युद्ध काण्ड अध्याय 13

अंगद द्वारा रावण को समझाना और रावण का क्रोध

राम के दूत के रूप में अंगद लंका की सभा में जाते हैं और रावण को समझाने का प्रयास करते हैं। वह रावण को युद्ध के परिणामों से अवगत कराते हैं और सीता को लौटाने की सलाह देते हैं। रावण क्रोधित होकर अंगद को मारने का आदेश देता है, जिससे विभीषण उसे रोकते हैं।

विवरण

राम-लक्ष्मण और वानर सेना के समुद्र पार कर लंका की ओर बढ़ने के बाद, राम अपने दूत के रूप में अंगद को रावण के पास भेजते हैं। अंगद लंका की सभा में जाते हैं और वीरतापूर्वक रावण को समझाते हैं। वह राम की शक्ति, वानरों के पराक्रम और युद्ध में होने वाले विनाश का वर्णन करते हैं। अंगद रावण को अंतिम अवसर देते हुए सीता को सम्मानपूर्वक लौटाने की सलाह देते हैं। रावण के क्रोधित होने और उसे बंदी बनाने का आदेश देने पर, अंगद अपनी अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन करते हुए सभा में ही अपनी अमरता और शक्ति का परिचय देते हैं। विभीषण के हस्तक्षेप के बाद अंगद सकुशल लौट जाते हैं। यह सर्ग राम की कूटनीति और अंगद के साहस को दर्शाता है।

(अंगद द्वारा रावण को समझाना और रावण का क्रोध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोदशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम की आज्ञा से वानरराज वालि के पराक्रमी पुत्र अंगद, रावण के दरबार में दूत बनकर पहुँचते हैं। यह सर्ग उस ऐतिहासिक क्षण का वर्णन करता है जब एक बाल वानर अपनी वीरता और बुद्धि से राक्षसराज की सभा में भय का संचार कर देता है।

🏛️ अंगद का लंका सभा में प्रवेश (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
रामदूतः स धर्मात्मा लंकामभिमुखो ययौ ।
सभां प्रविश्य वीरः स रावणं समुपस्थितः ॥
दृष्ट्वा राक्षसराजं तं दीप्तमानमिवौजसा ।
न विव्यथे महातेजा अङ्गदो वालिनन्दनः ॥
उवाच च महाबाहुः श्लक्ष्णया वाचयानया ।
रावणं संशितात्मानं रामदूतो महाबलः ॥
🔹 पदच्छेद : रामदूतः = राम का दूत; सः = वह; धर्मात्मा = धर्मात्मा; लंकाम् = लंका को; अभिमुखः = सामने; ययौ = गया; सभाम् = सभा में; प्रविश्य = प्रवेश करके; वीरः = वीर; सः = वह; रावणम् = रावण के; समुपस्थितः = समीप उपस्थित हुआ; दृष्ट्वा = देखकर; राक्षसराजम् = राक्षसराज को; तम् = उसे; दीप्तमानम् = प्रकाशमान; इव = जैसे; ओजसा = तेज से; न विव्यथे = विचलित नहीं हुआ; महातेजाः = महान तेजस्वी; अङ्गदः = अंगद; वालिनन्दनः = वालि का पुत्र; उवाच च = और बोले; महाबाहुः = महाबाहु; श्लक्ष्णया = कोमल; वाचा = वाणी से; यानया = इस प्रकार; रावणम् = रावण से; संशितात्मानम् = दृढ़ प्रतिज्ञ; रामदूतः = राम का दूत; महाबलः = महान बलवान।
📖 भावार्थ : राम के धर्मात्मा दूत (अंगद) लंका की ओर गए। सभा में प्रवेश कर वह वीर रावण के समक्ष उपस्थित हुए। अपने तेज से दीप्त राक्षसराज को देखकर भी महातेजस्वी वालि-पुत्र अंगद विचलित नहीं हुए। महाबली महाबाहु अंगद ने राम के दूत के रूप में दृढ़प्रतिज्ञ रावण से कोमल वाणी में कहा।
॥ श्लोक ५-८ ॥
राजन् रामेण सन्दिष्टः कौशल्यानन्दवर्धनः ।
त्वां ब्रवीति सुखासीनं सुग्रीवसहितो बली ॥
धर्मार्थसहितं वाक्यं हितं त्वां प्रति राक्षस ।
श्रूयतामव्यथीकुर्वन् यद् ब्रवीमि तवानघ ॥
दिष्ट्या वर्धसि दुर्बुद्धे यो मां मन्यसि राक्षस ।
रामदूतमनुप्राप्तं न च मां वेत्सि रावण ॥
📖 भावार्थ : "राजन्! कौशल्या के आनन्दवर्धक पुत्र राम ने मुझे भेजा है। वह बलशाली सुग्रीव के साथ तुमसे कहते हैं: हे राक्षस! सुखपूर्वक बैठे तुम्हारे लिए धर्म और अर्थ से युक्त यह हितकारी वाक्य बिना व्यथित हुए सुनो। हे निष्पाप! हे दुर्बुद्धि राक्षस! तुम अपने सौभाग्य से बढ़ रहे हो जो राम के दूत के रूप में आए मुझे पहचान नहीं रहे हो।"

⚖️ धर्म का उपदेश और अंतिम चेतावनी (श्लोक ९-१५)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
रामः श्रीमान् महातेजा दाशरथिररिन्दमः ।
त्वां ब्रवीति सखे भ्रात्रा लक्ष्मणेन समन्वितः ॥
वानरेन्द्रेण सुग्रीवेन सर्वैश्च वनचारिभिः ।
दत्तां भार्यां महाभागां सीतां जनकनन्दिनीम् ॥
अद्यैव मे प्रयच्छ त्वं मा त्वा युद्धे वधिष्यति ।
एतत् ते राजसारं हि वाक्यं सत्योपबृंहितम् ॥
📖 भावार्थ : "श्रीमान् महातेजस्वी, दशरथ-पुत्र, अरिन्दम राम तुमसे कहते हैं, लक्ष्मण, वानरेन्द्र सुग्रीव और समस्त वनचारियों के साथ मिलकर कहते हैं कि जो महाभागा जनक-नन्दिनी सीता, मेरी भार्या हैं, उन्हें आज ही मुझे लौटा दो। अन्यथा मैं युद्ध में तुम्हें मार डालूँगा। यह राजसार वचन सत्य से परिपूर्ण है।"
॥ श्लोक १३-१५ ॥
अथवा यदि ते बुद्धिर्न धर्मे राक्षसेश्वर ।
वर्तते मोहमास्थाय ततः शृणु वचो मम ॥
द्रक्ष्यसि त्वं रणे रामं वैश्वानरमिव ज्वलम् ।
लक्ष्मणं च महात्मानं वानरांश्च महाबलान् ॥
📖 भावार्थ : "अथवा हे राक्षसेश्वर! यदि मोह के वशीभूत होकर तुम्हारी बुद्धि धर्म में नहीं लगती, तो मेरा यह वचन सुनो। युद्ध में तुम राम को प्रज्वलित अग्नि के समान देखोगे, महात्मा लक्ष्मण को और महाबली वानरों को भी देखोगे।"

🔥 रावण का क्रोध और अंगद का बलिदर्शन (श्लोक १६-२४)

॥ श्लोक १६-२० ॥
तच्छ्रुत्वा रावणः क्रोधात् प्रज्वलन्निव तेजसा ।
भ्रुकुटी कुटिलैस्तीक्ष्णैरदृश्यत भयानकः ॥
निग्रहाणामयं वध्यो दूत इत्यब्रवीच्च सः ।
गृह्यतां राक्षसैः शीघ्रं यावद्भूमौ निपात्यते ॥
तच्छ्रुत्वा राक्षसाः सर्वे ग्रहणेऽङ्गदस्य वै ।
आत्मानं दर्शयामासुर्विक्रमेण समन्विताः ॥
तानापतत एवाशु शतशोऽथ सहस्रशः ।
प्रगृहीतायुधान् दृष्ट्वा न चुकोप महाबलः ॥
📖 भावार्थ : यह सुनकर रावण क्रोध से प्रज्वलित हो उठा, उसकी भौंहें टेढ़ी हो गईं, वह भयानक दिखने लगा। उसने कहा, "दूत होने पर भी यह वध्य है, वाक्य का नियम नहीं है। इसे राक्षस शीघ्र पकड़ें और भूमि पर पटक दें।" रावण की आज्ञा सुन सभी राक्षस अंगद को पकड़ने के लिए उद्यत हो गए। उन्हें सैकड़ों-हजारों की संख्या में आयुध लिए आते देख अंगद विचलित नहीं हुए।
॥ श्लोक २१-२४ ॥
ततः प्रोवाच तान् सर्वान् अङ्गदो वाक्यकोविदः ।
श्रूयतां वचनं मह्यं सर्वे यूयं समागताः ॥
यदि वः क्षमते वीर्यं यदि चास्ति पराक्रमः ।
ततो मां गृह्णीत बलाद् यदि शक्योऽस्मि राक्षसाः ॥
विभीषणस्तदा राजन् प्रोवाच राक्षसेश्वरम् ।
नैष वध्यः कथंचित्तु दूतो राजन् कथञ्चन ॥
रामदूतो महातेजा न हन्तव्यः कथञ्चन ।
इति विज्ञाय धर्मात्मा विभीषण उदारधीः ॥
📖 भावार्थ : तब वाक्यकोविद अंगद ने उन सबसे कहा: "तुम सब मेरा वचन सुनो। यदि तुममें वीर्य है, यदि तुममें पराक्रम है, तो मुझे बलपूर्वक पकड़ो, यदि मैं पकड़ में आ सकूँ।" हे राजन्! तब विभीषण ने राक्षसराज से कहा: "राजन्! यह किसी भी प्रकार वध्य नहीं है। दूत को कभी नहीं मारना चाहिए, विशेषतः महातेजस्वी रामदूत को।" इस प्रकार धर्मात्मा उदारबुद्धि विभीषण ने समझाया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕊️ अंतिम राजनयिक प्रयास

यह सर्ग राम की ओर से शांति का अंतिम प्रयास है। राम ने सीता को लौटाने का एक अवसर और दिया, जिससे यह सिद्ध होता है कि धर्म युद्ध केवल अंतिम विकल्प है।

🦍 अंगद का साहस और कूटनीति

अंगद का निडरता से रावण जैसे महापराक्रमी के सामने धर्म की बात करना उनके असाधारण साहस और राम में अटूट विश्वास को दर्शाता है। उनकी वाणी में विनय भी थी और दृढ़ता भी।

🔥 रावण का अहंकार और अधर्म

रावण का दूत को मारने का आदेश देना उसके अधर्म और क्रोध के अंधापन को दर्शाता है। यह घटना उसके पतन की अनिवार्यता को और अधिक स्पष्ट कर देती है।

🧠 विभीषण की धर्मनिष्ठा

इस सर्ग में विभीषण एक बार फिर धर्म के मार्ग पर चलते हैं। वह रावण को दूत-वध जैसे अधर्म से रोकते हैं, जो आगे चलकर उनके राम-शरण में जाने का कारण बनता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से शिक्षा मिलती है कि साहस और धर्म की रक्षा के लिए किसी भी परिस्थिति में निडर होकर बोलना चाहिए। साथ ही, यह भी कि अहंकारी के लिए अंतिम चेतावनी भी बेकार जाती है, और क्रोध में लिया गया निर्णय विनाश का कारण बनता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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