युद्ध प्रारंभ
युद्ध का आरम्भ होता है। राम और रावण की सेनाएँ आमने-सामने होती हैं। प्रथम दिवस के युद्ध में भीषण संग्राम होता है।
विवरण
प्रभु श्रीराम की सेना ने समुद्र पार कर लंका में प्रवेश किया। रावण भी अपनी विशाल राक्षस सेना लेकर युद्ध के लिए तैयार हुआ। दोनों सेनाओं के मध्य घोर युद्ध छिड़ गया। वानरों ने वृक्षों और पर्वतों को उखाड़कर राक्षसों पर प्रहार किया। राक्षसों ने अस्त्र-शस्त्रों से वानरों का मुकाबला किया। इस सर्ग में युद्ध के प्रारम्भिक क्षणों का वर्णन है, जिसमें दोनों ओर के वीरों ने अपनी-अपनी वीरता का प्रदर्शन किया।
(युद्ध प्रारंभ)
🔆 प्रस्तावना : सेतुबन्धन के पश्चात श्रीराम की विशाल वानर सेना लंका में प्रवेश कर चुकी है। रावण भी अपनी राक्षस सेना के साथ युद्ध के लिए तत्पर है। इस सर्ग में दोनों महाशक्तियों के बीच प्रथम संग्राम का रोमांचक वर्णन है।
🏹 सेनाओं का संयोजन और आमना-सामना (श्लोक १-१०)
ददर्श राक्षसीं सेनां युद्धाय समुपस्थिताम् ॥
सुग्रीवः सह वानरैः पर्वताकाररूपिभिः ।
नर्दमानैर्महानादैः सिंहनादैस्तरस्विभिः ॥
रावणोऽपि महातेजाः सेनां व्यूह्य महाबलः ।
स्थितः संग्रामशिरसि मन्त्रिभिः परिवारितः ॥
उभे सेने समागत्य युद्धाय कृतनिश्चये ।
अन्योन्यमभिसंरब्धे जिघांसन्ते परस्परम् ॥
वानराणां च रक्षसां च परस्परजयैषिणाम् ॥
पादपैः पर्वताग्रैश्च चिक्षिपुर्वानरर्षभाः ।
राक्षसास्तु शितैर्बाणैः शक्तिभिश्च परश्वधैः ॥
नदन्तः सिंहनादांश्च वानरा रणमूर्धनि ।
प्लवमानाः समन्ताच्च राक्षसानभिदुद्रुवुः ॥
राक्षसाश्च महावीर्याः खड्गचर्मधरा दृढाः ।
वानरान् समसज्जन्त युद्धे क्रोधसमन्विताः ॥
⚡ प्रथम संग्राम और वीरों के पराक्रम (श्लोक ११-२५)
पोथयामास दुर्धर्षः सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥
अंगदो गदया राजन् जघान बहुराक्षसान् ।
नीलो नलश्च विक्रम्य राक्षसानां वरूथिनीम् ॥
सुग्रीवस्तु महातेजा वृक्षैः संपोथ्य राक्षसान् ।
चुक्रोश बलवान् नादं वासवो वृत्रहा यथा ॥
रावणस्य सुतो वीर इन्द्रजित् समितिंजयः ।
वानरान् शरवर्षेण वर्षयामास वीर्यवान् ॥
अन्योन्यं तर्जयन्तां च नर्दतां च मुहुर्मुहुः ॥
शोणितोदा नदी घोरा प्रवर्तिता रणाङ्गणे ।
गजाश्वरथकलेवैः संवृता रोमहर्षिणी ॥
सूर्योऽपि तत्र न प्रातिच्छाया रजसा वृतः ।
उड्डीयमानैः शैलैश्च वानरैः पर्वतैरपि ॥
रामस्तु धनुरायम्य संरब्धो युद्धदुर्मदः ।
व्यदारयत् संघशो राक्षसान् रघुनन्दनः ॥
🌟 श्रीराम का युद्ध में प्रवेश (श्लोक २६-३८)
नाशक्नुवन् स्थितुं युद्धे तेजसा तस्य धीमतः ॥
लक्ष्मणोऽपि महातेजाः शरैः संनतपर्वभिः ।
जघान राक्षसान् कोपादिन्द्रजित्प्रमुखान् रणे ॥
एवं युद्धे प्रवृत्ते तु रामरावणयोर्मृधे ।
सन्ध्या प्रादुर्बभूवाथ दिवसः पर्यहीयत ॥
ततः संध्यामुपागम्य युद्धं विरमतां वरौ ।
रामरावणयो राजन् विस्मयं परमं गतौ ॥
इत्येष पञ्चदशः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
रामरावणयोर्युद्धप्रारम्भकथनं शुभम् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
⚔️ युद्ध की दारुणता
इस सर्ग में वर्णित प्रथम संग्राम युद्ध की भयावहता को दर्शाता है। दोनों ओर के वीर अद्वितीय पराक्रम दिखाते हैं।
👑 राम का पराक्रम
राम के रणभूमि में प्रवेश करते ही राक्षस सेना में हाहाकार मच जाता है, जो उनकी दिव्य शक्ति का सूचक है।
🧠 युद्ध नीति
सेनाओं के व्यूहरचना और आक्रमण-प्रत्याक्रमण से प्राचीन युद्धकला की झलक मिलती है।
🌅 सन्ध्या का महत्त्व
सन्ध्या होने पर युद्ध का विराम धर्मयुद्ध के नियमों का पालन दर्शाता है।
🎯 शिक्षा : युद्ध के प्रारम्भ से ही राम की विजय सुनिश्चित दिखती है। राक्षसों के अत्याचारों का अन्त और धर्म की स्थापना का यह प्रथम चरण है।