राप्ते काले युद्धाय राक्षसम् ॥
📖 भावार्थ : तब रावण ने हँसकर यह वचन कहा: "शाबाश, शाबाश! हे महाभागो, तुम सब इस युद्ध में पराक्रम दिखाने वाले हो। किन्तु बलशाली वानरों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, क्योंकि हनुमान ने जहाँ पराक्रम दिखाया और मेरी पुरी जला दी। तो भी हे परंतपो! मैं तुम्हारे वीर्य से विश्वस्त हूँ। तुम सब मिलकर राम और वानरों से युद्ध करो। और लंका के सभी द्वारों की बड़ी सावधानी से रक्षा करो, तथा मुख्य बलों को चारों ओर तैनात कर दो। हे तात! मैं भी अब शीघ्र ही महाबली राक्षस कुम्भकर्ण को, जो युद्ध के लिए उपयुक्त समय आ गया है, जगाने की व्यवस्था करूँगा।"

🛡️ राक्षस सेना की तैनाती (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा ते सर्वे राक्षसोत्तमाः ।
निर्ययुर्नगरात् तूर्णं युद्धाय मतिमन्तः ते ॥
प्रहस्तं चाग्रतः कृत्वा बलस्य महतीं चमूम् ।
द्वाराणि रुरुधुः सर्वे सैन्यैर्बहुभिरावृताः ॥
पूर्वद्वारं समाश्रित्य प्रहस्तो व्यरुचद्बली ।
दक्षिणद्वारमासाद्य महापार्श्वो महाबलः ॥
पश्चिमद्वारमासाद्य इन्द्रजित् समवस्थितः ।
उत्तरद्वारमासाद्य कुम्भकर्णः प्रतापवान् ॥
बोधितः स्वप्ननाशाय कुम्भकर्णो महाबलः ।
राक्षसैः परिवार्याथ स्थितो युद्धाय दुर्मदः ॥
📖 भावार्थ : रावण के वचन सुनकर वे सभी श्रेष्ठ राक्षस, बुद्धिमान होकर, युद्ध के लिए तुरंत नगर से निकल पड़े। प्रहस्त को सेना के अग्रभाग में रखकर, उन्होंने अपनी महान सेनाओं से लंका के सभी द्वारों को घेर लिया। बलशाली प्रहस्त ने पूर्वी द्वार की रक्षा की। महाबली महापार्श्व ने दक्षिणी द्वार को संभाला। पश्चिमी द्वार पर इन्द्रजित तैनात हुआ। और उत्तरी द्वार पर प्रतापी कुम्भकर्ण को जगाकर खड़ा किया गया। निद्रा से जागृत किए गए महाबली कुम्भकर्ण को राक्षसों ने घेर लिया और वह दुर्मद युद्ध के लिए तैयार खड़ा हो गया।
॥ श्लोक ३३-३८ ॥
एवं ते राक्षसाः सर्वे व्यूढ़ोरस्का महाबलाः ।
अतिष्ठन् समरे राजन् हर्षयुक्ताः प्रहारिणः ॥
शङ्खदुन्दुभिनादाश्च प्रणेदुः सर्वतो दिशि ।
सिंहनादाश्च रक्षसां वानराणां भयंकराः ॥
ततो युद्धं समभवद् रामरावणयोर्महत् ।
राक्षसानां च वीराणां वानराणां च गर्जताम् ॥
इत्येष सप्तदशः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
रावणेन समादेशो दत्तो युद्धाय रक्षसाम् ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार वे सभी राक्षस, विशाल वक्षःस्थल वाले, महाबली, हर्षित और प्रहार करने वाले, युद्ध में डट गए। चारों दिशाओं में शंख और दुन्दुभियों के नाद गूंज उठे, और राक्षसों के सिंहनाद वानरों के लिए भयंकर हो रहे थे। तत्पश्चात, गर्जना करते हुए वीर राक्षसों और वानरों के बीच, राम और रावण का वह महान युद्ध आरम्भ हुआ। इस प्रकार यह युद्धकाण्ड का रोचक सत्रहवाँ सर्ग है, जिसमें रावण ने राक्षसों को युद्ध के लिए आदेश दिया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 नेतृत्व और संगठन

यह सर्ग रावण के एक कुशल सेनानायक होने को दर्शाता है। वह अपने सेनापतियों का उत्साहवर्धन करता है, उन्हें सचेत करता है, और रणनीतिक रूप से सेना की तैनाती का आदेश देता है।

💡 अहंकार का प्रदर्शन

प्रहस्त, निकुम्भ, अतिकाय आदि राक्षसों के वचन उनके अहंकार और राम के पराक्रम को कम आंकने को दर्शाते हैं, जो आगे चलकर उनके विनाश का कारण बनता है।

🧠 रावण की दूरदर्शिता

रावण वानरों की उपेक्षा न करने की चेतावनी देकर और कुम्भकर्ण को जगाने का आदेश देकर अपनी दूरदर्शिता और युद्ध के प्रति गंभीरता को दर्शाता है। वह जानता है कि हनुमान जैसा वीर जिस सेना का हिस्सा है, उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

🌊 आगामी युद्ध का मंचन

यह सर्ग युद्ध की भौतिक पृष्ठभूमि तैयार करता है। चारों द्वारों पर सेना की तैनाती और कुम्भकर्ण के जागरण का आदेश आगामी सर्गों में होने वाले भीषण संग्राम की नींव रखता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से शिक्षा मिलती है कि युद्ध या किसी भी बड़े संकट के समय एकजुट होना, सही रणनीति बनाना और अपने सबसे शक्तिशाली संसाधनों (जैसे कुम्भकर्ण) को सही समय पर उपयोग में लाना अत्यंत आवश्यक है। रावण ने सैन्य दृष्टि से उचित कदम उठाया, किन्तु नैतिक रूप से वह अधर्म के पक्ष में था।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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