युद्ध काण्ड अध्याय 16

राम-रावण युद्ध का प्रथम दिन

राम और रावण की सेनाओं के बीच भीषण युद्ध प्रारम्भ होता है। प्रथम दिन दोनों पक्षों के महारथी आमने-सामने होते हैं और राम-रावण के बीच घोर संग्राम होता है। सूर्यास्त तक युद्ध अनिर्णीत रहता है और दोनों सेनाएँ विश्राम के लिए लौट जाती हैं।

विवरण

सेतुबन्धन के पश्चात राम की वानर सेना लंका में प्रवेश करती है और लंका के समीप शिबिर स्थापित करती है। रावण अपनी सेना सहित नगर से बाहर निकलता है। दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हो जाती हैं। युद्ध की शुरुआत वानरों और राक्षसों के मध्य भयंकर घमासान से होती है। अंगद, हनुमान, नील, जाम्बवान आदि वीर राक्षसों से भिड़ते हैं। रावण स्वयं रणभूमि में आता है और राम से उसका घोर युद्ध होता है। दोनों एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा करते हैं। सूर्यास्त होने पर परम्परानुसार युद्धविराम होता है और दोनों सेनाएँ अपने-अपने शिबिरों को लौट जाती हैं। यह सर्ग आगामी दिनों के भीषण युद्ध की भूमिका तैयार करता है।

(राम-रावण युद्ध का प्रथम दिन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षोडशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सेतुबन्धन के पश्चात राम की वानर सेना लंका में प्रवेश कर चुकी है। रावण अपनी विशाल राक्षस सेना के साथ युद्ध के लिए नगर से बाहर निकलता है। यह सर्ग दोनों महाशक्तियों के बीच हुए प्रथम दिन के भीषण युद्ध का वर्णन करता है।

🏹 सेनाओं का सम्मेलन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः प्रभाते विमले राघवः सहलक्ष्मणः ।
ददर्श परमोदारं राक्षसानां महद्बलम् ॥ १॥

तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सुग्रीवः प्लवगेश्वरः ।
चकार सैन्यसंनाहं युद्धाय समुपस्थितः ॥ २॥

रावणोऽपि महातेजाः सर्वै रक्षःपरिग्रहः ।
निर्ययौ नगरात् तूर्णं गृहीत्वा विविधायुधम् ॥ ३॥

उभे सेने समागम्य युद्धाय कृतनिश्चये ।
अन्योन्यमभिगर्जन्त्यः सिंहवत् प्रत्यदृश्यत ॥ ४॥

ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ।
वानराणां च रक्षांसि निघ्नतां परस्परम् ॥ ५॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रातःकाल में; विमले = स्वच्छ; राघवः = राम; सहलक्ष्मणः = लक्ष्मण के साथ; ददर्श = देखा; परमोदारम् = अत्यन्त विशाल; राक्षसानाम् = राक्षसों का; महत् = महान; बलम् = बल; तत् = उसको; दृष्ट्वा = देखकर; महदाश्चर्यम् = अत्यन्त आश्चर्यकर; सुग्रीवः = सुग्रीव; प्लवगेश्वरः = वानरराज; चकार = किया; सैन्यसंनाहम् = सेना को सुसज्जित; युद्धाय = युद्ध के लिए; समुपस्थितः = उपस्थित; रावणः = रावण; अपि = भी; महातेजाः = महान तेजस्वी; सर्वैः = सब; रक्षःपरिग्रहः = राक्षसों से घिरा हुआ; निर्ययौ = निकला; नगरात् = नगर से; तूर्णम् = शीघ्र; गृहीत्वा = ग्रहण कर; विविधायुधम् = अनेकों अस्त्र-शस्त्र; उभे = दोनों; सेने = सेनाएँ; समागम्य = मिलकर; युद्धाय = युद्ध के लिए; कृतनिश्चये = निश्चय किये हुए; अन्योन्यम् = परस्पर; अभिगर्जन्त्यः = गरजती हुई; सिंहवत् = सिंह के समान; प्रत्यदृश्यत = दिखाई दीं; ततः = तब; प्रववृते = प्रारम्भ हुआ; युद्धम् = युद्ध; तुमुलम् = कोलाहलपूर्ण; रोमहर्षणम् = रोमांचकारी; वानराणाम् = वानरों का; च = और; रक्षांसि = राक्षस; निघ्नताम् = मारते हुए; परस्परम् = आपस में।
📖 भावार्थ : उसके बाद स्वच्छ प्रभात में राम ने लक्ष्मण के साथ राक्षसों की अत्यन्त विशाल सेना को देखा। उस महान आश्चर्य को देखकर वानरराज सुग्रीव ने युद्ध के लिए सेना को सुसज्जित किया। महातेजस्वी रावण भी सब राक्षसों से घिरा हुआ अनेक अस्त्र-शस्त्र लेकर शीघ्र ही नगर से बाहर निकला। युद्ध के लिए कृतनिश्चय दोनों सेनाएँ परस्पर गरजती हुई सिंह के समान आमने-सामने खड़ी हो गईं। तब वानर और राक्षस आपस में एक-दूसरे को मारते हुए उस कोलाहलपूर्ण रोमांचकारी युद्ध का प्रारम्भ हुआ।
॥ श्लोक ६-१० ॥
शङ्खदुन्दुभिनादाश्च भेरीपणवगोमुखाः ।
प्रावाद्यन्त महानादा राक्षसानां हरीष्वपि ॥ ६॥

सिंहनादो हरीणां च राक्षसानां च गर्जितम् ।
सम्मिलित्वा महाघोरं बभूव तुमुलं महत् ॥ ७॥

रजश्च समुदध्वस्तं सध्वजं धनुषां ध्वनिः ।
शराणां पततां चैव शुश्रुवे तत्र निस्वनः ॥ ८॥

वानराः पादपान् गृह्य राक्षसाश्च शिलायुधाः ।
अन्योन्यमभिजघ्नुस्ते युद्धोत्सुका महाबलाः ॥ ९॥

रामस्तु राक्षसान् हन्तुं लक्ष्मणश्च महाबलः ।
प्रवृत्तौ संयुगे घोरे त्रासयन्तौ निशाचरान् ॥ १०॥
📖 भावार्थ : शंख, दुन्दुभि, भेरी, पणव और गोमुख आदि वाद्यों के महान् नाद राक्षसों और वानरों दोनों ओर से बजने लगे। वानरों के सिंहनाद और राक्षसों की गर्जना मिलकर अत्यन्त घोर कोलाहल उत्पन्न कर रहे थे। धूलि उड़ रही थी, ध्वजाएँ फहरा रही थीं, धनुषों की टंकार और गिरते हुए बाणों का शब्द सुनाई दे रहा था। वानर वृक्षों को लेकर और राक्षस शिलाओं को अस्त्र बनाकर, युद्धोत्सुक होकर परस्पर भिड़ गए। राम और महाबली लक्ष्मण उस घोर युद्ध में निशाचरों को भयभीत करते हुए राक्षसों का संहार करने लगे।

⚔️ युद्ध का आरम्भ (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
हनूमान् राक्षसेन्द्रेण रावणेन महात्मना ।
युयुधे सुमहावीर्यः शरवर्षैरवारितः ॥ ११॥

अङ्गदश्च महातेजा विरूपाक्षेण संयुगे ।
युयुधे बलवान् वीरो नदन् सिंह इवोन्नदन् ॥ १२॥

जाम्बवान् पर्वताकारः प्रहस्तेन बलीयसा ।
गदाहस्तेन संरब्धो युयुधे भीमविक्रमः ॥ १३॥

नीलश्च राक्षसं शूरं निकुम्भं प्रति संयुगे ।
अभिदुद्राव वेगेन वानरेन्द्रो महाबलः ॥ १४॥

एवं सर्वे महावीर्या वानरा राक्षसैः सह ।
युयुधुः समरे वीरा भीरूणां भयवर्धनाः ॥ १५॥
📖 भावार्थ : महावीर्य हनुमान महात्मा राक्षसेन्द्र रावण के साथ अविरत बाण वर्षा करते हुए युद्ध करने लगे। महातेजस्वी बलवान् वीर अङ्गद सिंह के समान नाद करते हुए विरूपाक्ष से जा भिड़े। पर्वत के समान विशाल जाम्बवान गदा हाथ में लिए बलशाली प्रहस्त के साथ संरब्ध होकर युद्ध करने लगे। महाबली वानरेन्द्र नील वेग से शूरवीर राक्षस निकुम्भ पर टूट पड़े। इस प्रकार सभी महावीर वानर राक्षसों के साथ समर में युद्ध करने लगे, जो डरपोकों के लिए भय बढ़ाने वाला था।
॥ श्लोक १६-२० ॥
सुग्रीवस्तु ततः क्रुद्धो रावणिं प्रति संयुगे ।
अभ्यधावत वेगेन गिरिं पर्वतसारवत् ॥ १६॥

रावणिस्तु महावीर्यो धनुष्पाणिः प्रतापवान् ।
सुग्रीवं सायकैस्तीक्ष्णैर्विव्याध हृदि संयुगे ॥ १७॥

लक्ष्मणस्तु ततो दृष्ट्वा सुग्रीवं रुधिरोक्षितम् ।
अभ्यधावत संक्रुद्धो राक्षसं प्रति संयुगे ॥ १८॥

ततो युद्धं समभवत् तुमुलं रोमहर्षणम् ।
लक्ष्मणस्य च रक्षश्च रावणेः सुमहात्मनः ॥ १९॥

तयोरासीत् सुसंरब्धं युद्धं चित्रं सुदारुणम् ।
दिवि देवाः समागम्य द्रष्टुं तदद्भुतं महत् ॥ २०॥
📖 भावार्थ : तब क्रुद्ध सुग्रीव युद्ध में रावणि (इन्द्रजित) की ओर पर्वत के समान वेग से दौड़ा। महावीर्य प्रतापवान् रावणि ने धनुष उठाकर तीक्ष्ण बाणों से सुग्रीव के हृदय में वार किया। लक्ष्मण ने सुग्रीव को रुधिर से लथपथ देखकर क्रोध में आकर उस राक्षस की ओर दौड़े। तब लक्ष्मण और महात्मा रावणि के बीच रोमांचकारी युद्ध छिड़ गया। दोनों में अत्यन्त उग्र, विचित्र एवं घोर युद्ध हुआ। उस अद्भुत युद्ध को देखने के लिए देवता लोग आकाश में एकत्र हो गए।

🔥 राम-रावण द्वंद्व युद्ध (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततो रावणमायान्तं दृष्ट्वा रामो महारथः ।
प्रत्यगृह्णाच्छरव्रातैः सिंहः करिणमोजसा ॥ २१॥

रावणोऽपि महातेजा रामं क्रोधसमन्वितः ।
विव्याध निशितैर्बाणैः सर्वगात्रेषु राघवम् ॥ २२॥

तयोरासीत् सुसंरब्धं युद्धं देवासुरोपमम् ।
शरवर्षैः प्रकाशद्भिः सूर्यरश्मिभिरावृतम् ॥ २३॥

रामः क्रोधसमाविष्टो रावणस्य धनुर्महत् ।
चिच्छेद निशितैर्बाणैर्मध्ये युद्धस्य संयुगे ॥ २४॥

अथान्यद्धनुरादाय रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।
रामं विव्याध सप्तत्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ २५॥
📖 भावार्थ : तब आते हुए रावण को देख महारथी राम ने उसे बाण-समूहों से रोका, जैसे सिंह हाथी को रोकता है। महातेजस्वी रावण ने भी क्रोध में आकर राघव के समस्त अंगों में तीक्ष्ण बाणों से प्रहार किया। दोनों का देवासुर-सदृश भयंकर युद्ध हुआ, जो बाण-वर्षा से सूर्य की किरणों से आच्छादित हो गया। राम ने क्रोधित होकर युद्ध के बीच में ही रावण के महान धनुष को तीक्ष्ण बाणों से काट डाला। तब रावण ने क्रोध से व्याकुल होकर दूसरा धनुष उठाया और राम को सत्तर नतपर्वा बाणों से बींध डाला।
॥ श्लोक २६-३० ॥
रामस्तु सहसा क्रुद्धो रावणं प्रति संयुगे ।
शरैः सहस्रशो वीरो ववर्ष शतशोऽपि च ॥ २६॥

रावणो रामबाणौघैर्विद्धः सर्वत्र पीडितः ।
विस्मयं परमं जगाम बलं दृष्ट्वा च राघवे ॥ २७॥

ततो रामः सुसंक्रुद्धो रावणं प्रति वीर्यवान् ।
शरेण हृदये विद्ध्वा व्यथयामास राक्षसम् ॥ २८॥

रावणो रामबाणेन भृशं विद्धो व्यथाकुलः ।
तस्थौ किञ्चिन्न चेष्टन्त रथोपस्थे महाबलः ॥ २९॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
राघवस्य बलं दृष्ट्वा साधु साध्विति चाब्रुवन् ॥ ३०॥
📖 भावार्थ : तब क्रुद्ध वीर राम ने सहसा युद्ध में रावण पर सैकड़ों-हजारों बाणों की वर्षा कर दी। राम के बाण-समूहों से सब ओर से पीड़ित रावण ने राघव के बल को देखकर परम विस्मय प्राप्त किया। फिर अत्यन्त क्रोधित वीर्यवान् राम ने रावण के हृदय में बाण मारकर उसे व्यथित कर दिया। राम के बाण से अत्यधिक पीड़ित व्यथित रावण कुछ समय के लिए रथ पर चेष्टाहीन होकर खड़ा रह गया। तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और परमर्षि राघव का बल देखकर साधु-साधु कहकर प्रशंसा करने लगे।

🌅 दिन का अन्त (श्लोक ३१-३५)

॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ततः सूर्यः परिश्रान्तः पश्चिमां दिशमागतः ।
युद्धं च विरतं तत्र सन्ध्याकाल उपस्थिते ॥ ३१॥

रामः सौमित्रिणा सार्धं वानरैश्च समागतः ।
शिविराय न्यवर्तन्त राक्षसाश्च निशाचराः ॥ ३२॥

प्रहृष्टमनसो वीराः परस्परं प्रशंसितुः ।
दिने युद्धं प्रशंसन्तो रामरावणयोर्मृधे ॥ ३३॥

निवृत्ते तु तदा युद्धे रावणो नगरं ययौ ।
रामोऽपि सहसुग्रीवः शिविरे सुखमावसत् ॥ ३४॥

इत्येष षोडशः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
प्रथमे दिवसे युद्धं रामरावणयोरभूत् ॥ ३५॥
📖 भावार्थ : तब थके हुए सूर्य पश्चिम दिशा में चले गए और संध्याकाल उपस्थित होते ही युद्ध बन्द हो गया। राम सौमित्रि और वानरों के साथ शिविर की ओर लौट गए, तथा राक्षस भी नगर को लौट गए। वीरगण हर्षित मन से दिनभर के युद्ध में राम और रावण के पराक्रम की परस्पर प्रशंसा करने लगे। युद्ध समाप्त होने पर रावण नगर को चला गया और राम सुग्रीव सहित शिविर में सुखपूर्वक रहे। इस प्रकार यह युद्धकाण्ड का रोचक सोलहवाँ सर्ग है, जिसमें राम और रावण के बीच प्रथम दिन का युद्ध हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राम का युद्ध कौशल

इस सर्ग में राम के अद्वितीय रण-कौशल का प्रदर्शन है। वे अकेले ही रावण जैसे महारथी को विचलित कर देते हैं। देवता भी उनकी वीरता की सराहना करते हैं।

💡 रावण का अहंकार

रावण युद्ध में राम के प्रभाव को देखकर भी अपने अहंकार के कारण युद्ध जारी रखता है। उसका विस्मय होना यह दर्शाता है कि उसे अपनी पराजय का आभास होने लगता है।

🧠 वानर-राक्षस संग्राम

विभिन्न वानरवीरों का उनके प्रतिद्वंद्वी राक्षसों से मुकाबला दर्शाया गया है, जो युद्ध की वैश्विक प्रकृति को उजागर करता है।

🌅 युद्ध-विराम की परम्परा

सूर्यास्त के साथ युद्ध रोकने की परम्परा प्राचीन भारतीय युद्धनीति का पालन करती है। यह धर्मयुद्ध के नियमों को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि धर्म के पक्ष में लड़ने वाला योद्धा चाहे अकेला हो, उसे दैवी सहायता प्राप्त होती है। सत्य और साहस से हर विषम परिस्थिति का सामना किया जा सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षोडशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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