युद्ध काण्ड अध्याय 128

राम का राज्य सुख और फलश्रुति

राम के राज्य में प्रजा सुखी है, सर्वत्र धर्म की स्थापना है। इसके बाद युद्धकाण्ड पढ़ने या सुनने के फल (फलश्रुति) का वर्णन किया गया है।

विवरण

यह युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है। इसमें सर्वप्रथम राम के राज्य सुख का वर्णन है—कोई दुःखी नहीं, सब धर्म पर चलते हैं, वर्षा ऋतु में समय पर होती है, भूकम्प नहीं आते, सब नीरोग हैं। तत्पश्चात फलश्रुति का वर्णन है: जो कोई इस युद्धकाण्ड का पाठ करेगा या सुनेगा, उसे सभी पापों से मुक्ति मिलेगी, वह दीर्घायु होगा, पुत्रवान् होगा, और अन्त में स्वर्गलोक को प्राप्त करेगा। यह सर्ग सम्पूर्ण युद्धकाण्ड का सार एवं फल बताकर उसे समाप्त करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२८

(राम का राज्य सुख और फलश्रुति)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टाविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम का राज्य सुखपूर्वक चल रहा है। प्रजा धर्म में रत है। अब युद्धकाण्ड को सुनने या पढ़ने से मिलने वाले अद्भुत फलों का वर्णन किया जा रहा है। यह सर्ग सम्पूर्ण काण्ड का सार और फल बताकर उसे समाप्त करता है।

🌺 रामराज्य का सुखद वर्णन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
रामे राज्यम् प्रशासति प्रजाः धर्मपरायणाः ।
न दुःखितः न च क्षुद्रः न च व्याधिसमन्वितः ॥
न च अग्निजम् भयम् तासाम् न चौरजम् न च आमयात् ।
सर्वे सुखिनः आसन् वै धर्मेणैव समन्विताः ॥
काले वर्षति पर्जन्यः सस्यानि रसवन्ति च ।
रामे धर्मेण वर्तन्ते प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः ॥
न च अकालमृतिः तासाम् न च व्यालमृगाद्भयम् ।
सर्वे रामप्रसादेन नराः स्वस्थमना अभवन् ॥
एवम् भूते तदा लोके रामः राज्यम् अकारयत् ।
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥
🔹 पदच्छेद : रामे = राम के; राज्यम् = राज्य; प्रशासति = शासन करते; प्रजाः = प्रजा; धर्मपरायणाः = धर्मपरायण; न = नहीं; दुःखितः = दुःखी; न = नहीं; च = और; क्षुद्रः = क्षुद्र; न = नहीं; च = और; व्याधिसमन्वितः = रोगयुक्त; न = नहीं; च = और; अग्निजम् = अग्नि से उत्पन्न; भयम् = भय; तासाम् = उनका; न = नहीं; च = और; औरजम् = चोरों से उत्पन्न; न = नहीं; च = और; आमयात् = रोग से; सर्वे = सब; सुखिनः = सुखी; आसन् = थे; वै = ही; धर्मेण = धर्म से; एव = ही; समन्विताः = युक्त; काले = ऋतुकाल में; वर्षति = वर्षा करता है; पर्जन्यः = मेघ; सस्यानि = अन्न; रसवन्ति = रसयुक्त; च = और; रामे = राम के; धर्मेण = धर्म से; वर्तन्ते = आचरण करते; प्रजाः = प्रजा; सर्वाः = सब; सुखान्विताः = सुखयुक्त; न = नहीं; च = और; अकालमृतिः = अकाल मृत्यु; तासाम् = उनकी; न = नहीं; च = और; व्यालमृगात् = हिंसक पशुओं से; भयम् = भय; सर्वे = सब; रामप्रसादेन = राम की कृपा से; नराः = मनुष्य; स्वस्थमनाः = स्वस्थ मन वाले; अभवन् = हुए; एवम् = इस प्रकार; भूते = होने पर; तदा = तब; लोके = लोक में; रामः = राम ने; राज्यम् = राज्य; अकारयत् = किया; दशवर्षसहस्राणि = दस हजार वर्ष; दशवर्षशतानि = दस सौ वर्ष (अर्थात् ग्यारह हजार वर्ष); च = और।
📖 भावार्थ : जब राम राज्य का शासन कर रहे थे, तब सारी प्रजा धर्मपरायण थी। कोई दुःखी नहीं था, कोई क्षुद्र (दुष्ट) नहीं था, कोई रोगी नहीं था। उन्हें अग्नि से, चोरों से या रोगों से कोई भय नहीं था। सभी सुखी थे और धर्म से युक्त थे। ऋतुकाल में मेघ अच्छी वर्षा करते थे, अन्न रसयुक्त होते थे। राम के धर्मपूर्वक चलने से सारी प्रजा सुखी थी। उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती थी और हिंसक पशुओं से भी भय नहीं था। राम की कृपा से सभी मनुष्य स्वस्थ मन वाले हो गए थे। इस प्रकार उस लोक में राम ने दस हजार वर्ष और दस सौ वर्ष (अर्थात् ग्यारह हजार वर्ष) तक राज्य किया। यह प्रथम पंचक रामराज्य के आदर्श स्वरूप का वर्णन करता है। यहाँ बताया गया है कि राम के शासन में न केवल भौतिक सुख था, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी थी। प्रजा धर्मपरायण थी, इसलिए सभी प्रकार के भय और रोग स्वतः समाप्त हो गए। यह राम के राज्य की विशेषता थी कि वहाँ अकाल मृत्यु का भय नहीं था। वर्षा समय पर होती थी और अन्न रसयुक्त होता था—यह दर्शाता है कि प्रकृति भी राम के धर्मानुशासन में सहयोग करती थी। राम का राज्य इतना लम्बा (ग्यारह हजार वर्ष) चला, यह उनके आदर्श शासन की सफलता का सूचक है।

📿 युद्धकाण्ड श्रवण का फल – भौतिक सुख (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
इमम् युद्धकथाम् पुण्याम् यः शृणोति समाहितः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥
यश्च इमाम् पठते भक्त्या द्विजेभ्यः श्रावयेत् अपि ।
सोऽपि पापैः विमुच्येत रामलोकम् स गच्छति ॥
इह लोके च सम्पत्तिः पुत्रदारादि वर्धते ।
आयुः कीर्तिः यशः चैव तेजः प्रज्ञा बलम् तथा ॥
न च व्याधिभयम् तस्य न च शोकः न च आपदः ।
रामस्य चरितम् पुण्यम् शृण्वतः न भवेत् क्वचित् ॥
वैराग्यम् जायते चित्ते धर्मे च रमते मनः ।
रामायणस्य युद्धस्य पाठात् श्रवणतोऽपि वा ॥
🔹 पदच्छेद : इमम् = इस; युद्धकथाम् = युद्ध की कथा; पुण्याम् = पुण्यमयी; यः = जो; शृणोति = सुनता है; समाहितः = एकाग्रचित्त होकर; सर्वपापविनिर्मुक्तः = सब पापों से मुक्त; प्रेत्य = मरकर; स्वर्गे = स्वर्ग में; महीयते = पूजित होता है; यः = जो; च = और; इमाम् = इसको; पठते = पढ़ता है; भक्त्या = भक्तिपूर्वक; द्विजेभ्यः = ब्राह्मणों को; श्रावयेत् = सुनाता है; अपि = भी; सः = वह; अपि = भी; पापैः = पापों से; विमुच्येत = मुक्त हो जाता है; रामलोकम् = रामलोक को; सः = वह; गच्छति = जाता है; इह = इस; लोके = लोक में; च = और; सम्पत्तिः = सम्पत्ति; पुत्रदारादि = पुत्र, पत्नी आदि; वर्धते = बढ़ती है; आयुः = आयु; कीर्तिः = कीर्ति; यशः = यश; च = और; एव = ही; तेजः = तेज; प्रज्ञा = बुद्धि; बलम् = बल; तथा = वैसे ही; न = नहीं; च = और; व्याधिभयम् = रोग का भय; तस्य = उसके; न = नहीं; च = और; शोकः = शोक; न = नहीं; च = और; आपदः = आपदाएँ; रामस्य = राम के; चरितम् = चरित्र; पुण्यम् = पुण्यमय; शृण्वतः = सुनते हुए; न = नहीं; भवेत् = होती; क्वचित् = कभी; वैराग्यम् = वैराग्य; जायते = उत्पन्न होता है; चित्ते = चित्त में; धर्मे = धर्म में; च = और; रमते = रमण करता है; मनः = मन; रामायणस्य = रामायण के; युद्धस्य = युद्धकाण्ड के; पाठात् = पाठ से; श्रवणतः = श्रवण से; अपि = भी; वा = या।
📖 भावार्थ : इस पुण्यमयी युद्धकथा को जो एकाग्रचित्त होकर सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और मरने के बाद स्वर्ग में पूजित होता है। जो इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है या ब्राह्मणों को सुनाता है, वह भी पापों से मुक्त होकर रामलोक को प्राप्त होता है। इस लोक में उसकी सम्पत्ति, पुत्र, पत्नी आदि बढ़ते हैं। आयु, कीर्ति, यश, तेज, बुद्धि और बल की भी वृद्धि होती है। राम के इस पुण्य चरित्र को सुनने वाले को कभी रोग, शोक या आपदाएँ नहीं सतातीं। युद्धकाण्ड के पाठ या श्रवण से चित्त में वैराग्य उत्पन्न होता है और मन धर्म में रमण करता है। इस द्वितीय पंचक में युद्धकाण्ड सुनने-पढ़ने के भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ बताए गए हैं। यह फलश्रुति का एक भाग है। यहाँ स्पष्ट किया गया है कि यह कथा केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि मोक्षप्रदा भी है। पापों से मुक्ति और स्वर्ग-रामलोक की प्राप्ति तो आध्यात्मिक फल हैं, पर साथ ही सांसारिक सुख-समृद्धि, आयु, यश आदि की भी वृद्धि बताई गई है। यह दर्शाता है कि रामकथा का प्रभाव सर्वांगीण कल्याणकारी है। रोग, शोक, आपदाओं का न होना भी एक बड़ा लाभ है। इसके अलावा, यह कथा वैराग्य और धर्म में रुचि भी जगाती है—अर्थात् यह भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली है।

📜 फलश्रुति का विस्तार – विशेष फल (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
यः इदम् रामचरितम् युद्धकाण्डम् शृणोति च ।
स सुप्रज्ञः सुखी लोके पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥
राज्यभ्रष्टः लभेत् राज्यम् भीतः वै सुखम् आप्नुयात् ।
व्याधितः मुच्यते रोगात् बद्धः मुच्येत बन्धनात् ॥
दुर्भिक्षे सुभिक्षम् च नष्टम् च धनम् आप्नुयात् ।
अपुत्रः लभते पुत्रान् वन्ध्या पुत्रवती भवेत् ॥
संग्रामे विजयम् क्षिप्रम् लभते नात्र संशयः ।
यः इदम् पठते नित्यम् यः इदम् शृणुयात् नरः ॥
सर्वकामसमृद्धस्य रामस्य चरितम् महत् ।
श्रवणात् पाठनात् चैव सर्वान् कामान् अवाप्नुयात् ॥
🔹 पदच्छेद : यः = जो; इदम् = इस; रामचरितम् = रामचरित; युद्धकाण्डम् = युद्धकाण्ड को; शृणोति = सुनता है; च = और; सः = वह; सुप्रज्ञः = सुबुद्धि वाला; सुखी = सुखी; लोके = लोक में; पुत्रपौत्रसमन्वितः = पुत्र-पौत्रों से युक्त; राज्यभ्रष्टः = राज्यभ्रष्ट; लभेत् = प्राप्त करता है; राज्यम् = राज्य; भीतः = भयभीत; वै = तो; सुखम् = सुख; आप्नुयात् = प्राप्त करता है; व्याधितः = रोगी; मुच्यते = मुक्त होता है; रोगात् = रोग से; बद्धः = बंधा हुआ; मुच्येत = मुक्त होता है; बन्धनात् = बंधन से; दुर्भिक्षे = अकाल में; सुभिक्षम् = सुअकाल; च = और; नष्टम् = नष्ट हुआ; च = और; धनम् = धन; आप्नुयात् = प्राप्त करता है; अपुत्रः = पुत्रहीन; लभते = पाता है; पुत्रान् = पुत्र; वन्ध्या = बाँझ; पुत्रवती = पुत्रवती; भवेत् = होती है; संग्रामे = युद्ध में; विजयम् = विजय; क्षिप्रम् = शीघ्र; लभते = पाता है; न = नहीं; अत्र = यहाँ; संशयः = संदेह; यः = जो; इदम् = इस; पठते = पढ़ता है; नित्यम् = नित्य; यः = जो; इदम् = इस; शृणुयात् = सुनता है; नरः = मनुष्य; सर्वकामसमृद्धस्य = सभी कामनाओं से समृद्ध; रामस्य = राम के; चरितम् = चरित्र; महत् = महान्; श्रवणात् = श्रवण से; पाठनात् = पाठ से; च = और; एव = ही; सर्वान् = सभी; कामान् = इच्छाओं को; अवाप्नुयात् = प्राप्त करता है।
📖 भावार्थ : जो इस रामचरित युद्धकाण्ड को सुनता है, वह इस लोक में सुबुद्धि, सुखी और पुत्र-पौत्रों से युक्त होता है। राज्य से भ्रष्ट व्यक्ति राज्य प्राप्त कर लेता है, भयभीत व्यक्ति सुख पा लेता है, रोगी रोग से मुक्त हो जाता है, बंधा हुआ बंधन से छूट जाता है। अकाल में सुअकाल हो जाता है, नष्ट हुआ धन पुनः प्राप्त हो जाता है। पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होते हैं, बाँझ स्त्री पुत्रवती हो जाती है। युद्ध में शीघ्र विजय मिलती है, इसमें संदेह नहीं। जो इसका नित्य पाठ करता है या सुनता है, वह सर्वकामसमृद्ध महान राम के चरित्र के श्रवण-पाठ से सभी इच्छाओं को प्राप्त कर लेता है। इस अन्तिम पंचक में फलश्रुति का विस्तार से वर्णन है। यहाँ विभिन्न प्रकार के संकटों का निवारण बताया गया है—राज्यभ्रष्ट, भय, रोग, बन्धन, दुर्भिक्ष, धननाश, पुत्रहीनता, वन्ध्यात्व, युद्ध में पराजय—इन सबसे मुक्ति और अभीष्ट सिद्धि का वरदान इस काण्ड के श्रवण-पाठ से मिलता है। यह अत्यन्त व्यावहारिक फल हैं जो सामान्य मनुष्य की दैनिक समस्याओं का समाधान करते हैं। अन्त में यह घोषणा की गई है कि इस काण्ड के श्रवण-पाठ से सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि ये फल शास्त्रीय आश्वासन हैं, जो श्रोता में श्रद्धा और भक्ति उत्पन्न करने के लिए दिए गए हैं। साथ ही, यह भी सिद्ध होता है कि रामकथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक जीवन-परिवर्तनकारी ग्रन्थ है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रामराज्य का आदर्श

यह सर्ग रामराज्य के उस स्वरूप को प्रस्तुत करता है जिसकी कल्पना सभी राजनीतिक दर्शनों में की गई है—एक ऐसा राज्य जहाँ प्रजा सुखी, धर्मपरायण और निर्भय हो। यही सच्चे लोकतंत्र की परिभाषा है।

📖 फलश्रुति का महत्त्व

फलश्रुति ग्रन्थ के पाठ को प्रोत्साहित करने के लिए दी जाती है। यह श्रोता में श्रद्धा और निष्ठा उत्पन्न करती है। यहाँ दिए गए फल बताते हैं कि यह कथा सर्वोपयोगी है—चाहे भौतिक समस्या हो या आध्यात्मिक।

🧘 धर्म और अर्थ का समन्वय

इस सर्ग में धर्म (पुण्य, वैराग्य) और अर्थ (सम्पत्ति, पुत्र, राज्य) दोनों की प्राप्ति बताई गई है। यह मानव जीवन के चार पुरुषार्थों में से दो को साधता है, शेष दो (काम, मोक्ष) भी परोक्ष रूप से निहित हैं।

🌍 युद्धकाण्ड का समापन

यह सर्ग युद्धकाण्ड का समापन करता है और उत्तरकाण्ड की भूमिका तैयार करता है। यहाँ दी गई फलश्रुति सम्पूर्ण काण्ड को एक पूजनीय ग्रन्थ के रूप में स्थापित करती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धर्मपूर्वक जीवन जीने से सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं। रामकथा का श्रवण-पाठ न केवल आध्यात्मिक लाभ देता है, बल्कि सांसारिक समस्याओं का भी निवारण करता है। अतः हमें नित्य इसका पाठ या श्रवण करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे अष्टाविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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